अंगूर की खेती

परिचय

नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनूसंधान संस्थान के ‘फल एवं बागबानी’विभाग ने अंगूर की एक नई किस्म तैयार की है, जिसे ‘पूसा अदिति’ नाम दिया गया है। इस किस्म का विकास कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के सूबों के हालात को ध्यान में रख कर किया है। इस किस्म की खासियतों का जिक्र नीचे किया गया है।

  • यह अगेती किस्म है।
  • इस किस्म के अंगूर के गुच्छ का वजन करीब 450 ग्राम होता है।
  • गुच्छ के हर दाने का आकार बराबर होता है।
  • सभी दानों की मिठास भी एकदम समान होती है।
  • इस के दाने फटते नहीं हैं।
  • यह किस्म मानसून आने से पहले जून के दुसरे हफ्ते तक तैयार हो जाती है।
  • इस किस्म के अंगूर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व राजस्थान सूबों में उगाए जा सकते हैं।
  • इस किस्म को ‘परलेट’ किस्म के स्थान पर उगाया जा सकता है।
  • यह ज्यादा उपज देने वाली किस्म हैं

अंगूर की नई उत्पादन तकनीक को नीचे बताया जा रहा है, ताकि किसान नई किस्म से उच्च गुणवत्ता वाली भरपूर उपज प्राप्त कर सकें।

 

आबोहवा

अंगूर के अच्छे उत्पादन के लिए शीतोष्ण आबोहवा अच्छी मानी गई है। इस किस्म अंगूर उगाने के लिए गर्मी के मौसम में सूखी गर्मी व सर्दी में पाला रहित बरसाती ठंड ठीक रहती है। 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे तापमान में इस की उपज पर ख़राब असर पड़ता है। इस के लिए 10 से 29 डिग्री सेल्सियस औसत तापमान अच्छा माना गया है।

इस से ज्यादा तापमान फलों को नुकसान पहुंचा सकता है। ज्यादा आर्द्रता भी अंगूर को नुकसान पहूँचाती है, क्योंकी ज्यादा आर्द्रता के कारण फफूंदी जनित रोगों का हमला हो जाता है। ज्यादा वर्षा के कारण अंगूर के पौधों पर कीट व रोगों का ज्यादा प्रकोप होता है। आकाश में बादल छाए रहने से पुष्पन में कठिनाई होती है।

 

मिट्टी

अंगूर की बागबानी हर प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है. परंतु सामान्य रूप से बड़े कणों वाली रेतीली से ले कर मटियार दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी गई है। उथली से ले कर भूत गहरी मिट्टियों और कम व ज्यादा उर्वरक मिट्टियों से भी इस की बागबानी की जा सकती है। उत्तरी भारत में इस के उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली रेतीली व रेतीली दोमट मिट्टी अच्छी मानी गई है। मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 ठीक माना गया है।

 

खाद व उर्वरक

दक्षिणी भारत में अंगूरों के बागों में सर्वाधिक खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे यह भी सही है कि वहाँ पर उपज भी सब से ज्यादा यानी करीब 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जाती है। दरअसल वहाँ के हालात व जलवायु में काफी मात्रा में खाद व उर्वरकों की जरूरत पड़ती हैं। वहाँ पर हर तोड़ाई के बाद अंगूर के बगीचों में खाद डाली जाती है। पहली खुराक में नाइट्रोजन व फास्फोरस की पूरी मात्रा और पोटेशियम की आधी मात्रा दी जाती है। फल लगने के बाद पोटेशियम की बाकी मात्रा दी जाती है।

उत्तर भारत में प्रति लता के हिसाब से हर साल 75 किलोग्राम गोबर की खाद दी जाती है। इस के अलावा हर साल 125-250 किलोग्राम नाइट्रोजन, 62.5-125किलोग्राम फस्फोरस और 250-375 किलोग्रामपोटेशियम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डाला जाता है।

अंगूर की फसल को 5 साल की बैलों में 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश या 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट व 50-60 किलोग्राम नाइट्रोजन की खाद प्रति बेल हर साल देने की सिफारिश की गई है।

काट छांट के तुरंत बाद जनवरी के आखिरी हफ्ते में नाइट्रोजन व पोटाश की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा डालनी चाहिए। बाकी उर्वरकों की मात्रा फल लगने के बाद डाल कर जमीन में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। ऐसा करने से अंगूर की भरपूर उपज मिलती है।

 

कलम लगाना

जनवरी में काट छांट से निकली टहनियों से कलमें ली हटी है। कलमें हमेशा स्वस्थ व पकी टहनियों से ही लेनी चाहिए। 4-6 गांठो वाली 25-45 सेंटीमीटर लंबी कलमें ली जाती है।

कलम के नीचे का कट गांठ की ठीक नीचे होना चाहिए और ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए। इन कलमों को अच्छी त्तरह तैयार की गई क्यारियों में लगा देना चाहिए। ये कलमें 1 साल में रोपने के लिए तैयार हो जाती हैं।

 

रोपाई

उत्तर भारत में अंगूर की रोपाई का सही समय जनवरी महिना है, जबकि दक्षिणी भारत में अक्टूबर नवंबर व मार्च अप्रैल में रोपाई की जाती है।

 

सधाई व छंटाई

अंगूर की भरपूर उपज लेने के लिए बेलों को साधने व काटछांट करने की सिफारिश की जाती है। बेलों को सही आकार देने के लिए अनचाहे भाग काट दिए जाते हैं। इसे अनचाहे भाग काट दिए जाते हैं, इसे सधाई कहते हैं और बेल पर फल लगने वाली शाखाओं को सामान्य रूप से फैलने के लिए किसी भाग की छंटनी को छंटाई कहते हैं।

अंगूर की बेल को साधने के लिए 2.5 मीटर ऊँचाई पर सीमेंट के खम्भों के सहारे लगे तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है बेलों को जाल तक पहूँचाने के लिए केवल 1 ही ताना बना दिया जाता है। बेलों के जाल पर पहूँचाने पर ताने को काट दिया जाता है।

अंगूर की बेलों की समय समय पर काटछांट करना बेहद जरूरी है, पर कोपलें फूटने से पहले काम पूरा हो जाना चाहिए। काट छांट का सही समय जनवरी का महिना होता है।

 

सिंचाई

आमतौर पर अंगूर की बेलों को नवंबर से दिसंबर तक सिंचाई की जरूरत नहीं होता है, लेकिन छंटाई के बाद बेलों की सिंचाई जरूरी होती है। फूल आने व फल बनने (मार्च से मई तक) के दौरान पानी की जरूरत होती है इस दौरान तापमान व मौसम को ध्यान में रखते हुए 8-10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए।

जैसे ही फल पकने शुरू हो जाएँ, सिंचाई बंद कर देनी चाहिए। फलों की तोड़ाई के बाद भी एक सिंचाई जरूरी करनी चाहिए।

 

खरपतवार नियंत्रण

दक्षिणी भारत में जहाँ पूरे साल अंगूर की लताएँ सक्रिय रहती हैं, वहाँ अंगूर के बागों से खरपतवार निकालना बेहद जरूरी हो जाता है। वहाँ पर नियमित रूप से निराईगूराई की जाती है। उत्तरी भारत में भी अंगूरों के बागों की जरूरत के मुताबिक निराई गूराई की जाती है।

 

रोग व कीट नियंत्रण

 

एन्थ्रेक्नोज

यह एक फफूंदी जनक रोग है। इस का प्रकोप पत्तियों व फलों दोनों पर होता है। पत्तियों की शिराओं के बीच में जगह जगह टेढ़े मेढ़े गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं, इन के किनारे भूरे या लाल रंग के होते हैं, मध्य भाग धंसा हुआ होता है और बाद में पत्ता गिर जाता है। शुरू में काले रंग के धब्बे फलों पर पड़ जाते हैं।

इस की रोक थाम के लिए पौधे के रोगी भागों को काट कर जला दें। पत्तियाँ निकलने पर 0.2 फीसदी बाविस्टीन के घोल का छिड़काव करें। बारिश के मौसम के कार्बडाजिम के 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करें।

 

चूर्णी फफूंदी

यह एक फफूंदी जनक रोग है, इस में पत्ती, शाखाओं व फलों पर सफेद चूर्णी धब्बे बन जाते हैं। ये धब्बे धीरे-धीरे सभी पत्तों व फलों पर फ़ैल जाते है, जिस के कारण फल गिर सकते हैं या देरी से पकते हैं।

इस की रोकथाम के लिए 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक या 0.1 फीसदी कैराथेन के 2 छिड़काव 10-15 दिनों के अन्तराल पर करने चाहिए।

 

थ्रिप्स

इस कीट के प्रकोप मार्च से अक्टूबर तक रहता है। यह अंगूर की पत्तियों, शाखाओं और फलों का रस चूस कर नुकसान पहूँचाता हैं।

इस की रोकथाम के लिए 500 मिलीलीटर मेलाथियान को 500 लीटर अपनी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

 

चैफर बीटिल

यह अंगूर का सब से खतरनाक कीट, जो रात के समय बैलों पर हमला करता है और पूरी फसल को तबाह कर देता है।

इस की रोकथाम के लिए 0.5 फीसदी क्यूनालफास के घोल का छिड़काव करना चाहिए।

 

फलों की तोड़ाई

अंगूर के फलों के गूछों को पूरी तरह पकने के बाद ही तोड़ना चाहिए, क्योंकी अंगूर तोड़ने के बाद नहीं पकते हैं। फल जब खाने योग्य हो जाएँ या बाजार में बेचने हों, तो उसी समय उन की तोड़ाई करनी चाहिए। फलों की तोड़ाई सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।

पैंकिंग से पहले गूछों से टूटे या गले सड़े दानों को निकाल देना चाहिए ताकि अच्छे अंगूर खराब न हों।

 

उपज

अंगूर के बाग़ की अच्छी देखभाल करने के 3 साल बाद फल मिलने शुरू जो जाते हैं, जो 25-30 सालों तक चलते रहते हैं। उत्तर भारत में उगाई जाने वाली किस्मों से शुरू में कम उपज में इजाफा होता रहता है।

नई पूसा अदिति किस्म से अन्य किस्मों के मुकाबले ज्यादा उपज मिलती है। उत्तर भारत के किसानों को इस नई किस्म को उगा कर लाभ उठाना चाहिए।

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