जानें तरबूज की खेती करने के उन्नत तरीके

तरबूज की खेती करें और जानें तरबूज की खेती करने के उन्नत तरीके

तरबूज और खरबूज जायद मौसम की प्रमुख फसल हैं। इसकी खेती मैदानों से लेकर नदियों के पेटे में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। ये कम समय, कम खाद और कम पानी में उगाई जा सकने वाली फसलें हैं। उगने में सरल, बाजार तक ले जाने में आसानी और अच्छे बाजार भाव से इसकी लोकप्रियता बढाती जा रही हैं इसके कच्चे फलो का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता हैं। पके हुए फल मीठे, शीतल, दस्तावर एवं प्यास को शांत करते हैं।

तरबूज की खेती शुरू करने के लिए यह सही समय है। किसान तरावट देने वाले तरबूज की खेती से अच्छी कमाई कर सकते हैं। गर्मियों में इसकी मांग भी ज्य़ादा रहती है जिससे किसान बढिय़ा मुनाफा कमा सकता है।

तरबूज (Citrulus lanatus Thunb.) एक वर्षिय, उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय बेल फसल है। यह उभयलिंगाश्रयी होता है, अत: नर व मादा फूल अलग-अलग उत्पन्न होते है। फूल ज्यादातर एकल ही आता हैं। नर एवं मादा पुष्पो का खिलना प्रात: 6.00 बजे से शुरू होता है और 7.30 पर पूर्ण हो जाता है। परागकण स्फुटन पुष्पन से एक घंटे पहले शुरू होता है और 7.00  बजे तक जारी रहता है। इसमे प्राकृतिक परागण मधुमक्खी द्वारा होता है। उच्च तापमान पर वर्तिका द्रव सुखना शुरू हो जाता है

तरबूज और खरबूज के लिए उचित जल निकासी वाली बलुई दोमट मिटटी सर्वोतम हैं। मृदा का पी. एच. मान 6 से 7 तक होना चाहिए। अधिकतर नदियों के कछार में इन फसलों की खेती की जा सकती हैं।

भूमि की तैयार करें 

सामान्यतः तरबूज और खरबूज को गड्डो में लगाया जाता हैं। गड्ढे बनाने पूर्व खेत में दो बार हल एवं दो बार बखर या डिस्क हेरो चलाकर भूमि को अच्छी तरह भुरभुरी बना लेना चाहिए।

तरबूज और खरबूज की उन्नत प्रजातियां

तरबूज और खरबूज फसल की अधिक पैदावार लेने के लिए उनत जातियों को ही उगाना चाहिए।

तरबूज

सुगर बेबी

इसके फल 2-3 किलो वजन के मिठे तथा बीज छोटे व् कत्थई रंग के होते हैं।

अर्का ज्योति 

फल गोल, हरी धरी युक्त, मिठे व् 4-6 किलो वजन के होते हैं।

दुर्गापुर मीठा

फल 6-8 किलो वजनी, हराधारी युक्त होता हैं। इसका गुदा रवेदार स्वादिष्ट होता हैं।

अर्का मानिक

यह किस्म एन्थ्रेक्नोज, बुकनी रोग तथा पौध गलन रोग की निरोधक हैं।

अन्य किस्मे

पूरा बेदना, असाही यामाटो, दुर्गापुर केसर आदि।

खरबूज

पूसा शरबती

यह शीघ्र पकने वाली किस्म हैं। फल गोल व मिठास मध्यम होती हैं।

पूसा मधुरस

फल गहरी हरी धारीदार एवं पीला हरा, छिलका युक्त होता हैं।

हरा मधु

फल बड़े, मिठे, हरी धारीदार पिले रंग के होते हैं।

दुर्गापुर मधु

इसका फल बहुत मीठा एवं हल्का पीला रंग का होता हैं।

पूसा रसराज

इस किस्म का फल चिकना, धारीदार रहित होता हैं। इसका गुदा मीठा व रसदार होता हैं। इसकी उपज 200-250 क्विंटल/हेक्टेयर होता हैं।  

निम्न किस्में जानें 

अर्का जित, स्वर्णा,  अर्का राजहंस, पंजाब सुनहरी, लखनऊ बट्टी, लखनऊ सफ़ेद, शारदा एवं एनडीम 1 व 2 आदि।

फसल चक्र

भिंडी- मटर- तरबूज

बेंगन- मटर- तरबूज

जे.बी. 64 बेंगन- तरबूज

मिर्च- तरबूज

टमाटर-फ्रेंचबीन- तरबूज

सोयाबीन- हरी प्याज- तरबूज

बीजोपचार करें 

बीजो को बोने से पहले थायरम 2-3 ग्राम/ किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।  बीज को 24- 36 घंटे तक पानी में भिगोकर रखने के बाद बुवाई करने से अच्छा अंकुरण होता हैं एवं फसल 7-10 दिन पहले आ जाती हैं।

बोने का समय

तरबूज और खरबूज को दिसंबर से मार्च तक बोया जा सकता हैं किन्तु मध्य फरवरी का समय सर्वोत्तम रहता हैं। उत्तरी पश्चिमी राजस्थान में वर्षा ऋतू में मटीरा/ मतीरा किस्म की फसल ली जा सकती हैं।

बीजदर इस प्रकार 

बीजदर तरबूज के लिए 6- 8 किग्रा तथा खरबूज के लिए 4- 6 किग्रा बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए आवशयक होती हैं।

बोने की विधि को जानें 

निम्न लिखित विधिया हैं तरबूज और खरबूज को लगाने की  –

उथला गड्डा विधि जानें 

इस विधि में 60 सेमी. व्यास के 45 सेमी. गहरे एक दूसरे से 1.5-2.5 मीटर की दुरी पर गड्डे खोदते हैं। इन्हे एक सप्ताह तक खुला रखने के बाद खाद एवं उर्वरक मिलाकर भर देते हैं। इसके बाद वृहताकार थाला बनाकर 2-2.4 सेमी. गहरे 3-4 बीज प्रती थाला बोकर महीन मृदा या गोबर की खाद से ढक देते हैं। अंकुरण के बाद प्रति थाल 2 पौधे छोड़कर शेष उखाड़ देते हैं।

गहरा गड्ढा विधि जानें 

यह विधि नदी के किनारो पर अपनाई जाती हैं। इसमें 60-75 सेमी. व्यास के 1-1.5 मीटर की दुरी पर गड्डे बनाये जाते हैं। इसमें सतह से 30-40 सेमी. की गहराई तक मृदा, खाद एवं उरवर्क का मिश्रण भर दिया जाता हैं। शेष क्रिया उथला गड्ढा विधि अनुसार ही करते हैं।

इस विधि में 2 मीटर चौड़ी एवं जमीन से उठी हुई पट्टियां बनाकर उसके किनारे पर 1-1.5 मीटर की दुरी पर बीज बोते हैं।

खाद एवं उरवर्क का प्रयोग

तरबूज और खरबूज के लिए 250-300 गोबर की खाद/कम्पोस्ट, 60-80 किलो नत्रजन, 50 किलो एवं फॉस्फोरस एवं 50 किलो पोटाश , 1 हेक्टेयर के लिए आवशयकता होती हैं। गोबर की खाद/कम्पोस्ट, पोटाश स्फुर की सम्पूर्ण एवं नत्रजन की 1/3 मात्रा बोने के पहले देते हैं।

 

 

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