मटर की खेती करें उन्नत तरीके से और पाये अधिक मुनाफा

मटर की खेती

  सब्जियो मे मटर का स्थान प्रमुख है। इसकी खेती हरी फल्ली (सब्जी), साबुत मटर, एवं दाल के लिये किया जाता है। आजकल मटर की डिब्बा बंदी भी काफी लोकप्रिय है। इसमे प्रचुर मात्रा मे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, रेशा, पोटेशियम एवं विटामिन्स पाया जाता है मटर की अगेती प्रजातियों की सब्जियों के रूप में हर साल बड़ी मांग है, जिसको देखते हुए रबी सीजन की मुख्य दलहनी फसल मटर की अगेती प्रजातियों को सितंबर में बुवाई के लिए विकसित किया गया है। भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक बिजेन्द्र सिंह ने बताया '' दलहनी सब्जियों में मटर लोगों की पहली पसंद है, इससे जहां भोजन में प्रोटीन की जरूरत पूरी होती है वहीं इसकी खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति में पर्याप्त वृद्धि होती है। किसान कम अवधि में तैयार होने वाली मटर की प्रजातियों की बुवाई सितंबर से अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के मध्य तक कर सकते हैं। ''

 किसान मटर की अगेती किस्मों की खेती करके जहां सब्जियों में मटर की बढ़ी हुई मांग को पूरा कर सकते हैं वहीं इससे अपनी आमदनी भी बढ़ा सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने मटर की अगेती प्रजाति की कई किस्मों को विकसित किया है। जिसमें आजाद मटर-3, काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और काशी अगेती प्रमुख हैं। मटर की इन प्रजातियों की सबसे खास बात यह है कि यह 50 से लेकर 60 दिन में तैयार हो जाती है, जिससे खेत जल्दी खाली हो जाता और किसान दूसरी फसलों की बुवाई भी कर सकते हैं।

मटर की खेती के लिए दोमट और हल्की दोमट मिट्टी दोनों उपयुक्त हेाती है। मटर की बुवाई से पहले खेती की तैयारी के बारे में जानकारी देते हुए कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर.के. सिंह ने बताया कि पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए और उसके बाद दो से लेकर तीन जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए। बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 80 से लेकर 100 किलोग्राम बीज की जरूतर पड़‍ती है बुवाई से पहले बीजोपचार करना जरूरी होता है।

मटर को बीज जनित रोगों से बचाव के लिए थीरम 2 ग्राम या मैकोंजेब 3 ग्राम को प्रति किलो बीज की दूर से शोधन करना चाहिए। बुवाई की विधि- सब्जी मटर के लिए अगेती प्रजाजि की मटर की बुवाई से 24 घंटे पहले बीज को पानी में भिगो लें फिर छाया में सुखाकर इसकी बुवाई करें। बुवाई करने में उर्वरक का प्रयोग करने में भी विशेष् ध्यान देना चाहिए। प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम नाइट्रोजन डालना चाहिए। उत्तर प्रदेश में पिछले खरीफ सीजन 2016 में 450.00 हजार हेक्टेयर लक्ष्य की तुलना में 458.955 हजार हेक्टेयर में मटर की खेती की गई थी।

मटर की अगेती प्रजातियों की विशेषता इस प्रकार है 

  1. काशी नंदिनी- इस प्रजाजि को गौतम कुल्लू, एम सिंह की टीम ने साल 2005 में विकसित किया था। जम्मू-कश्मीर, हिमांचल प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में इसकी खेती की जाती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर औसतन 110 से लेकर 120 कुंतल मटर का उत्पादन होता है।
  2. काशी उदय- 2005 में विकसित की गई इस किस्म की यह विशेषता है कि इसकी फली की लंबाई 9 से लेकर 10 सेंटीमीटर होती है। इसकी उपज प्रति हेक्टेयर 105 कुंतल है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में इसकी अच्छे से खेती हो सकती है।
  3. काशी मुक्ति- यह प्रजाति उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार और झारखंड के लिए उपयुक्त है। इसकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 115 कुंतल होती है। इसकी फलिया काफी और दाने बड़े होते हैं। विदेशों में भी इसकी भारी मांग है।
  4. काशी अगेती- वर्ष 2015 में राजेश कुमार सिंह, बी सिंह जैसे वैज्ञानिकों ने इस किस्मको विकसित किया था। यह 50 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी फलियां सीधी और गहरी होती हैं। पौधे की लंबाई 58 से 61 सेंटीमीटर होती है। एक पौधे में 9 से लेकर 10 फलियां लगती हैं। प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 95 से 100 कुंतल होता है।

उन्नत शील किस्मे इस प्रकार 

गार्डन मटरः- इस वर्ग के किस्मो का उपयोग सब्जियो के लिये किया जाता है। इसकी प्रमुख उन्नत किस्मे निम्न है-

अगेती किस्मे (जल्दी तैयार होने वाली):- ये किस्मे बोने के लगभग 60-65 दिनो बाद पहली तुड़ाई करने योग्य हो जाती है जैसे- आर्केल, असोजी, अलास्का, लिंकोलन, काशी नंदनी, पंजाब-88, मटर अगेती-6, आजाद मटर-3, जवाहर मटर-3, हरभजन, पंत सब्जी मटर-3, पंत सब्जी मटर-5, पूसा प्रगति, काशी उदय आदि। 

फील्ड मटरः- इस वर्ग के किस्मो का उपयोग साबुत मटर, दाल के लिये, दाने एवं चारे के लिये किया जाता है। इन किस्मो मे प्रमुख रूप से रचना, स्वर्णरेखा, अपर्णा, हंस, जे.पी.-885, विकास, शुभा्र, पारस, अंबिका आदि है।

निराई-गुड़ाई एवं सिंचाईः- अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिये खेत को खरपतवारो से मुक्त रखना चाहिये। कम से कम 2 बार निराई-गुड़ाई करना चाहिये। खरपतवारो का रासायनिक नियंत्रण के लिये बासालिन या पेंडीमेथलीन 1-1.5 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर को बुंवाई से पूर्व या बुंवाई के तीन दिन बाद मृदा मे पर्याप्त नमी रहने की अवस्था मे प्रयोग करे। बीज बोने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना चाहिये। पहली सिंचाई बंुवाई के 30 दिन बाद या फूल आने से पूर्व करे एवं दूसरी सिंचाई फलियो के निर्माण के समय करना आवश्यक रहता है। सिंचाई मे ध्यान रखे कि अधिक जल भराव से फसल पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

पौध संरंक्षणः- मटर की फसल मे रोगो मे मुख्य रूप से चूर्णिल आसिता, गेरूआ एवं उकटा लगता है वही कीटो मे मुख्य रूप से फली भेदक, माहो एवं पर्ण सुरंगक नुकसान पहुंचाते है।

चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू):- इस रोग का प्रकोप शुष्क मोसम मे फलियां बनते समय होता है। सामान्यतः जल्दी तैयार होने वाली किस्मो मे यह रोग कम लगता है। इस रोग मे पत्तियों पर सफेद चूर्ण युक्त धब्बे बनने लगते हैै। रोगग्रस्त पौधा सफेद चूर्ण से ढंका दिखाई देता है जिसके कारण पौधो मे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया मंद पड़ जाती है एवं पौधे छोटे रह जाते है। रोग की तीव्रता होने पर नये फूल नही आते है एवं फलियो का विकास नही होता। फलियो मे बनने वाले दाने छोटे रह जाते है।

नियंत्रणः- जल्दी तैयार होने वाली किस्मो का चयन करना चाहिये। नत्रजन की मात्रा ज्यादा नही देनी चाहिये इससे रोग का तीव्रता बढ़ती है। फसल चक्र अपनाना चाहिये। बीजो को कार्बेंडाजिम या बाविस्टिन (3 ग्राम/कि.ग्रा. बीज) से उपचारित कर बोना चाहिये। खड़ी फसल मे रोग का प्रकोप होने पर घुलनशील गंधक (3 ग्राम) या बाविस्टिन (1 ग्राम) या केलेक्सिन (1 ग्राम) मे से किसी एक दवा को प्रति लीटर पानी मे घोलकर 15 दिन के अंतराल मे 2 बार छिड़काव करना चाहिये। रोग प्रतिरोधी किस्मो जैसे पूसा प्रगति, रचना, अंबिका, शुभ्रा, अपर्णा, अर्का अजीत, फूले प्रिया, आजाद मटर-4, जवाहर मटर-4,5 आदि को लगाना चाहिये।

गेरूआ (रस्ट):- रोग का प्रारंभिक लक्षण पौधे के हरे भागो पर पीले, गोल या लंबे धब्बे समूहो मे पाये जाते है जो बाद मे भूरे रंग मे परिवर्तित हो जाते है। यह रोग नम जलवायु वाले क्षेत्रो मे अधिक उग्रता से उत्पन्न होता है।

नियंत्रणः- फसल चक्र अपनाना चाहिये। रोगरोधी किस्मे जैसे हंस, अर्का अजीत आदि का चयन करना चाहिये। खड़ी फसल मे रोग का प्रकोप होने पर घुलनशील गंधक (3 ग्राम) या बाविस्टिन (1 ग्राम) या केलेक्सिन (1 ग्राम) मे से किसी एक दवा को प्रति लीटर पानी मे घोलकर 15 दिन के अंतराल मे 2 बार छिड़काव करना चाहिये या सल्फर पाउडर 25 कि.ग्रा. राख के साथ मिश्रण करके प्रति हेक्टेयर भुरकाव करना चाहिये।

उकटाः- इस रोग मे प्रभावित खेत की फसल हरा का हरा मुरझाकर सूख जाता है। यह रोग पौधें में किसी भी समय प्रकोप कर सकता है। अगेती फसलो मे यह रोग ज्यादा लगता है।

नियंत्रणः- गी्ष्मकालीन गहरी जुताई करके खेतों को कुछ समय के लिये खाली छोड देना चाहिये। बीज को ट्राइकोडर्मा विरडी (5 ग्राम/किलो बीज) या कार्बेंडाजिम (3 ग्राम/किलो बीज) से उपचारित करके बोना चाहिये। फसल चक्र अपनाना चाहिए। प्रभावित खडी फसल में रोग का प्रकोप कम करने के लिये गुडाई बंद कर देना चाहिए क्योंकि गुडाई करने से जडों में घाव बनतें है व रोग का प्रकोप बढता है। संक्रमित क्षेत्रो मे देरी से तैयार होने वाली किस्मो को लगाना चाहिये।

फलियो की तुड़ाई करें इस प्रकार 

इसकी फलियो की तुड़ाई किस्मो एवं फलियो के उपयोग पर निर्भर करती है। सामान्यतः अगेती किस्मे बुंवाई के 60-65 दिन बाद एवं मध्यम किस्मे बुंवाई के 85-90 दिनो बाद एवं पछेती किस्मे बुंवाई के 100-110 दिन बाद पहली तुड़ाई के लायक हो जाती है। फलियो की 7-10 दिनो के अंतराल पर 3-4 बार तुड़ाई करनी चाहिये। सब्जियो के लिये फलियो की तुड़ाई सही समय पर करनी चाहिये नही तो वे कठोर हो जाती है। जब फलियां पूर्ण विकसित हो जाये, उसका रंग गहरा हरा हो जाये, दाने भरकर विकसित हो जाये तब तुड़ाई करनी चाहिये। फलियो को सावधानी पूर्वक तोड़ना चाहिये ताकि पौधे या अन्य फूल/फलियां को नुकसान न हो।

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