क्यों आती हैं प्रेम विवाह में बाधाएं

ज्योतिष शास्त्र प्राचीन विद्या है। जिसके सहारे
किसी भी व्यक्ति के जीवन
की महत्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण
किया जा सकता है। ज्योतिष विज्ञान है जो न कभी गलत
था और न होगा। अब तो विश्वविद्यालयों में एक विषय के रूप में इसके
पठन-पाठन की व्यवस्था भी होने
जा रही है।
भारतीय ज्योतिष में जन्म कुंडली के बारह
भावों का व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं से संबंध
है। जीवन साथी का चयन, प्रेम, विवाह
आदि जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर ज्योतिष ने स्पष्ट
विचार व्यक्त किए हैं।
लग्न व्यक्तित्व का परिचालक है। इसके (लग्न) बलवान होने से
ही व्यक्ति सुंदर और आकर्षक होता है। 12 भावों में
से सप्तम भाव जीवन साथी का भाव है।
जीवन साथी के विषय में
जानकारी सप्तम भाव से प्राप्त होती है।
शिक्षा बौद्धिक क्षमता एवं निर्णय क्षमता का परिचालक पंचम भाव
है। एकादश भाव से मित्रों तथा सहयोगियों के विषय में
जानकारी मिलती है। नवम भाव भाग्य
का तथा पंचम भाव पराक्रम का है। इन सभी भावों का प्रेम
विवाह, गंधर्व विवाह आदि में महत्वपूर्ण योगदान होता है।
मित्रता या जीवन साथी के चुनाव तथा प्रेम
विवाह में चंद्रमा,मंगल तथा शुक्र की अति महत्वपूर्ण
भूमिका होती है।
चंद्रमा शीघ्र गति से चलने वाला रहस्यमय और मन
का कारक है। मन पर अधिकार होने के कारण चित्त
की चंचलता का चंद्रमा ही निर्धारण
करता है। मंगल ऊर्जा और साहस प्रधान ग्रह है। रक्त पर
इसी का अधिकार है। प्रेम विवाह या गंधर्व विवाह के
लिए साहस की आवश्यकता होती है।
चंद्रमा युवा ग्रह है तथा तेज गति से चलता है इसलिए युवाओं,
प्रेमी और नवविवाहितों पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव
पड़ता है। प्रेम-विवाह में इन
तीनों ग्रहों की अहम
भूमिका होती है। चंद्रमा मन, मंगल साहस और शुक्र
आकर्षण से युवक-युवतियों की मित्रता में छिपे रहस्य
को जाना जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र के विभिन्न फलित
ग्रंथों तथा व्यावहारिक अनुभव से प्रेम-विवाह के कुछ योग इस
प्रकार कहे जा सकते है।
1. यदि सप्तम भाव का स्वामी तथा तृतीय भाव
के स्वामी मिलते हैं तो प्रेम-विवाह का योग बनता है।
2. शुक्र और मंगल परस्पर भाव परिवर्तन का योग निर्मित करते हैं
तथा इनका संबंध बृहस्पति से होता है तो जातक पहले
शारीरिक संबंध कायम करता है तथा उसके बाद विवाह
करता है।
3. शुक्र एवं मंगल का संयोग लग्न या सप्तम भाव से
हो तथा चंद्रमा का इस पर प्रभाव पड़ता है तो ऐसा जातक प्रेम-
विवाह करता है। इसके कारण शारीरिक संयोग
भी विवाह का कारण बन सकता है।
4. कुंडली में बृहस्पति और सप्तम भाव के
स्वामी के सबल होने से प्रेम विवाह सफल होते है।
बृहस्पति की कृपा से वैवाहिक जीवन
समृद्ध और स्थिर होता है। सप्तम भाव का सबल
स्वामी वैवाहिक जीवन को सफलता प्रदान
करता है।
5. शनि और बृहस्पति के गोचर भाव से प्रेम-विवाह
की अवधि का पता चलता है। गोचर में जब शनि और
बृहस्पति का संबंध सप्तम भाव के स्वामी से होता है
तो विवाह अवश्यंभावी हो जाता है।