खेती

भिन्डी की खेती कैसे करें

 भिंडी के फल में आयोडीन की मात्रा अधिक होती है। भिंडी का फल कब्ज रोगी के लिए विशेष गुणकारी होता है। म. प्र. में लगभग 23500 हे. में इसकी खेती होती है। प्रदेश के सभी जिलों में इसकी खेती की जा सकती है।

अधिक उत्पादन तथा मौसम की भिंडी की उपज प्राप्त करने के लिए संकर भिंडी की किस्मों का विकास कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किया गया हैं। ये किस्में यलो वेन मोजकै वाइरस रोग को सहन करने की अधिक क्षमता रखती हैं। इसलिए वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर उच्च गुणवत्ता का उत्पादन कर सकते हैं।

भूमि व खेत की तैयारी

मलेरिया के लक्षणऔर उपाय

प्लाज्मोडियम' नाम के पैरासाइट से होने वाली बीमारी है मलेरिया। यह मादा 'एनोफिलीज' मच्छर के काटने से होता है जो गंदे पानी में पनपते हैं। ये मच्छर आमतौर पर सूर्यास्त के बाद काटते हैं। मलेरिया के मच्छर रात में ही ज्यादा काटते हैं। कुछ केसेज में मलेरिया अंदर ही अंदर बढ़ता रहता है। ऐसे में बुखार ज्यादा ना होकर कमजोरी होने लगती है और एक स्टेज पर पेशंट को हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है, जिससे वह अनीमिक हो जाता है।
 

राजमा की खेती कैसे करें और कब

राजमा की खेती कैसे करें और कब

समस्तीपुर। राजमा की खेती रबी ऋतु में की जाती है। अभी इसके लिए उपयुक्त समय है। यह मैदानी क्षेत्रों में अधिक उगाया जाता है। राजमा की अच्छी पैदावार हेतु 10 से 27 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान की आवश्यकता पड़ती है। राजमा हल्की दोमट मिट्टी से लेकर भारी चिकनी मिट्टी तक में उगाया जा सकता है।

राजमा उन्नतशील प्रजातियां है

राजमा में प्रजातियां जैसे कि पीडीआर 14, इसे उदय भी कहते है। मालवीय 137, बीएल 63, अम्बर, आईआईपीआर 96-4, उत्कर्ष, आईआईपीआर 98-5, एचपीआर 35, बी, एल 63 एवं अरुण है।

खेत की तैयारी

सेब की खेती

शिमला: सेब की खेती के लिए एशिया का सबसे अमीर और पूरी दुनिया में मशहूर हिमाचल का ये गांव है। जानकारी के मुताबिक शिमला जिले के मड़ावग गांव को एशिया का सबसे अमीर गांव भी माना जाता है। यहां के सेबों को विदेशों में काफी पसंद किया जाता है। बता दें कि सेब की खेती ने इस गांव को डेवलप बना दिया है।

मूंगफली की खेती

मूंगफली की खेती

 मूँगफली खाकर हम अनजाने में ही इतने पोषक तत्व ग्रहण कर लेते हैं जिन का हमारे शरीर को बहुत फायदा होता है , आधे मुट्ठी मूगफली में 426 कैलोरीज़ होती हैं, 15 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, 17 ग्राम प्रोटीन होता है और 35 ग्राम वसा होती है। इसमें विटामिन ई, के और बी6 भी प्रचूर मात्रा में होती है। यह आयरन, नियासिन, फोलेट, कैल्शियम और जि़ंक का अच्छा स्रोत हैं।मूँगफली वानस्पतिक प्रोटीन का एक सस्ता स्रोत हैं। इसमें प्रोटीन की मात्रा मांस की तुलना में १.३ गुना, अण्डों से २.५ गुना एवं फलों से ८ गुना अधिक होती है। मूँगफली वस्तुतः पोषक तत्त्वों की अप्रतिम खान है। 

केले की खेती

केले की खेती

जलवायु-भूमि

केला की खेती के लिए गर्मतर एवं समजलवायु उत्तम होती है अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में केले की खेती सफल रहती है। जीवंशयुक्त दोमट, मटियार दोमट भूमि, जिससे जल निकास उत्तम हो, उपयुक्त मानी जाती है।

खेती की तैयारी 

समतल खेत को चार-पांच गहरी जुताई करके भुरभुरा बना लेना चाहिए। खेत की तैयारी करने के बाद समतल खेत में लाइनों में गड्ढे तैयार करके रोपाई की जाती है। केले की रोपाई के लिए खेत की तैयारी के बाद लाइनों में गड्ढे 1.5 मीटर लम्बे, 1.5 मीटर चौड़े गहरा खोद कर छोड़ दें, जिससे धूप लग जाए। 

पौधरोपण 

अनार की खेती कैसे करें

अनार  की खेती कैसे करें

अनार का पौधा तीन-चार साल में पेड़ बनकर फल देने लगता है और एक पेड़ करीब 25 वर्ष तक फल देता है। साथ ही अब तक के अनुसंधान के मुताबिक प्रति हैक्टेयर उत्पादकता बढ़ाने के लिए अगर दो पौधों के बीच की दूरी को कम कर दिया जाए तो प्रति पेड़ पैदावार पर कोई असर नहीं पड़ता है। लेकिन ज्यादा पेड़ होने के कारण प्रति हैक्टेयर उत्पादन करीब डेढ़ गुना हो जाता है। परंपरागत तरीके से अनार के पौधों की रोपाई करने पर एक हैक्टेयर में 400 पौधे ही लग पाते हैं जबकि नए अनुसंधान के अनुसार पांच गुणा तीन मीटर में अनार के पौधों की रोपाई की जाए तो पौधों के फलने-फूलने पर कोई असर नहीं पड़ेगा और एक हैक्टेयर में छह सौ पौधे लगने से

लीची की खेती

लीची की खेती

लीची के लिए गहरी दोमट मिट्टी उत्तम रहती है। मुजफ्फरनगर के आसपास कैल्शियम बाहुल्य वाली भूमि पायी जाती है, जिसमें जड़ों का विकास अच्छा होता है। इसी प्रकार की भूमि पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया तथा पडरौना, महाराजगंज जनपद के कुछ क्षेत्रों में पायी जाती है तथा बलुई या चिकनी मिट्टी में यह काफी पैदावार देती है। किन्तु जल-निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए तथा भूमि कड़ी परत या चट्टान वाली नहीं होना चाहिए, क्योंकि अम्लीय मिट्टी में लीची का पौधा काफी तेज गति से बढ़ता है तथा मिट्टी में चूने की कमी नहीं होनी चाहिए। फ्लोरिडा में लीची के लिए 5.0 से 5.5 पी.एच.

स्ट्राबेरी क्या है जानें स्ट्राबेरी की खेती करें उचित प्रकार

स्ट्राबेरी की खेती करें

स्ट्राबेरी एक महत्वपूर्ण नरम फल है। जिसको विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु में उगाया जा सकता है। इसका पौधा कुछ ही महीनों में फल दे सकता है। इस फसल का उत्पादन बहुत लोगों को रोजगार दे सकता है। स्ट्रॉबेरी  एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन 'सी' , प्रोटीन और खनिजों का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोतों है।

स्ट्राबेरी की कौन - कौन किस्में है जानें एस तरह 

स्ट्राबेरी की बहुत सी किस्में उगाई जाती हैं। परन्तु मुख्यत: निम्नलिखित किस्मों का उत्पादन हरियाणा में किया जाता है।

कैमारोजा

करेला की खेती कैसे करें करेला की खेती को करने के उन्नत तरीके जानें

करेला की खेती कैसे करें करेला की खेती को करने के उन्नत तरीके जानें

हमारे देश में करेला की खेती काफी समय से होती आ रही है । इसका ग्रीष्मकालीन सब्जियों में महत्वपूर्ण स्थान है । पौष्टिकता एवं अपने औषधीय गुणों के कारण यह काफी लोकप्रिय है । आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के अनुसार मधुमेह के रोगियों के लिये करेला की सब्जी का सेवन लाभदायक रहता है । इसके फलों से सब्जी बनाई जाती है । इसके छोटे-छोटे टुकड़े करके धूप में सुखाकर रख लिया जाता हैं, जिनका बाद में बेमौसम की सब्जी के रूप में भी उपयोग किया जाता है ।

करेला की खेती के लिये जलवायु क्या होनी चाहिए 

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