खेती

सेहत से खेलता रसायनों का ज़हर

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खेती में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से कहीं, 07 वर्ष की लड़कियों में माहवारी शुरू हो रही है, तो कहीं मनुष्यों के सेक्स में ही परिवर्तन हुआ जा रहा है। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया में 25 लाख लोग प्रतिवर्ष कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के शिकार होते हैं, जिसमें से 05 लाख लोग काल के गाल में समा जाते हैं। फसलों में कीटनाशकों का बढ़ता हुआ प्रयोग क्या कहर बरपा रहा है, पढें इस शोधपरक लेख में।
खेतों के ज़रिये शरीर में उतरता ज़हर
कृषि रसायनों से दूषित होता पर्यावरण एवं स्वास्थ्य Read More : सेहत से खेलता रसायनों का ज़हर about सेहत से खेलता रसायनों का ज़हर

यूरिया जहर है !

यूरिया जहर है !

हम बिना जुताई की कुदरती खेती करते हैं जिसमे हम किसी भी प्रकार की मानव निर्मित खाद और दवाई का उपयोग नहीं करते हैं। हमने यह पाया है की जब हमारे पडोसी अपने खेतों में यूरिया डालते हैं और सिंचाई करते हैं तो पानी यहां वहां डबरों में भर जाता है उस पानी से मेंढक ,मछलियाँ मर जाती हैं यदि उस पानी को मवेशी पी लेते हैं तो वो भी मर जाते हैं। हमारे स्वम् के मवेशी भी अनेक बार मरे हैं। Read More : यूरिया जहर है ! about यूरिया जहर है !

पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का वर्गीकरण

पौधे जडो द्वारा भूमि से पानी एवं पोषक तत्व, वायु से कार्वन डाई आक्साइड तथा सूर्य से प्रकाश ऊर्जा लेकर अपने विभिन्न भागों का निर्माण करते है।
पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है।

मुख्य पोषक तत्व- नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश।
गौण पोषक तत्व- कैल्सियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक।
सूक्ष्म पोषक तत्व- लोहा, जिंक, कापर, मैग्नीज, मालिब्डेनम, बोरान एवं क्लोरीन।

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भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत

भारत में भी वही तमाम समस्याएं हैं जिसमें पानी की बचत कम, बर्बादी ज्यादा है। यह भी सच्चाई है किबढ़ती आबादी का दबाव, प्रकृति से छेड़छाड़ और कुप्रबंधन भी जल संकट का एक कारण है। पिछले कुछ सालों सेअनियमित मानसून और वर्षा ने भी जल संकट और बढ़ा दिया है। इस संकट ने जल संरक्षण के लिए कई राज्यों कीसरकारों को परंपरागत तरीकों को अपनाने को मजबूर कर दिया है। देश भर में छोटे- छोटे बांधों के निर्माण औरतालाब बनाने की पहल की गयी है। इससे पेयजल और सिंचाई की समस्या पर कुछ हद तक काबू पाया जा सका है।भारत में तीस प्रतिशत से अधिक आबादी शहरों में रहती है। आवास और शहरी विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं किदेश के लगभ Read More : भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत about भारत में प्रभावी जल प्रबंधन की जरूरत

जीवामृत निर्माण में सभी अवयवों गोबर, गौमूत्र, दाल का आटा और मिट्टी का क्या रोल है?

गोबर में कई प्रकार के लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं जो कार्बनिक पदार्थ को विघटित करने में सहयोगी हैं. इसी प्रकार मिट्टी में भी लाभदायक सूक्ष्मजीव होते हैं जोकि अपनी विशिष्ट जैव क्रियाशीलता के द्वारा खेतों में उपलब्ध जटिल अवयवों का सरलतम रूप में विघटन करने के लिए आवश्यक हैं ताकि पौधे जड़ों द्वारा अवशोषण कर सकें. जीवामृत में गोबर और मिट्टी से इन्ही सूक्ष्मजीवों को प्राप्त करके अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान कर गुणन किया जाता है.
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देशी केंचुए मिटटी में किस तरह काम करते हैं और इनके काम का क्या फायदा होता है ?

देशी केंचुए

किसान अपने खेतो में वो सब कुछ करता है जो उसकी फसल एवं उत्पादन के लिए आवश्यक है पर वह कुछ गलतियों उनके द्वरा हो जाती है जिससे उत्पादन में कमी और मिट्टी की गुणवत्ता पर बुरा असर पढता है मिट्टी की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए हमें मिट्टी को पलते रहना चाहिए, मिट्टी ऊपर की मिट्टी नीचे नीचे की ऊपर ऊपर की नीचे ,नीचे की ऊपर ये केंचुआ ही करता है, केंचुआ किसान का सबसे अच्छा दोस्त है, एक केंचुआ साल भर जिंदा रहे तो एक वर्ष मे 20 मीट्रिक टन मिट्टी को उल्ट पलट कर देता है और उतनी ही मिट्टी को ट्रैक्टर से उल्ट पलट करना पड़े तो हजारो रूपये का डीजल लग जाता है! Read More : देशी केंचुए मिटटी में किस तरह काम करते हैं और इनके काम का क्या फायदा होता है ? about देशी केंचुए मिटटी में किस तरह काम करते हैं और इनके काम का क्या फायदा होता है ?

ह्यूमस की प्राप्ति के दो स्रोत हैं

किसी एक भूमि में बारबार फसल के उगाने और उसमें खाद न देने से कुछ समय के बाद भूमि अनुत्पादक और ऊसर हो जाती है। भूमि की उर्वरता के नाश होने का प्रमुख कारण भूमि से उस पदार्थ का निकल जाना है जिसका नाम 'ह्यूमस (Humus) दिया गया है। ह्यूमस कार्बनिक या अखनिज पदार्थ है जिसकी उपस्थिति से ही भूमि उर्वर होती है। वस्तुतः ह्यूमस वानस्पतिक और जांतव पदार्थों के विघटन से बनता है। सामान्य हरी खाद, गोबर, कंपोस्ट इत्यादि खादों और पेड़ पौधों, जंतुओं और सूक्ष्म जीवाणुओं से यह बनता है। ह्यूमस के अभाव में मिट्टी मृत और निष्क्रिय हो जाती है और उसमें कोई पेड़ पौधे नहीं उगते। Read More : ह्यूमस की प्राप्ति के दो स्रोत हैं about ह्यूमस की प्राप्ति के दो स्रोत हैं

नीलगाय के आतंक से न हों परेशान

अन्नदाताओं को अब नीलगाय के आतंक से परेशान होने की जरूरत नहीं है। अब उन्हें बिना मारे ही इनके आतंक से छुटकारा मिलेगा, वहीं फसलों की भी सुरक्षा होगी। नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए हर्बल घोल तैयार किया जाता है जिसके प्रयोग करनें से नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुचती है Read More : नीलगाय के आतंक से न हों परेशान about नीलगाय के आतंक से न हों परेशान

सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका

सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका

पोटेशियम एक प्राथमिक सेब का पोषक तत्व है, जो उच्च गुणवत्ता वाले फल और अधिकतम पैदावार प्राप्त करने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है| पोटेशियम नाइट्रोजन के बाद  पौधों के लिए ज़रूरी दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है जो कई वनस्पति  विकास की प्रक्रिया के लिए आवश्यक है। सेब के पेड़ किसी भी अन्य पोषक तत्वों से अधिक  मात्रा में पोटेशियम को अवशोषित करते है|  सेब के पेड़ को नाइट्रोजन की तुलना में पोटेशियम की लगभग दोगुनी मात्रा की आवश्यकता होती है। अधिक पैदावार और गुणवत्ता के लिए फलों को पोटेशियम की उच्च मात्रा की आवश्यकता होती है। पोटेशियम पौधों के किसी भी भाग को नहीं बनता है, इसलिए इसकी भूमिका अप्रत् Read More : सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका about सेब में पोटेशियम (K) की भूमिका

यूरिया का संतुलित उपयोग

यूरिया का संतुलित

देश में साल दर साल बढ़ते कृषि उत्पादन और सतत् खाद्य सुरक्षा में फसलों के पोषण की अहम भूमिका है। संतुलित पोषण से ऊर्जावान खेत किसान को अधिकाधिक उपज की भेंट देते हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश मुख्य पोषक तत्व हैं, जो अधिकांश खेतों में लगभग अनिवार्य रूप से लगाए जाते हैं। इसके अलावा सल्फर, जिंक और बोरोन कुछ महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्व हैं, जिन्हें भूमि की जरूरत के हिसाब से किसान खेतों में डालते हैं। इन सबके बीच यदि सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व की बात करें तो नाइट्रोजन का नाम सबसे ऊपर आता है। खेतों में नाइट्रोजन की आपूर्ति मुख्य रूप से यूरिया नामक उर्वरक द्वारा की जाती है। यूरिया में 46 प्रतिशत Read More : यूरिया का संतुलित उपयोग about यूरिया का संतुलित उपयोग

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