खेती

सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका

सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका

पोटेशियम एक प्राथमिक सेब का पोषक तत्व है, जो उच्च गुणवत्ता वाले फल और अधिकतम पैदावार प्राप्त करने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है| पोटेशियम नाइट्रोजन के बाद  पौधों के लिए ज़रूरी दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है जो कई वनस्पति  विकास की प्रक्रिया के लिए आवश्यक है। सेब के पेड़ किसी भी अन्य पोषक तत्वों से अधिक  मात्रा में पोटेशियम को अवशोषित करते है|  सेब के पेड़ को नाइट्रोजन की तुलना में पोटेशियम की लगभग दोगुनी मात्रा की आवश्यकता होती है। अधिक पैदावार और गुणवत्ता के लिए फलों को पोटेशियम की उच्च मात्रा की आवश्यकता होती है। पोटेशियम पौधों के किसी भी भाग को नहीं बनता है, इसलिए इसकी भूमिका अप्रत्

पानी के उचित प्रबंधन की जरूरत

पानी के उचित

इजराइल के मुकाबले भारत में जल की उपलब्धता पर्याप्त है। लेकिन वहां का जल प्रबंधन हमसे कहीं ज्यादाबेहतर है। इजराइल में खेती, उद्योग, सिंचाई आदि कार्यों में रिसाइकिल्ड पानी का उपयोग अधिक होता है।  इसीलिएउस देश के लोगों को पानी की दिक्कत का सामना नहीं करना पडता। भारत जैसे विकासशील देश में 80% आबादी कीपानी की जरूरत भूजल से पूरी होती है और इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उपयोग में लाया जारहा भूजल प्रदूषित होता है। कई देश, खासकर अफ्रीका तथा खाड़ी के देशों में भीषण जल संकट है। प्राप्त जानकारी केअनुसार दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में रह रहे करोड़ों लोग जबरदस्त जल संकट का सामना कर रहे हैं 

नई राष्ट्रीय जल नीति जरुरी

देश में पिछले 70 सालों में तीन राष्ट्रीय जल नीतियां बनी। पहली नीति 1987 में बनी जबकि 2002 में  दूसरीऔर 2012 में तीसरी जल नीति बनी। इसके अलावा 14 राज्‍यों ने अपनी जलनीति बना ली है। बाकी राज्य तैयार करनेकी प्रक्रिया में हैं। इस राष्ट्रीय नीति में "जल को एक प्राकृतिक संसाधन मानते हुए इसे जीवन, जीविका, खाद्य सुरक्षाऔर निरंतर विकास का आधार माना गया है।" नीति में जल के उपयोग और आवंटन में समानता तथा सामाजिकन्याय का नियम अपनाए जाने की बात कही गई है। मंत्रालय का कहना है कि भारत के बड़े हिस्से में पहले ही जलकी कमी हो चुकी है। जनसंख्यावृद्धि, शहरीकरण और जीवनशैली में बदलाव से जल की मांग तेजी से बढने के

यूरिया का संतुलित उपयोग

यूरिया का संतुलित

देश में साल दर साल बढ़ते कृषि उत्पादन और सतत् खाद्य सुरक्षा में फसलों के पोषण की अहम भूमिका है। संतुलित पोषण से ऊर्जावान खेत किसान को अधिकाधिक उपज की भेंट देते हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश मुख्य पोषक तत्व हैं, जो अधिकांश खेतों में लगभग अनिवार्य रूप से लगाए जाते हैं। इसके अलावा सल्फर, जिंक और बोरोन कुछ महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्व हैं, जिन्हें भूमि की जरूरत के हिसाब से किसान खेतों में डालते हैं। इन सबके बीच यदि सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व की बात करें तो नाइट्रोजन का नाम सबसे ऊपर आता है। खेतों में नाइट्रोजन की आपूर्ति मुख्य रूप से यूरिया नामक उर्वरक द्वारा की जाती है। यूरिया में 46 प्रतिशत

मिट्टी में ‘हीमोग्लोबिन’ की कमी

मिट्टी में ‘हीमोग्लोबिन’ की कमी

हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न उत्पादन में तो देश आत्मनिर्भर तो हो गया, परंतु रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की सेहत खराब हो गई। खेती के लिए जरूरी मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी के कारण फसल का दाना (बीज) कमजोर होने लगा है। इसके लिए खेतों के किनारे पक्षी आश्रय स्थल बनाकर व मेड़ पर फूलों के पौधे लगाकर फिर से मिट्टी की सेहत ठीक कर सकते हैं। मिट्टी में नाइट्रोजन की वही भूमिका होती है, जो मनुष्य की शरीर में हीमोग्लोबिन की होती है।

 

गुलाब के पौधों की सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है ये प्राकृतिक खाद

गुलाब के पौधों

अगर आप घर सजाने के शौकीन हैं तो गुलाब का कम से कम एक पौधा तो आपके घर जरूर होगा और इसमें खूब सारे फूल खिलते भी देखना चाहते होंगे. तो इसके लिए रसायनिक खाद की बजाय प्राकृतिक खाद का इस्तेामाल करें. घर में मौजूद कुछ चीजें ही घर में खूबसूरत गुलाब महकाने के लिए काफी हैं. जानिए इस बारे में -
1. अगर आपके पास कॉफी सीड्स हैं तो इनको दरदरा पीसकर गुलाब के पौधों के लिए खाद के रूप में इस्तेमाल करें. इसमें पोटैशियम, मैग्नीशियम, नाइट्रोजन और दूसरे जरूरी तत्व मौजूद होते हैं जो पौधों को बढ़ने में मदद करते हैं.

रसायनिक खेती से मिटटी का वो कोनसा अंग या भाग खत्म हुआ जिसे वापस लाने को हम जैविक खेती करने चलें हैं?

रसायनिक खेती से मिटटी का वो कोनसा अंग या भाग खत्म हुआ जिसे वापस लाने को हम जैविक खेती करने चलें हैं?

रासायनिक खेती से खेतों में स्थापित सूक्ष्मतंत्र नष्ट हो गया. इससे खेतों में कार्बनिक पदार्थ, सूक्ष्मजीवों की संख्या और लाभदायक जीव जैसे केंचुए आदि नष्ट हो गए. धीरे धीरे खेतों में कार्बन और नाइट्रोजन का अनुपात बिगड़ गया. तथा आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा में भी कमी आई.
 

भारतीय गाय इस धरती पर सभी गायो मे सर्वश्रेष्ठ क्यूँ है ?

यह जानकार आपको शायद झटका लगेगा की हमने अपनी देशी गायों को गली-गली आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया है । क्यूंकी वे दूध कम देती हैं । इसलिए उनका आर्थिक मोल कम है , लेकिन ब्राज़ील हमारी इन देशी गायो की नस्ल का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है । जबकि भारत अमेरिका और यूरोप से घरेलू दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए विदेशी प्रजाती की गायों का आयात करता है । वास्तव मे 3 महत्वपूर्ण भारतीय प्रजाती गिर, कंकरेज , व ओंगल की गाय जर्सी गाय से भी अधिक दूध देती हैं ।

मशीन रोपाई के लिए पहला कदम चटाई नुमा नर्सरी तैयार करना होता है

मशीन रोपाई

धान रोपाई के परंपरागत तरीकों में बीज को नर्सरी में बोया जाता है फिर पौधे को धीरे से निकाल कर साफ करके गुच्छा बनाकर जुताई किए गए मिट्टी में बोया जाता है। हाथ से रोपाई करने का काम बहुत मुश्किल एवं थकाने वाला काम होता है। धान के रोपाई में कई घंटे तक झुककर काम करने से कई महिला एवं पुरूष के परिस्थिति कई पीढ़ी से किसानी काम का दर्दनाक हिस्सा है। आज के समय में खेती मजदूरों के फैक्ट्रियों एवं दूसरे कामों में जाने के कारण रोपाई के समय में मजदूरों में काफी कमी आ गई है। नया तकनीक और किसानी काम में विकास के कारण हाथ रोपाई की जगह अब मशीन रोपाई ले रही है। और इसके लिये धान रोपाई मशीन एक अच्छा उपाय है। मशी

एलोवेरा की खेती भी किसानों को लाभ देती

ग्वारपाठा, घृतकुमारी या एलोवेरा जिसका वानस्पतिक नाम एलोवेरा बारबन्डसिस हैं तथा लिलिऐसी परिवार का सदस्य है। इसका उत्पत्ति स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है। एलोवेरा को विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है, हिन्दी में ग्वारपाठा, घृतकुमारी, घीकुंवार, संस्कृत में कुमारी, अंग्रेजी में एलोय कहा जाता है। एलोवेरा में कई औषधीय गुण पाये जाते हैं, जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों के उपचार में आयुर्वेदिक एंव युनानी पद्धति में प्रयोग किया जाता है जैसे पेट के कीड़ों, पेट दर्द, वात विकार, चर्म रोग, जलने पर, नेत्र रोग, चेहरे की चमक बढ़ाने वाली त्वचा क्रीम, शेम्पू एवं सौन्दर्य प्रसाधन तथा सामान्य

Pages