अक्कमहाेदेवी वीरशैव लिंगायत संप्रदाय में हुए भक्ति संतों में प्रमुख मानी जाती हैं

अक्कमहाेदेवी वीरशैव लिंगायत संप्रदाय में हुए भक्ति संतों में प्रमुख मानी जाती हैं. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स) लेकिन बसव और उनके अनुयायी समाज-सुधार पर नहीं रुके. उन्होंने अपना आंदोलन बड़ी गंभीरता से चलाया और अपनी मान्यताओं को एक व्यवस्था की शक्ल दी. इसी व्यवस्था ने वक्त के साथ एक संप्रदाय की शक्ल ले ली. ये बात लिंगायतों को हिंदू धर्म के अंदर चले बाकी भक्ति आंदोलनों से अलग करती है. और इसी आधार पर कई लोग लिंगायत संप्रदाय को अपने-आप में एक धर्म मानते हैं. लेकिन लिंगायतों को हिंदुओं से अलग कहना भी आसान नहीं लिंगायतों को हिंदुओं से अलग कहना तब मुश्किल हो जाता है, जब हम अपना ध्यान वीरशैव संप्रदाय पर लगाते हैं. वीरशैव संप्रदाय भी शैव होते हैं और कर्नाटक के ही इलाके में बसते हैं. वीरशैव मानते हैं कि उनके समुदाय की उत्पत्ति शिवलिंग से हुई है और इसीलिए वो हिंदू हैं. वो वेदों में आस्था रखते हैं, जाति प्रथा और हिंदू धर्म में निहित जेंडर डिस्क्रिमिनेशन (मर्द-औरत में फर्क) को भी मानते हैं. 16वीं सदी के करीब अस्तित्व में आया वीरशैव संप्रदाय मानता है कि 12वीं सदी में हुए विचारक उनके पुरखे हैं. उनके मुताबिक बसवन्ना ने लिंगायत संप्रदाय की नींव नहीं रखी थी, उन्होंने महज़ वीरशैव परंपराओं में सुधार किया था. बावजूद इसके, वीरशैव और लिंगायत संप्रदाय बेहद करीब हैं. कई लोग तो इन्हें एक ही मान लेते हैं. लिंगायत समुदाय तमाम अलग बातों के बावजूद हिंदू परंपराओं से दूर नहीं है. लिंगायतों की कई मान्यताएं और परंपराएं वेद, उपनिषद और जैन परंपराओं से साफ तौर पर प्रेरित हैं.