आप ट्रिम होना चाहते है, यह देखे

आप ट्रिम

मैँ खाना बँद क्योँ नहीँ कर सकता? लेकिन प्रश्न यह नहीँ है; उसके पीछे कुछ और है, कुछ और. यह बहुत बचकाना लगता है...

 

नहीँ, परखेँ नहीँ, अगर तुम इसे बचकाना कहते हो तो तुमने इसे पहले ही निँदित कर दिया, और वही समस्या की जड़ है. और समस्या से बाहर आने का यह रास्ता नहीँ है. चीजोँ को बुरा मत कहो—समझने की कोशिश करो.

अगर कोई व्यक्ति ज्यादा खा रहा है तो यह भीतर चल रहे किसी का सँकेत है.

 

भोजन सदा प्रेम का परिपूरक है. जो लोग प्रेम नहीँ करते, जिनके जीवन मेँ प्रेम की कमी है, वे ज्यादा खाने लगते हैँ; यह प्रेम-पूर्ति है.

 

जब बच्चा पैदा होता है तो उसका पहला प्रेम और पहला भोजन एक होता है—माँ. अत: भोजन और प्रेम मेँ गहरा सँबँध है; वास्तव मेँ भोजन पहने आता है और प्रेम बाद मेँ. पहले बच्चा माँ को खाता है, तब धीरे-धीरे उसे बोध होने लगता है कि माँ केवल भोजन नहीँ है; वह उसे प्रेम भी करती है. लेकिन उसके लिये एक विशेष विकास आवश्यक है. पहले दिन बच्चा प्रेम नहीँ समझ सकता. वह भोजन की भाषा समझता है, सभी पशुओँ की आदिम नैसर्गिक भाषा. बच्चा भूख के साथ पैदा होता है; भोजन अभी चाहिये. अभी बहुत दूर तक प्रेम की जरूरत नहीँ है; यह आपातकालीन परिस्थिति नहीँ है. प्रेम के बिना पूरा जीवन जीया जा सकता है, लेकिन भोजन के बिना नहीँ जीया जा सकता—यही तो मुश्किल है.

 

तो बच्चा भोजन और प्रेम के सँबम्ध को समझने लगता है. और धीरे-धीरे वह यह भी अनुभव करने लगता है कि जब भी माम अधिक प्रेमपूर्ण होगी, वह उसे अलग ढँग से दूध देगी. जब वह प्रेमपूर्ण नहीँ है, क्रोध मेँ है, उदास है तो वह बड़े अनमने से उसे दूध देगी या देगी ही नहीँ. अत: बच्चा जान जाता है कि जब भी माँ प्रेमपूर्ण है, जब भी भोजन उपलब्ध है तो प्रेम उपलब्ध है. जब-जब भोजन उपलब्ध नहीँ है तो बच्चे को लगता है कि प्रेम भी उपलब्ध नहीँ है और इसके विपरीत भी यही सच है. यह उसके अचेतन मेँ है.

 

कहीँ तुममेँ प्रेमपूर्ण जीवन की कमी है इसलिये तुम अधिक खाने लगते हो—यह उसका परिपूरक है. तुम अपने आपको भोजन से भरते रहते हो और भीतर कोई जगह नहीँ छोड़ते. तो प्रेम का तो सवाल ही नहीँ, क्योँकि भीतर कोई जगह ही नहीँ बची. और भोजन के साथ बात आसान है क्योँकि भोजन मृत है. तुम जितना चाहो उतना खा सकते हो—भोजन तुम्हेँ न नहीँ कह सकता. अगर तुम खाना बँद कर दोगे तो भोजन यह नहीँ कह सकता कि तुम मुझे अपमानित कर रहे हो. भोजन के साथ तुम मालिक रहते हो.

 

लेकिन प्रेम मेँ तुम मालिक नहीँ रह जाते. तुम्हारे जीवन मेँ कोई दूसरा प्रवेश कर जाता है, तुम्हारे जीवन मेँ निर्भरता प्रवेश कर जाती है. तुम स्वतँत्र नहीँ रह जाते,और यही भय है.

 

अहँकार स्वतँत्र रहना चाहता है और यह तुम्हेँ प्रेम नहीँ करने देगा. अगर तुम प्रेम करना चाहते हो तो तुम्हेँ अहँकार छोड़ना होगा.

 

प्रश्न भोजन का नहीँ है; भोजन केवल साँकेतिक है. तो मैँ भोजन के बारे मेँ कुछ नहीँ कहूँगा, भोजन कम करने या ऐसी किसी बात के बारे मेँ कुच्च नहीँ कहूँगा. क्योँकि उससे कुछ भी नहीँ होगा, तुम्हेँ सफलता नहीँ मिलेगी. तुम हजारोँ तरीके अपना सकते हो; लेकिन उससे कुछ नहीँ होगा. बल्कि मैँ कहूँगा, भोजन के बारे मेँ भूल जाएँ और जितना चाहेँ, उतना खाएँ.

 

प्रेम का जीवन शुरू करेँ, प्रेम करेँ, किसी को खोजेँ जिसे तुम प्रेम कर सको और अचानक तुम पाओगे कि तुम ज्यादा नहीँ खा रहे.

 

क्या तुमने कभी ध्यान दिया है?—जब तुम प्रसन्न होते हो तो तुम ज्यादा नहीँ खाते. जब तुम उदास होते हो तो तुम ज्यादा खाते हो. लोग सोचते हैँ कि जब तुम प्रसन्न होते हो तो तुम ज्यादा खाते हो, लेकिन यह बिलकुल झूठ है. प्रसन्न व्यक्ति इतना परितुष्ट होता है कि उसके भीतर कोई खालीपन नहीँ होता. अप्रसन्न व्यक्ति अपने अँदर भोजन ठूँसता रहता है.

 

तो मैँ भोजन की तो बात ही नहीँ छेड़ूँगा... और तुम जैसे हो, वैसे रहो, लेकिन प्रेम के लिये किसी को खोज लो जिसे प्रेम किया जा सके.

Vote: 
No votes yet

New Dhyan Updates

Total views Views today
सिरविहीन होने के प्रयोग को--करके देखो 327 4
शांत प्रयोग सफल नहीं होता 332 4
क्या आप सिगरेट छोड़ना चाहते हैं। 197 4
पुनर्जन्‍म की बात 290 4
नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो 981 4
ओशो देववाणी ध्यान 1,491 3
दूसरे को तुम उतना ही देख पाओगे जितना तुम अपने को देखते हो 264 3
ओशो गौरीशंकर ध्‍यान 424 3
ओशो डाइनैमिक ध्‍यान 349 3
संकल्प कैसे काम करता है? 935 3
ध्यान : ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 239 3
प्रेम जितना बढ़ेगा, सेक्‍स उतना क्षीण होगा: ओशो 324 2
विद्यार्थी क्यों अनुशासनहीन हो गए? 326 2
प्रेम से भर रहा है ? 240 2
जब हनीमून समाप्त हो जाता है तो इसके बाद क्या? 304 2
ओशो की सक्रिय ध्यान विधि 1,509 2
बहुत समय बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है, उस हर्ष में लीन होओ। 344 2
साप्ताहिक ध्यान : संयम साधना 186 2
ओशो नियो-विपस्याना ध्यान 271 2
युवक कौन .... ?? 310 2
तकिया पीटना ( ध्यान ) - नकारात्मकता को निकाल फेंकना 367 2
स्‍त्री-पुरूष जोड़ों के लिए नाद ब्रह्म ध्‍यान 652 2
सहज योग 448 2
ध्यान : मौन का रंग 325 2
दूसरे का अवलोकन करो 303 2
साक्षी को खोजना— ओशो 641 2
साप्ताहिक ध्यान:: त्राटक ध्यान 185 2
साप्ताहिक ध्यान : अवधान को बढ़ा 203 2
ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 310 2
ओशो – अपनी नींद में ध्‍यान कैसे करें 627 2
चक्रमण सुमिरन एक वरदान है 527 2
मैं एक युवती के प्रेम में था। वह मुझे धोखा दे गई ! मैं क्या करूं 289 2
ध्यान:: त्राटक ध्यान : ओशो 323 1
अपनी श्वास का स्मरण रखें 360 1
ध्यान : संतुलन ध्यान 251 1
स्त्रियां पुरुष के लिए आकर्षक क्यों बनना चाहती हैं जबकि वे पुरुषों की कामुकता जरा भी पसंद नहीं करतीं ? 550 1
क्या यंत्र समाधि प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं? 151 1
ध्यान : सब काल्पनिक है 271 1
ध्यान : "हां' का अनुसरण 301 1
ध्यान शरीर की आदत नहीं है 246 1
ओशो नाद ब्रह्म ध्‍यान 985 1
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 184 1
सैक्स मनुष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऊर्जा का नाम है। 891 1
साप्ताहिक ध्यान "मैं यह नहीं हूं' 160 1
ध्यान: क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 289 1
ध्यान : गर्भ की शांति पायें 335 1
ओशो स्टाॅप मेडिटेशन 286 1
ध्यान : क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 309 1
ध्यान : जहां कहीं भी तुम्हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर, अनुभव। 225 1
साप्ताहिक ध्यान : ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 238 1
साप्ताहिक ध्यान : "हां' का अनुसरण 163 1
ग्रंथियों का पता लगाने का एक प्रयोग 372 1
ध्यान :"मैं यह नहीं हूं' 279 1
ओशो – तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का अंग है 481 1
ध्यान -:पूर्णिमा का चाँद 651 1
साप्ताहिक ध्यान : मौन का रंग 241 1
साधक के लिए पहली सीढ़ी शरीर है 392 1
कर्म का नियम 261 1
ध्यान : प्रमुदिता प्रकाश है 229 1
त्राटक-एकटक देखने की विधि है | 322 1
ध्यान : अपना मुंह बंद करो! 276 1
पंख की भांति छूना ध्‍यान —ओशो 356 1
देखने के संबंध में सातवीं विधि 364 1
आप अच्छे हैं या स्वाभाविक? 285 1
संन्यासी और गृहस्थी में क्या फर्क है? 262 1
जगत ऊर्जा का विस्तार है 342 1
ओशो —हर चक्र की अपनी नींद 479 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : श्वास : सबसे गहरा मंत्र 209 0
ध्यान :: गर्भ की शांति पायें 214 0
ध्यान विधि : - ओशो 373 0
साप्ताहिक ध्यान : संतुलन ध्यान 175 0
स्वर्णिम प्रकाश ध्यान : ओशो 358 0
ध्यान : संयम साधना 268 0
ध्यान :: कभी, अचानक ऐसे हो जाएं जैसे नहीं हैं 304 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : श्वास को विश्रांत करें 169 0
ओशो जिबरिश ध्यान विधि 325 0
ध्यान : स्टॉप! (जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो, रुक जाओ।) 234 0
जिबरिश ध्यान विधि 521 0
समाधि का पहला अनुभव कैसा होता है? 411 0
ध्यान : कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना 239 0
यही शरीर, बुद्ध: हां, तुम। 287 0
प्रत्येक ध्यान के शीघ्र बाद करुणावान रहो 335 0
आज के युग मे ओशो सक्रिय ध्यान 428 0
प्यारे प्रभु! प्रश्नों के अंबार लगे हैं 320 0
आप ट्रिम होना चाहते है, यह देखे 380 0
प्रेम का अनुभव पूर्णता का अनुभव है : ईशावास्य उपनिषद 249 0
स्‍त्री-पुरूष जोड़ों के लिए नाद ब्रह्म ध्‍यान 688 0
साप्ताहिक ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं 160 0
हँसने के पाँच फायदे 437 0
व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ 246 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान 289 0
ओशो: जब कामवासना पकड़े तब क्या करें ? 234 0
मैं--तू' ध्यान - (ओशो: ध्यान विज्ञान) 218 0
मैं अकेलेपन से बहुत दुखी हूं, मैं इसके लिए क्या करूं? 429 0
साप्ताहिक ध्यान : सब काल्पनिक है 188 0
शरीर की शक्ति का ध्यान में उपयोग 195 0
श्वास को शिथिल करो! 304 0
ध्यान : अपनी श्वास का स्मरण रखें 201 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान :: गर्भ की शांति पायें 137 0
ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह 330 0
साप्ताहिक ध्यान : ज्ञान और अज्ञान, दोनों के पार 160 0
सम्मोहन: दुर्व्यसनों से छुटकारा पाने का सशक्त उपाय 184 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान -दूसरे का अवलोकन करो 157 0
ध्यान : ज्ञान और अज्ञान, दोनों के पार 253 0
ध्यान : अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें 230 0
शब्दों के बिना देखना 217 0
ओशो नटराज ध्‍यान की विधि 397 0
साप्ताहिक ध्यान : कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना 159 0
सफलता कोई मूल्य नहीं है 233 0
ध्यान : काम ऊर्जा से मुक्ति 289 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : नकारात्मकता को निकाल फेंकना 204 0
क्या जीवन को सीधा देखना संभव नहीं है? 292 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : संतुलन ध्यान 142 0
जिस दिन जागरण पूर्ण होगा उस दिन : साक्षी साधना 298 0
ध्यान : संतुलन ध्यान 211 0
ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं 214 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान - व्यस्त लोगों के लिये ध्यान 129 0
ध्यान : अपने हृदय में शांति का अनुभव करें 309 0
करने की बीमारी 222 0
ध्यान : श्वास : सबसे गहरा मंत्र 274 0
शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं। 305 0
साप्ताहिक ध्यान : श्वास को शिथिल करो 156 0
ध्यान: श्वास को विश्रांत करें 218 0