ध्यान : ज्ञान और अज्ञान, दोनों के पार

ज्ञान और अज्ञान

जीवन के विधायक पहलू पर ध्यान करो और फिर ध्यान को नकारात्मक पहलू पर ले जाओ, फिर दोनों को छोड़ दो क्योंकि तुम दोनों ही नहीं हो।इसे इस तरह देखो: जन्म पर ध्यान दो। एक बच्चा पैदा हुआ, तुम पैदा हुए। फिर तुम बढ़ते हो, जवान होते हो--इस पूरे विकास पर ध्यान दो। फिर तुम बूढ़े हो जाते हो और मर जाते हो। बिलकुल आरंभ से, उस क्षण की कल्पना करो जब तुम्हारे पिता और माता ने तुम्हें धारण किया था और मां के गर्भ में तुमने प्रवेश किया था। बिलकुल पहला कोष्ठ। वहां से अंत तक देखो, जहां तुम्हारा शरीर चिता पर जल रहा है और तुम्हारे संबंधी तुम्हारे चारों ओर खड़े हुए हैं। फिर दोनों को छोड़ दो, वह जो पैदा हुआ और वह जो मरा। फिर दोनों को छोड़ दो और भीतर देखो, वहां तुम हो, जो न कभी पैदा हुआ और जो न कभी मरेगा।यह तुम किसी भी विधायक-नकारात्मक घटना से कर सकते हो। तुम यहां बैठे हो, मैं तुम्हारी ओर देखता हूं, मेरा तुमसे संबंध होता है; जब मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूं तो तुम नहीं रहते और मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं हो पाता। फिर संबंध और असंबंध दोनों को छोड़ दो। तुम रिक्त हो जाओगे। क्योंकि जब तुम ज्ञान और अज्ञान दोनों का त्याग कर देते हो तो तुम रिक्त हो जाते हो।दो तरह के लोग हैं: कुछ ज्ञान से भरे हैं और कुछ अज्ञान से भरे हैं। ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि हम जानते हैं; उनका अहंकार उनके ज्ञान से बंधा हुआ है। और ऐसे लोग हैं जो कहते हैं, "हम अज्ञानी हैं', वे अपने अज्ञान से भरे हुए हैं। वे कहते हैं, "हम अज्ञानी हैं, हम कुछ नहीं जानते।' एक ज्ञान से बंधा हुआ है दूसरा अज्ञान से, लेकिन दोनों के पास कुछ है, दोनों कुछ ढो रहे हैं। ज्ञान और अज्ञान दोनों को हटा दो, ताकि तुम दोनों से अलग हो सको, न अज्ञानी, न ज्ञानी। विधायक और नकारात्मक दोनों को हटा दो। फिर तुम कौन हो? अचानक वह "कौन" तुम्हारे सामने प्रकट हो जाएगा। तुम उस अद्वैत के प्रति बोधपूर्ण हो जाओगे जो दोनों के पार है। विधायक और नकारात्मक दोनों को छोड़ कर तुम रिक्त हो जाओगे। तुम कुछ भी नहीं रहोगे, न ज्ञानी और न अज्ञानी। घृणा और प्रेम दोनों को छोड़ दो, मित्रता और शत्रुता दोनों को छोड़ दो। और जब दोनों ध्रुव छूट जाते हैं, तुम रिक्त हो जाते हो। 

 

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