खेती

मेथी की उन्नत खेती

मेथी की उन्नत खेती

मेथी की उन्नत खेती

मेथी उत्तरी भारत की पत्तियों वाली सब्जी की मुख्य फसल है । इस फसल की प्रारम्भिक अवस्था में पत्तियों को प्रयोग किया जाता है । यह लगभग भारत वर्ष में सभी

जगह उगायी जाती है । मेथी की फसल को पहाड़ी क्षेत्रों में भी आसानी से उगाया जा सकता है जो कि शरद ऋतु के मौसम में पैदा की जाती है । Read More : मेथी की उन्नत खेती about मेथी की उन्नत खेती

मिट्टी का पीएच और पोषक तत्वों की उपलब्धता

मिट्टी का पीएच और पोषक तत्वों की उपलब्धता

pH क्या होता है ?

अगर मिट्टी का pH 0-7 होता है तो मिट्टी को acidic मिट्टी मे कहा जाता है और अगर मिट्टी का pH 7 से लेकर 14 हो तो उसे besic मिट्टी कहा जाता है। उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में आम तौर पर अम्लीय (acidic) मिट्टी होती है, जबकि सीमित वर्षा वाले क्षेत्रों में आम तौर पर क्षारीय (alkaline) भूमि होती है। सेब के पेड़ 6.5 के पीएच वाली, थोड़ी अम्लीय मिट्टी पसंद करते हैं, इसलिए मिट्टी का पीएच 6.5 समायोजित करना आवश्यक होता है।

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पौध संरक्षण

पौध संरक्षण

की अपेक्षा जैव कीटनाशकों का प्रयोग करें।

  • कोई भी कीट नाशक प्रयोग करने से पहले कीटों के रोग प्रतिरोधक के अनुपात का पता लगाना चाहिए। समेकित कीट प्रबंधन आधारित कृषि पर्यावरण परिस्थिति (एईएसए) पद्धति विश्लेषण अपनाना चाहिए।
  • मुख्य फसल (अर्न्तफसलीय/बार्डर फसलीय) के आस-पास ऐसी फसलें उगानी चाहिए जो किसान मित्र कीटों को आकर्षित करें जो हानिकारक कीटों से बचाव करें/कीटों को मार दें।
  • गर्मी के मौसम में खेतों की गहरी जुताई करें।
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स्ट्राबेरी क्या है जानें स्ट्राबेरी की खेती करें उचित प्रकार

स्ट्राबेरी की खेती करें

स्ट्राबेरी एक महत्वपूर्ण नरम फल है। जिसको विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु में उगाया जा सकता है। इसका पौधा कुछ ही महीनों में फल दे सकता है। इस फसल का उत्पादन बहुत लोगों को रोजगार दे सकता है। स्ट्रॉबेरी  एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन 'सी' , प्रोटीन और खनिजों का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोतों है।

स्ट्राबेरी की कौन - कौन किस्में है जानें एस तरह 

स्ट्राबेरी की बहुत सी किस्में उगाई जाती हैं। परन्तु मुख्यत: निम्नलिखित किस्मों का उत्पादन हरियाणा में किया जाता है।

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गाजर की खेती कैसे करें

गाजर की खेती कैसे करें

गाजर एक मूल्यवान सब्जी है जिसका प्रयोग भारत के सभी प्रान्तों में होता है । गाजर का मूल स्थान पंजाब तथा कश्मीर है । इसकी जड़ को कच्चा, पकाकर तथा अचार बनाकर प्रयोग करते हैं । इसके अतिरिक्त हलुवा, रायता तथा जूस बनाकर प्रयोग करते हैं । गाजर के अन्दर कैरीटीन, थायेमिन, राईबोफिलेविन तथा विटामिन ‘ए’ की मात्रा अधिक पायी जाती है । हृदयरोग के लिए इसका मुरब्बा उपयुक्त रहता है ।

गाजर की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु 

इसकी फसल को लगभग हर प्रकार की भूमि में उगाया जाता है लेकिन सबसे उपयुक्त बलुई दोमट भूमि होती है । मिट्‌टी उपजाऊ हो तथा जल-निकास का उचित प्रबन्ध हो | Read More : गाजर की खेती कैसे करें about गाजर की खेती कैसे करें

सेहत से खेलता रसायनों का ज़हर

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खेती में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से कहीं, 07 वर्ष की लड़कियों में माहवारी शुरू हो रही है, तो कहीं मनुष्यों के सेक्स में ही परिवर्तन हुआ जा रहा है। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया में 25 लाख लोग प्रतिवर्ष कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के शिकार होते हैं, जिसमें से 05 लाख लोग काल के गाल में समा जाते हैं। फसलों में कीटनाशकों का बढ़ता हुआ प्रयोग क्या कहर बरपा रहा है, पढें इस शोधपरक लेख में।
खेतों के ज़रिये शरीर में उतरता ज़हर
कृषि रसायनों से दूषित होता पर्यावरण एवं स्वास्थ्य Read More : सेहत से खेलता रसायनों का ज़हर about सेहत से खेलता रसायनों का ज़हर

यूरिया जहर है !

यूरिया जहर है !

हम बिना जुताई की कुदरती खेती करते हैं जिसमे हम किसी भी प्रकार की मानव निर्मित खाद और दवाई का उपयोग नहीं करते हैं। हमने यह पाया है की जब हमारे पडोसी अपने खेतों में यूरिया डालते हैं और सिंचाई करते हैं तो पानी यहां वहां डबरों में भर जाता है उस पानी से मेंढक ,मछलियाँ मर जाती हैं यदि उस पानी को मवेशी पी लेते हैं तो वो भी मर जाते हैं। हमारे स्वम् के मवेशी भी अनेक बार मरे हैं। Read More : यूरिया जहर है ! about यूरिया जहर है !

पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का वर्गीकरण

पौधे जडो द्वारा भूमि से पानी एवं पोषक तत्व, वायु से कार्वन डाई आक्साइड तथा सूर्य से प्रकाश ऊर्जा लेकर अपने विभिन्न भागों का निर्माण करते है।
पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है।

मुख्य पोषक तत्व- नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश।
गौण पोषक तत्व- कैल्सियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक।
सूक्ष्म पोषक तत्व- लोहा, जिंक, कापर, मैग्नीज, मालिब्डेनम, बोरान एवं क्लोरीन।

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भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत

भारत में भी वही तमाम समस्याएं हैं जिसमें पानी की बचत कम, बर्बादी ज्यादा है। यह भी सच्चाई है किबढ़ती आबादी का दबाव, प्रकृति से छेड़छाड़ और कुप्रबंधन भी जल संकट का एक कारण है। पिछले कुछ सालों सेअनियमित मानसून और वर्षा ने भी जल संकट और बढ़ा दिया है। इस संकट ने जल संरक्षण के लिए कई राज्यों कीसरकारों को परंपरागत तरीकों को अपनाने को मजबूर कर दिया है। देश भर में छोटे- छोटे बांधों के निर्माण औरतालाब बनाने की पहल की गयी है। इससे पेयजल और सिंचाई की समस्या पर कुछ हद तक काबू पाया जा सका है।भारत में तीस प्रतिशत से अधिक आबादी शहरों में रहती है। आवास और शहरी विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं किदेश के लगभ Read More : भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत about भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत

जीवामृत निर्माण में सभी अवयवों गोबर, गौमूत्र, दाल का आटा और मिट्टी का क्या रोल है?

गोबर में कई प्रकार के लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं जो कार्बनिक पदार्थ को विघटित करने में सहयोगी हैं. इसी प्रकार मिट्टी में भी लाभदायक सूक्ष्मजीव होते हैं जोकि अपनी विशिष्ट जैव क्रियाशीलता के द्वारा खेतों में उपलब्ध जटिल अवयवों का सरलतम रूप में विघटन करने के लिए आवश्यक हैं ताकि पौधे जड़ों द्वारा अवशोषण कर सकें. जीवामृत में गोबर और मिट्टी से इन्ही सूक्ष्मजीवों को प्राप्त करके अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान कर गुणन किया जाता है.
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