ध्यान : अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें

 तादात्मय तोड़ें

अपनी आंखें बंद करें, फिर दोनों आंखों को दोनों भवों के बीच में एकाग्र करें, ऐसे जैसे तुम दोनों आंखों से देख रहे हों। अपनी संपूर्ण एकाग्रता वहां ले जाएं। 

एक सही बिंदु पर तुम्हारी आंखें स्थिर हो जाएंगी। और अगर तुम्हारी एकाग्रता वहां है तो तुम्हें अजीब सा अनुभव होगा: पहली बार तुम्हारा साक्षात्कार तुम्हारे विचारों से होगा; तुम साक्षी हो जाओगे। यह चित्रपट की तरह है: विचार दौड़ रहे हैं और तुम साक्षी हो। 

आमतौर पर तुम साक्षी नहीं होते, तुम विचारों से एक रहते हो। अगर वहां क्रोध है तो तुम क्रोध से एक हो जाते हो। अगर कोई विचार चलता है तो तुम विचार से एक हो जाते हो, विचार से तुम्हारा तादात्म्य हो जाता है, तुम उसके साथ चलने लगते हो। तुम विचार हो जाते हो; तुम विचार का रूप ले लेते हो। जब वहां काम होता है तो तुम काम हो जाते हो, जब क्रोध होता है तो तुम क्रोध हो जाते हो, और जब लोभ होता है तो लोभ हो जाते हो। तुम किसी भी चलते विचार से एक हो जाते हो; तुम्हारे व तुम्हारे विचार के बीच कोई अंतराल नहीं होता। 

परंतु तीसरे नेत्र पर एकाग्र होने पर, तुम अचानक साक्षी हो जाते हो तीसरे नेत्र द्वारा तुम अपने विचारों को आकाश में घूमते बादलों की तरह या सड़क पर चलते लोगों की तरह देखते हो। 

 

ओशो:विज्ञान भैरव तंत्र से उद्दॠत

 

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