गुरु बसव लिंगायत संप्रदाय शुरू करने वाले माने जाते हैं.

गुरु बसव लिंगायत संप्रदाय शुरू करने वाले माने जाते हैं. लेकिन इस बात पर मतभेद भी है. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स) ऐसे समय में हुए बासवन्ना या गुरु बसव. ब्राह्मण समाज से आने वाले बसव एक समाज-सुधारक थे और उन्होंने जाति प्रथा के खिलाफ खूब काम किया. वो आज़ादी, बराबरी और भाईचारे जैसे मूल्यों पर खूब ज़ोर देते थे और अपने विचारों का प्रसार 'वचन' गाकर करते थे. बसव के लिखे एक वचन का मतलब कुछ यूं निकलता है - 'आत्मा की कोई जाति नहीं होती, वो रीतियों में बंधी नहीं होती' बसव और उनके अनुयायियों ने ब्राह्मणवादी रीति-रिवाज़ों और वेदों को मानने से इनकार कर दिया था. वो मूर्ति पूजा के भी खिलाफ थे. लेकिन वो शिव के पक्के उपासक बने रहे. आज भी लिंगायत सम्प्रदाय के लोग बसव के बताए मूल्यों में विश्वास करते हैं. वो शिव और बसव दोनों की पूजा करते हैं, लेकिन मूर्ति पूजा नहीं करते. वो जनेऊ भी नहीं पहनते. हिंदुओं से अलग कैसे हैं लिंगायत? दक्षिण में एक के बाद एक कई भक्ति आंदोलन हुए. इनमें से ज़्यादातर ने वही किया, जो बसव ने करना चाहा - लोगों को ये भरोसा दिलाना कि जाति जैसी रूढ़ियों से परे जाकर भी ईश्वर को पाया जा सकता है. तो इन आंदोलनों को धार्मिक सुधार की कोशिश माना गया, न कि धर्म से अलग होने की कोशिश.