खेती

फूलगोभी की वैज्ञानिक खेती

फूलगोभी की वैज्ञानिक

परिचय

गोभी वर्गीय सब्जियों में फूलगोभी का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी खेती मुख्य रूप से श्वेत, अविकसित व गठे हुए पुष्प पुंज के उत्पादन हेतु की जाती है। इसका उपयोग सब्जी, सूप, अचार, सलाद, बिरियानी, पकौडा इत्यादि बनाने में किया जाता है। साथ ही यह पाचन शक्ति को बढ़ाने में अत्यंत लाभदायक है। यह प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन ‘ए’ तथा ‘सी’ का भी अच्छा श्रोत है।

जलवायु

हल्दी की खेती का सही तरीका

हल्दी की खेती का सही तरीका

हल्दी जिंजिवरेंसी कुल का पौधा हैं। इसका का वानस्पतिक नाम कुर्कमा लांगा हैं। इसकी उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशिया में हुई हैं। हल्दी का उपयोग प्राचीनकाल से विभिन्न रूपों में किया जाता आ रहा हैं, क्योंकि इसमें रंग महक एवं औषधीय गुण पाये जाते हैं। हल्दी में जैव संरक्षण एवं जैव विनाश दोनों ही गुण विद्यमान हैं, क्योंकि यह तंतुओं की सुरक्षा एवं जीवाणु (वैक्टीरिया) को मारता है। इसका उपयोग औषधीय रूप में होने के साथ-साथ समाज में सभी शुभकार्यों में इसका उपयोग बहुत प्राचीनकाल से हो रहा है। वर्तमान समय में प्रसाधन के सर्वोत्तम उत्पाद हल्दी से ही बनाये जा रहे हैं। हल्दी में कुर्कमिन पाया जाता हैं तथा इससे ए

अधिक उपज देने वाली मूंग की किस्म तैयार

देश में दलहन की पैदावार न बढ़ने से दालों के आयात पर हमारी निर्भरता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में दलहनों की पैदावार बढ़ाने लिए अधिक उपज वाली किस्में विकसित करना जरूरी है। इसे देखते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जेनेटिक और प्लांट ब्रीडिंग विभाग ने मूंग की अधिक उपज वाली मालवीय जनकल्याणी (एचयूएम 16) नई किस्म विकसित की है। इस किस्म की खासियत है कि यह महज दो माह में पककर तैयार हो जाती है। किसान इसकी बुवाई गेहूं की कटाई के बाद यानी अप्रैल माह में भी कर सकते हैं। जिससे बरसात से पहले इसकी कटाई की जा सके। इस तरह इस किस्म की खेती किसानों के लिए काफी फायदेमंद है। इसके अलावा इस किस्म में अन्य किस्मों के

बोने से पहले ही आप पानी और नमक के घोल से

बोने से पहले ही आप पानी और नमक के घोल से

प्रमाणित बीज को भी बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा आधार बीज से पैदा कराया जाता है। यह कार्य प्रत्येक वर्ष म.प्र. राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम या उन्नतशील किसानों द्वारा बीज पैदा करने की मानक विधियों के अनुसार किया जाता है। प्रमाणित बीज के थैलों पर नीले रंग का लेबिल लगा रहता है। प्रमाणित बीज को किसानों द्वारा व्यावसायिक फसल के उत्पादन के लिये उपयोग में लाया जाता है।
(ब) बीज शुद्धता व अंकुरण परीक्षण:-

फ्लोरीकल्चर रोजगार का अवसर

फ्लोरीकल्चर से अनलिमिटेड कमाई

जीवन में खुशी के रंग भरना हो या फिर देवी-देवताओं को प्रसन्न करना हो या फिर किसी को श्रद्धांजलि अर्पित करना हो, इन सबमें  इजहार का माध्यम बनता है फूल। वैसे भी आजकल फूलों को लेकर की गई सजावट का कोई जवाब नहीं है। ये बेजान पड़ी चीजों में एक नई जान डाल देते हैं। आप किसी भी पार्टी, कान्फ्रेंस या फिर मीटिंग में जाएं,  वहां आज केटरिंग के बाद सबसे ज्यादा ध्यान फूलों की डेकोरेशन पर ही दिया जाता है। इन्हीं सब कारणों से फूलों के उत्पादन में खासा इजाफा देखने को मिल रहा है। फूल उगाने की इस प्रक्रिया को फ्लोरीकल्चर के नाम से जाना जाता है। यदि आपको भी फूलों से प्यार है और आप भी इस क्षेत्र

गाजर की उन्नत क़िस्में

गाजर की उन्नत क़िस्में

गाजर हमारे शरीर के लिए अनेक प्रकार से लाभकारी हैं। इसमें बीटा केरोटीन पाया जाता हैं जो ‘विटामिन ए’ में बदल जाता हैं। इसमें कैंसर दूर करने के गुण पाए जाते हैं। बीटा केरोटीन एंटीऑक्सीडेंट होता हैं और यह कोशिकओं को नष्ट होने से रोकता हैं, उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता हैं। यह शरीर की रोगो से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता हैं और टॉनिक की तरह कार्य करता हैं।
पूसा मेघाली 
यह नारंगी गूदे, छोटी टॉप तथा कैरोटीन की अधिक मात्रा वाली संकर प्रजाति है। इसकी फ़सल बुवाई से 100-110 दिन में तैयार हो जाती है।

खरीफ प्याज उत्पादन तकनीक

खरीफ प्याज उत्पादन तकनीक

प्याज की फसल के लिए ऐसी जलवायु की अवश्यकता होती है जो ना बहुत गर्म हो और ना ही ठण्डी। अच्छे कन्द बनने के लिए बड़े दिन तथा कुछ अधिक तापमान होना अच्छा रहता है। आमतौर पर सभी किस्म की भूमि में इसकी खेती की जाती है, लेकिन उपजाऊ दोमट मिट्टी, जिसमे जीवांश खाद प्रचुर मात्रा में हो व जल निकास की उत्तम व्यवस्था हो, सर्वोत्तम रहती है। भूमि अधिक क्षारीय व अधिक अम्लीय नहीं होनी चाहिए अन्यथा कन्दों की वृद्धि अच्छी नहीं हो पाती है। अगर भूमि में गंधक की कमी हो तो 400 किलो जिप्सम प्रति हेक्टर की दर से खेत की अन्तिम तैयारी के समय कम से कम 15 दिन पूर्व मिलायें।

परिचय

लोबिया की खेती कैसे करें

लोबिया की खेती कैसे करें

लोबिया (काऊपीज) की फसल कम समय, कम शक्ति तथा कम धन में अधिक लाभ देती है। पंजाब तथा कई अन्य राज्यों में यह फसल पहले से अधिक मात्रा में बोइ जाने लगी है। यह फसल गर्मी की ऋतु में फरवरी तथा जून-जुलाई को बोइ जाती है। यह फसल 45-50 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

परिचय

वर्मीवाश एक तरल जैविक खाद

वर्मीवाश एक तरल जैविक खाद

यदि हमारी खेती प्रमाणिक तौर पर 100 फीसदी जैविक हो जाये, तो क्या हो? यह सोचते ही मेरे मन में सबसे पहले जो कोलाज उभरता है, उसमें स्वाद भी है, गन्ध भी, सुगन्ध भी तथा इंसान, जानवर और खुद खेती की बेहतर होती सेहत भी। इस चित्र के लिये एक टैगलाइन भी लिखी है - “अब खेती और किसान पर कोई तोहमत न लगाए कि मिट्टी, भूजल और नदी को प्रदूषित करने में उनका भी योगदान है।’’

गेहू की खेती कैसे और कब

जिले में श्रीविधि से गेहूं की खेती कारगर साबित हो रही है। अगर तुलना करें तो इसमें परंपरागत खेती से बुआई का खर्च चौथाई से भी कम हो रहा है और उपज डेढ़ गुना मिल रही है लेकिन इस खेती में बीज को उपचारित कर बुआई की विधि थोड़ी अलग है। रसायनिक खादों के इस्तेमाल से मुक्ति मिल रही है। अब तो किसान बुआई के लिए कतार से कतार और पौधे से पौधे के बीच एक निश्चित दूरी रखने के लिए कोनोवीडर मशीन की सहायता ले रहे हैं। यह खेती छोटे किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। जिले में इस विधि के प्रति किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विभाग की ओर से विशेष पहल की जा रही है।

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