शलजम की खेती कैसे करें

शलजम की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु 

शलजम की फसल को लगभग सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है । लेकिन सफल-उत्पादन प्राप्त करने के लिए हल्की चिकनी दोमट या बलुई दोमट भूमि अति उत्तम सिद्ध हुई है । भूमि में जल-निकास ठीक होना चाहिए व भूमि उपजाऊ होनी चाहिए ।

शलजम शरद-ऋतु की फसल है । इसलिये ठण्डी जलवायु की आवश्यकता पड़ती है । यह अधिक ठन्ड व पाले को सहन कर लेती है । अच्छी वृद्धि के लिये ठन्ड व आर्द्रता वाली जलवायु सर्वोत्तम रहती है । पहाड़ी क्षेत्र में पैदावार अधिक मिलती है ।

शलजम की खेती के लिए खेत की तैयारी 

खेत जुताई में मूली की फसल की तरह करनी चाहिए तथा अन्य क्रियाएं, जैसे घास व ठूंठ आदि को बाहर निकाल कर जला दें तथा भूमि को बिल्कुल भुरभुरा करें तथा छोटी-छोटी क्यारियां बना ले

शलजम की उन्नतशील किस्में 

  1. लाल-4 व सफेद-4- ये किस्म शीघ्र तैयार होने वाली है । लाल किस्म को अधिकतर शरद ऋतु में लगाते हैं । जड़ें गोल, लाल तथा मध्यम आकार की होती हैं जो 60 दिन में तैयार हो जाती है ।

सफेद-4 को अधिकतर वर्षा ऋतु में लगाते हैं । यह शीघ्र तैयार होती है तथा इसकी जड़ों का रंग बर्फ जैसा सफेद होता है । गूदा चरपराहट वाला होता है । ये  50-55 दिन में तैयार हो जाती है । उपज 200 कु. प्रति हैक्टर मिलती है ।

  1. परपल-टोप (Purple Top)- जड़ें बड़े आकार की, ऊपरी भाग बैंगनी, गूदा सफेद तथा कुरकुरा होता है । यह अधिक उपज देती है । इसका गूदा ठोस तथा ऊपर का भाग चिकना होता है ।
  2. पूसा-स्वर्णिमा (Pusa Swarnima)- इस किस्म की जड़ें गोल, मध्य आकार वाली, चिकनी तथा हल्के पीले रंग की होती हैं । गूदा भी पीलापन लिये होता है । यह 65-70 दिन में तैयार हो जाती है । सब्जी के लिये उत्तम है ।
  3. पूसा-चन्द्रिमा (Pusa Chandrima)- यह किस्म 55-60 दिन में तैयार हो जाती है । इसकी जड़ें गोलाई लिये हुए होती है । यह अधिक उपज देती हैं । उपज 200-250 कु. प्रति हैक्टर देती है । जाड़ों के लिए उत्तम है ।
  4. पूसा-कंचन (Pusa Kanchan)- यह किस्म रेड एसीयाटिक किस्म तथा गोल्डन-वाल के द्वारा तैयार की गयी है । छिलका ऊपर से लाल, पीले रंग का गूदा होता है । यह अगेती किस्म है जो शीघ्र तैयार होती है । जड़ें मीठी व सुगन्धित होती हैं ।
  5. पूसा-स्वेती (Pusa Swati)- यह किस्म भी अगेती है । बुवाई अगस्त-सितम्बर में की जाती है । जड़ें काफी समय तक खेत में छोड़ सकते हैं । जड़ें चमकदार व सफेद होती हैं । 40-45 दिन में खाने लायक होती है ।
  6. स्नोवाल (Snowal)- अगेती किस्मों में से है । इसकी जड़ें मध्यम आकार की, चिकनी, सफेद एवं गोलाकार होती हैं । गूदा नरम, मीठा होता है ।

बीज की मात्रा एवं बुवाई का समय 

शलजम का बीज समय व किस्म 4 किलो बीज प्रति हैक्टर बोना चाहिए जिसमें अंकुरण की 90-95% क्षमता है ।

बुवाई का समय जुलाई-नवम्बर तक होता है । अगेती, मध्य तथा पिछेती किस्मों को आवश्यकतानुसार बोना चाहिए । बुवाई कतारों में 30 सेमी. की दूरी पर करें तथा पौधा 10-15 सेमी. पर रखें | बुवाई छिडक कर भी कर सकते हैं ।

बगीचों के लिए बीज की मात्रा 8-10 ग्राम 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र के लिये पर्याप्त होता है जिसे उपरोक्त समय के अनुसार बोयें तथा गर्भ में 4-5 बीज बोयें ।

खाद एंव उर्वरकों का प्रयोग 

शलजम की फसल के लिए 20-25 ट्रैक्टर- ट्रौली सड़ी गोबर की खाद मिटटी में मिलायें तथा उर्वरक- 80 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस तथा 50 किलो पोटाश प्रति हैक्टर प्रयोग करना चाहिए | 325 किलो यूरिया में से 160 किलो यूरिया व 310 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा 82 किलो म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हैक्टर बुवाई से 15 दिन पहलें मिट्टी में भली-भांति मिलायें तथा शेष मात्रा को दो भागों में करके बुवाई से 15-20 दिन बाद पानी लगाने के 4-5 दिन बाद तथा दूसरी मात्रा को बोने से 35-40 दिन के बाद खड़ी फसल में छिड़क दें | इस प्रकार से फसल की वृद्धि अधिक होती है ।

शलजम के पौधों की सिंचाई 

बोते समय खेत में नमी अवश्य होनी चाहिए । यदि खेत सूखा हो तो हल्की पलेवा कर के बोयें । बोने से 15-18 दिन बाद प्रथम पानी दें । पलेवा ना करें तो 10-12 दिन के बाद हल्का पानी दें । अन्य सिंचाई नमी के अनुसार 1 2-15 दिन के बाद करते रहें । पहली सिंचाई के बाद थीनिंग का भी ध्यान रखें जिससे वृद्धि ठीक हो सके ।

खरपतवार नियन्त्रण 

शलजम की फसल में जाड़े वाले खरपतवार हो जाते हैं । इनके लिए निकाई-गुड़ाई करना जरूरी है । जड़ों के बढ़ने से पहले हल्की-हल्की मिट्‌टी चढ़ाये जिससे जड़ों का ठीक विकास हो सके तथा यूरिया की दूसरी मात्रा मिट्‌टी चढ़ने के बाद डालें ।

फसल-सुरक्षा (Plant Protection)- शलजम की फसल पर अधिक कीट व रोग नहीं लगते । लेकिन पिछेती फसल में कीट व रोग लग जाते हैं ।

कीट (Insect)- जैसे- एफिडस व पत्ती काटने वाला कीड़ा । इन दोनों के लिए मेटासिस्टमस या मेलाथियान 2 मिली. दवा एक लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से आक्रमण नहीं होता । दवा के 10-12 दिन बाद पत्ती व जड़ों को धोकर प्रयोग करें ।

रोगों से शलजम के पौधों की सुरक्षा कैसे करें 

अधिकतर पाउडरी-मिल्डयू लगता है । यह भी पत्तियों को प्रभावित करता है । पत्तियां सफेद-सी हो जाती हैं । नियन्त्रण के लिए फंजीसाइड बेवस्टिन या डाईथेन एम-45 के 0.2% के घोल का प्रयोग करें । जड़ों को धोकर खाने में प्रयोग करें ।

खुदाई 

खुदाई या कटाई आवश्यकतानुसार समय-समय पर करते हैं । खुदाई करने की अलग-अलग अवस्थाएं हैं । 20-25 दिन की फसल की पत्तियों के लिए उखाड़ लेते हैं तथा जड़ों के लिये आकार बढ़ने पर खोदते हैं । जड़ों को समय से ही खोद लें जिससे स्वाद ना बदलें । खुदाई खुरपी या फावड़े से करें तथा जड़ें कट न पायें । जड़ों को धोकर तथा साफ करके बाजार ले जाना चाहिए ।

उपज 

शलजम की पत्तियों के अतिरिक्त जड़ें-कृषि-क्रियाएं समय से करने पर 500-600 क्विंटल प्रति हैक्टर आसानी से पैदा की जा सकती हैं ।

बगीचों में 15-20 किलो 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र में जड़ें पैदा की जाती हैं तथा समय-समय पर खोद कर सब्जी में प्रयोग की जाती

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