कौन हैं लिंगायत

कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं. मोटा भाई वहां भी सरकार बनाना चाहते हैं. जैसे उन्होंने त्रिपुरा में सरकार बनाई. या जैसे उन्होंने मेघालय में बना ली. लेकिन ये सब तब होगा, जब सिद्धारमैया उन्हें चैन लेने दें. कर्नाटक में कांग्रेस सरकार चला रहे सिद्धारमैया एक के बाद एक मास्टर स्ट्रोक चल रहे हैं. विधानसभा चुनाव से ऐन पहले उन्होंने कर्नाटक के लिए अलग झंडे का प्रस्ताव बनाकर केंद्र की एनडीए (भाजपा पढ़ें) सरकार के पाले में डाल दिया और अब उन्होंने कर्नाटक में लिंगायत सम्प्रदाय को एक अलग धर्म (अल्पसंख्यक) के रूप में मान्यता देने की कवायद शुरू कर दी है. इस प्रस्ताव पर भी अंतिम निर्णय केंद्र को ही लेना है और झंडे वाले प्रस्ताव की ही तरह इस बार भी केंद्र आसानी से हां या ना नहीं कर सकता, क्योंकि लिंगायत कर्नाटक की जनसंख्या का 17 फीसदी हैं. माने बहुत बड़ा वोट बैंक. हां-ना की पॉलिटिक्स तो होती रहेगी, फिलहाल ये जान लिया जाए कि लिंगायत आखिर हैं कौन और क्यों उन्हें आसानी से हिंदू धर्म के अंदर या बाहर बताना बेहद मुश्किल है. समाज-सुधार की कवायद का नतीजा हैं लिंगायत बारहवीं सदी के दौरान कर्नाटक में बैजल द्वितीय नाम के राजा का शासन था. इस दौरान ब्राह्मणवाद चरम पर था और जाति प्रथा ने निचली मानी जाने वाली जातियों का जीवन दूभर कर रखा था. ज़्यादा समस्या इस बात से थी कि धर्म और राजनीति आपस में गड्ड-मड्ड थी. तो बचने का कोई रास्ता नहीं था.