ज्ञान मुद्रा

भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा ज्ञान मुद्रा को प्राथमिकता दी जाती है। जिस कारण ही हमारे पूर्वज और ऋषिओं को सर्वज्ञ ज्ञान था। प्राचीनकाल में हमारे ऋषि महापुरुष वर्षों ज्ञान मुद्रा में बैठ कर ध्यान किया करते थे जिस कारन उनका ज्ञान सर्वत्र पूजनीय है। प्राचीन काल से ही, ज्ञान मुद्रा को ध्यान के समय और पूजापाठ के समय इसी मुद्रा में ही बैठकर किया जाता रहा है, जिससे ध्यान में अच्छे से मन लगता है। ज्ञान मुद्रा में बैठने से दिमाग की कमजोरी और यादशक्ति और मानसिक रोग जैसी दिमाग की सभी समस्याओं में जल्द ही आराम मिलता है। इसलिए प्रतिदिन 30 मिनट इस मुद्रा में बैठकर ध्यान करना चाहिए।

विधि
सबसे प्रथम मतलब तर्जनी उंगली को अंगूठे के ऊपरी भाग से स्पर्श करना चाहिए तथा शेष उंगलियों को सीधा ही रखना चाहिए।

चेतना का एक बहुत ही खास और महत्वपूर्ण गुण है- ज्ञान। ज्ञान के द्वारा ही हम बता सकते हैं कि किसी चीज में प्राण है और किस चीज में नहीं। जिसके अंदर ज्ञान होता है वह ज़िंदा कहलाता है और जिसमें ज्ञान नहीं होता वह निर्जीव कहलाता 

लिंग मुद्रा

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लिंग मुद्रा -

विधि-
सर्वप्रथम वज्रासन / पद्मासन या सुखासन में बैठ जाइए।
अब  अपने दोनो हाथों की उंगलियों को आपस में फँसाकर सीधे हाथ के अंगूठे को बिल्कुल सीधा रखेंगे यही लिंग मुद्रा कहलाती है  ।
आँखे बंद रखते हुए श्वांस सामान्य बनाएँगे।
अपने मन को अपनी श्वांस गति पर व मुद्रा  पर केंद्रित रखिए।

लाभ- 

    -बलगम व खाँसी में लाभप्रद।
    -शरीर में गर्मी उत्पन्न करती है व मोटापे को कम करती है।
    -श्वसन तंत्र को मजबूत करती है। Read More : लिंग मुद्रा about लिंग मुद्रा