खेती

उर्वरकों का सही समय व सही तरीके से उपयोग

सघन खेती एवं असंतुुलित उर्वरक उपयोग के कारण कृषि भूमि में पोषक तत्वों की उपलब्ध मात्रा में कमी एवं असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती जा रही है, फलस्वरूप भूमि की उर्वरता एवं उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस उत्पादन में पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण योगदान है इसलिए उर्वरकों के बढ़ते मूल्यों को देखते हुए इनके कुशल समुचित और समन्वित उपयोग करना आवश्यक हो गया है परंतु महत्वपूर्ण तो यह है कि उर्वरकों की क्षमता को कैसे बढ़ाया जाए अर्थात् जो उर्वरक हम उपयोग कर रहे हैं उनका पौधा भरपूर उपयोग कैसे करें। क्योंकि जो हम नत्रजन उपयोग करते हैं उसका 40 से 60 प्रतिशत तथा फास्फोरस का 15 से 20 प्रतिशत ही पौ Read More : उर्वरकों का सही समय व सही तरीके से उपयोग about उर्वरकों का सही समय व सही तरीके से उपयोग

किसी भी जीवित पोधे के शरीर में सबसे ज्यादा मात्रा किस तत्व/योगिक की होती है, दूसरे नं पर क्या और बाकी क्या ?

भारात्मक आधार पर रासायनिक रूप से पेड़-पौधों 65 से 70 प्रतिशत जल 25 से 30 प्रतिशत कार्बन एवं ढाई से तीन प्रतिशत सूक्ष्म तत्व (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) होते हैं. 
पदार्थों के प्रकार के अनुसार सर्वाधिक रूप से जल की मात्रा होती है। इसे पेड़ पौधे भूमि से जड़ों द्वारा अवशोषित करते हैं। इसके पश्चात कार्बन होता है जोकि जटिल कार्बनिक यौगिकों के रूप में होता है। पौधों के लिए इसका मुख्य स्रोत वायुमंडल में उपलब्ध CO2 गैस है। 
पेड़-पौधे के समुचित विकास निम्न पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है, इन तत्वों को निम्न चार वर्गों में बाँटा गया है:
मूल तत्व - कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन
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जैविक खेती का एक आसान तरीका.

जैविक खाद ( एक एकड़ खेत के लिए ) कैसे बनाये !
एक पलास्टिक के ड्रम में नीचे लिखी पाँच चीजों को आपस में मिला लें.
10 किलो गोबर ( देशी गाय का, बैल का, या भैंस का )
10 लीटर मूत्र (देशी गाय का, बैल का, या भैंस का )
1 किलो गुड़ ( कैसा भी चलेगा, जो सड़ गया हो आपके उपयोग का ना हो तो वो ज्यादा अच्छा है )
अब इसमे 1 किलो पिसी हुई दाल या चोकर (कैसा भी चलेगा, आपके उपयोग का ना हो तो ज्यादा अच्छा )
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मेढऩाली पद्धति से सोयाबीन की खेती-

मेढ़़वाली पद्धति से सोयाबीन की बुवाई करने से वर्षा की अनिश्चितता से होने वाली हानि की संभावना को कम किया जा सकता है। मेढऩाली पद्धति में बीजाई मेढ़ो पर की जाती है तथा दो मेढ़ों के मध्य लगभग 15 से.मी. Read More : मेढऩाली पद्धति से सोयाबीन की खेती- about मेढऩाली पद्धति से सोयाबीन की खेती-

धान के पोषण में विभिन्न पोषक तत्वों की भूमिका

धान की नाइट्रोजन आवश्यकता बहुत अधिक है। फसल लगभग पकने के समय तक नाइट्रोजन चाहती है फिर भी कल्ले बनने की अवस्था में नाइट्रोजन की मांग विशेष अधिक रहती है। धान में नाइट्रोजन की कमी से पौधों की वृद्धि रुक जाती है, कल्ले कम निकलते हंै, पत्तियां आकार में छोटी हो जाती है और पीली पड़ जाती है बालें छोटी हो जाती हैं और उपज कम हो जाती है। नाइट्रोजन के अभाव के कारण दाने आकार में छोटे हो जाते हैं और उनमें प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है।
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केंचुआ करता क्या है

केंचुआ

केंचुए मिट्टी को नरम बनाते है पोला बनाते है उपजाऊ बनाते हैं केंचुए का कम क्या है ?? ऊपर से नीचे जाना ,नीचे से ऊपर आना पूरे दिन मे तीन चार चक्कर वो ऊपर से नीचे ,नीचे से ऊपर लगा देता है ! अब जब केंचुआ नीचे जाता तो एक रास्ता बनाते हुए जाता है और जब फिर ऊपर आता है तो फिर एक रास्ता बनाते हुए ऊपर आता है ! तो इसका परिणाम ये होता है की ये छोटे छोटे छिद्र जब केंचुआ तैयार कर देता है तो बारिश का पानी एक एक बूंद इन छिद्रो से होते हुए तल मे जमा हो जाता है !
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काली मिर्च

वनस्पति जगत्‌ में पिप्पली कुल (Piperaceae) के मरिचपिप्पली (Piper nigrum) नामक लता सदृश बारहमासी पौधे के अधपके और सूखे फलों का नाम काली मिर्च(Pepper) है। पके हुए सूखे फलों को छिलकों से बिलगाकर सफेद गोल मिर्च बनाई जाती है जिसका व्यास लगभग ५ मिमी होता है। यह मसाले के रूप में प्रयुक्त होती है।

 

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अंगूर की खेती

परिचय

नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनूसंधान संस्थान के ‘फल एवं बागबानी’विभाग ने अंगूर की एक नई किस्म तैयार की है, जिसे ‘पूसा अदिति’ नाम दिया गया है। इस किस्म का विकास कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के सूबों के हालात को ध्यान में रख कर किया है। इस किस्म की खासियतों का जिक्र नीचे किया गया है। Read More : अंगूर की खेती about अंगूर की खेती

संतरे की बागवानी

मध्यप्रदेश में संतरे की बागवानी मुख्यतः छिंदवाड़ा, बैतूल, होशंगाबाद, शाजापुर, उज्जैन, भोपाल, नीमच,रतलाम तथा मंदसौर जिले में की जाती है। प्रदेश में संतरे की बागवानी 43000 हैक्टेयर क्षेत्र में होती है। जिसमें से 23000 हैक्टेयर क्षेत्र छिंदवाड़ा जिले में है। वर्तमान में संतरे की उत्पादकता दस से बारह टन प्रति हैक्टेयर है जो कि विकसित देशों की तुलना मे अत्यंत कम है। कम उत्पादकता के कारकों में बागवानी हेतु गुणवत्तापूर्ण पौधे (कलम) का अभाव तथा रख-रखाव की गलत पद्धतियां प्रमुख हैं। मध्यप्रदेश में संतरे की किस्म नागपुर संतरा (Citrus reticulate Blanco variety Nagpur Mandrin)प्रचलित है।

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