मेथी की उन्नत खेती

मेथी की उन्नत खेती

मेथी की उन्नत खेती

मेथी उत्तरी भारत की पत्तियों वाली सब्जी की मुख्य फसल है । इस फसल की प्रारम्भिक अवस्था में पत्तियों को प्रयोग किया जाता है । यह लगभग भारत वर्ष में सभी

जगह उगायी जाती है । मेथी की फसल को पहाड़ी क्षेत्रों में भी आसानी से उगाया जा सकता है जो कि शरद ऋतु के मौसम में पैदा की जाती है ।

थी की खेती पूरे भारतवर्ष में की जाती है, इसका सब्जी में केवल पत्तियों का प्रयोग किया जाता है इसके साथ ही बीजो का प्रयोग किया जाता हैI इसकी खेती मुख्यरूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में की जाती हैI   मेथी के सूखे दानो का उपयोग मसाले के रूप मे, सब्जियो के छौकने व बघारने, अचारो मे एवं दवाइयो के निर्माण मे किया जाता है। इसकी भाजी अत्यंत गुणकारी है जिसकी तुलना काड लीवर आयल से की जाती है।
इसके बीज में डायोस्जेनिंग नामक स्टेरायड के कारण फार्मास्यूटिकल उधोग में इसकी मांग रहती है। इसका उपयोग विभिन्न आयुर्वेदिक दवाओं को बनाने में किया जाता है।

जलवायु 

मेथी शरदकालीन फसल है तथा इसकी खेती रबी के मौसम में की जाती है यह पाले के आक्रमण को भी सहन कर लेती । इसकी वानस्पतिक वृद्धि के लिए लम्बे ठंडे मौसम, आर्द्र जलवायु तथा कम तापमान उपयुक्त रहता है। फूल बनते समय या दाने बनते समय वायु में अधिक नमी और बादल छाये रहने पर बीमारी तथा कीड़ों का प्रकोप बढ़ जाता है। फसल पकने के समय ठण्डा एवं शुष्क मौसम उपज के लिये लाभप्रद होता है। 

भूमि 

दोमट या बलुर्इ दोमट मृदा, जिसमें कार्बनिक पदार्थ प्रचुर मात्रा में हो एवं उचित जल निकास क्षमता हो इसकी सफल खेती के लिये जीवांश युक्त दोमट भूमि सर्वोत्तम उत्तम मानी जाती है। भूमि का पी.एच.मान 6 से 7 होना चाहिए
भूमि की तैयारी 
खेत साफ स्वच्छ एवं भुरभुरा तैयार होना चाहिए अन्यथा अंकुरण प्रभावित होता है। खेत की अंतिम जुताई के, समय सके। जुतार्इ के बाद पाटा अवश्य चलाना चाहिये ताकि नमी संरंक्षित रह सके।

उन्नतशील किस्में

इसकी किस्मो मे लाम सेलेक्शन-1, गुजरात मेथी-2, आर.एम.टी.-1, राजेन्द्र क्रांति, हिसार सोनाली, कोयंबटूर-1 आदि प्रमुख उन्नतशील किस्में हैं।

बीज दर एवं बीजोपचार 

इसकी 20-25 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर लगता है। बीज को बोने के पूर्व फफूँदनाशी दवा उपचारित किया जावे।

बुवार्इ का समय एवं तरीका

मैदानी इलाको मे फसल की बुवार्इ के लिए मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर तक का समय एवं पर्वतीय क्षेत्रो मे मार्च-अप्रेल सर्वोत्तम रहता है। देरी से बुंवार्इ करने पर उपज कम प्राप्त होती है। अधिक उत्पादन के लिये इसकी बुंवार्इ पंकितयो मे 25 से.मी. कतार से कतार दूरी पर 10 से.मी. पौधे से पौधे की दूरी के हिसाब से करते हैं। बीज की गहरार्इ 5 से.मी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

गोबर या कम्पोस्ट खाद (10-15 टन/हे.) खेत की तैयारी के समय देवें।  यह दलहनी फसल है इसलिये इसका जड़ नाइट्रोजन अवस्था है अत: फसल को कम नाइट्रोजन देने की आवश्यकता पड़ती है। मेंथी की खेती करते समय नीम की पत्ती, तम्बाकू धतूरा मिला कर बोये 15 से 18 दिनों के बाद 

रासायनिक खाद के रूप मे 20-25 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40-50 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 20-30 कि.ग्रा. पोटाश/हे. बीज बुंवार्इ के समय ही कतारों में दिया जाना चाहिये। यदि किसान उर्वरको की इस मात्रा को यूरिया, सिंगल सुपर फास्फेट एवं म्यूरेट आफ पोटाश के माध्यम से देना चाहता है तो 1 बोरी यूरिया, 5 बोरी सिंगल सुपर फास्फेट एवं 1 बोरी म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है।

सिंचार्इ एवं जल निकास

मेथी के उचित अंकुरण के लिये मृदा मे पर्याप्त नमी का होना बहुत जरूरी है। खेत मे नमी की कमी होने पर हल्की सिंचार्इ करना चाहिये। भूमि प्रकार के अनुसार 10-15 दिनों के अंतर से सिंचार्इ करें। खेत में अनावश्यक पानी के जमा होने से फसल पीला होकर मरने लगता है अत: अतिरिक्त पानी की निकासी का प्रबंध करना चाहिये।

पौध संरक्षण

खरपतवार नियंत्रण 
बोनी के 15 एवं 40 दिन बाद हाथ से निंदार्इ कर खेत खरपतवार रहित रखें। 

रोग एवं कीट नियंत्रण 
जड़ गलन रोग के बचाव के लिए जैविक फफूँदनाशी ट्राइकोडर्मा से बीज उपचार एवं मृदा उपचार करना चाहिए। फसल-चक्र अपनाना चाहिए। भभूतिया या चूर्णिल आसिता रोग के लिए कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत एवं घुलनशील गंधक की 0.2 प्रतिशत मात्रा का छिड़काव करना चाहिए। माहो कीट का प्रकोप दिखार्इ देने पर 0.2 प्रतिशत डाइमेथोएट (रोगार) या इमिडाक्लोप्रिड 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें एवं खेत में दीमक का प्रकोप दिखार्इ देने पर क्लोरपायरीफास 4 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचार्इ के पानी के साथ खेत में उपयोग करे।

कटार्इ एवं गहार्इ 
मेथी की कटाई इसके किस्मो एवं उपयोग मे लाये जाने वाले भाग पर निर्भर करता है। सब्जियो के लिये पहली कटाई मेथी पत्ती की हरी अवस्था मे बंवाई के लगभग 4 सप्ताह बाद चालू हो जाती है। पौधे को भूमि सतह के पास से काटते है। सामान्यतः 4-5 कटाई नियमित अंतराल पर ली जाती है। दानो के लिये इसकी कटाई जब फसल पीली पड़ने लगे तथा अधिकांश पत्तियाँ ऊपरी पत्तियों को छोड़कर गिर जायें एवं फलियो का रंग पीला पड़ जाये तो फसल की कटाई करनी चाहिए क्योकि सही अवस्था मे कटाई ना करने से फलियो से दानो का झड़ना प्रारंभ हो जाता है। कटाई के बाद पौधो को बंडलो मे बांधकर 1 सप्ताह के लिये छाया मे सुखाया जाता है सूखाने के बाद बंडलो को पक्के फर्श या तिरपाल पर रखकर लकडि़यो की सहायता से पीटा जाता है जिससे दाने फलियो से बाहर आ जाता है। इस काम के लिये थ्रेसर का उपयोग भी किया जा सकता है। दानो को साफ करने के बाद बोरियो मे भरकर नमी रहित हवादार कमरो मे भंडारित करना चाहिये।

उपज
इसकी उपज भी किस्मो एवं उपयोग मे लाये जाने वाले भाग पर निर्भर करता है। यदि उन्नत किस्मो एवं सही समय पर उचित शस्य क्रियाओ को अपनाया जाये तो 50-70 किंवटल हरी पत्तियां सब्जी के लिये एवं 15-20 किंवटल दाने मसालो एवं अन्य उपयोगो के लिये प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त हो जाते है

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