पंख की भांति छूना ध्‍यान —ओशो

शिव ने कहा: आँख की पुतलियों को पंख की भांति छूने से उसके बीच का हलका पन ह्रदय में खुलता है।

ओशो–अपनी दोनों हथेलियों का उपयोग करो, उन्‍हें अपनी बंद आँखो पर रखो, और हथेलियों को पुतलियों पर छू जाने दो—लेकिन पंख के जैसे, बिना कोई दबाव डाले। यदि दबाव डाला तो तुम चूक गए, तुम पूरी विधि से ही चूक गए। दबाव मत डालों; बस पंख की भांति छुओ। तुम्‍हें थोड़ा समायोजन करना होगा क्‍योंकि शुरू में तो तुम दबाब डालोगे। दबाव का कम से कम करते जाओ जब तक कि दबाब बिलकुल समाप्‍त न हो जाए—बस तुम्‍हारी हथैलियां पुतलियों को छुएँ। बस एक स्‍पर्श, बाना दबाव का एक मिलन क्‍योंकि यदि दबाव रहा तो यह विधि कार्य नहीं करेगी। तो बस एक पंख की भांति।

क्‍यों?—क्‍योंकि जहां सुई का काम हो वहां तलवार कुछ भी नहीं कर सकती। यदि तुमने दबाव डाला, तो उसका गुणधर्म बदल गया—तुम आक्रामक हो गए। और जो ऊर्जा आंखों से बह रहा है वह बहुत सूक्ष्‍म है: थोड़ा सा दबाव, और वह संघर्ष करने लगती है जिससे एक प्रतिरोध पैदा हो जाता है। यदि तुम दबाव डालोगे तो जो ऊर्जा आंखों से बह रही है वह एक प्रतिरोध, एक लड़ाई शुरू कर देगी। एक संघर्ष छिड़ जाएगा। इसलिए दबाव मत डालों आंखों की ऊर्जा को थोड़े से दबाव का भी पता चल जाता है।

वह ऊर्जा बहुत सूक्ष्‍म है, बहुत कोमल है। दबाव मत डालों—बस पंख की भांति, तुम्‍हारी हथैलियां ही छुएँ, जैसे कि स्‍पर्श हो ही न रहा हो। स्‍पर्श ऐसे करो जैसे कि वह स्‍पर्श ने हो, दबाव जरा भी न हो; बस एक स्‍पर्श, एक हलका-सा एहसास कि हथेली पुतली को छू रही है, बस।
इससे क्‍या होगा? जब तुम बिना दबाव डाले हलके से छूते हो तो ऊर्जा भीतर की और जाने लगती है। यदि तुम दबाव डालों तो वह हाथ के साथ, हथेली के साथ लड़ने लगती है। और बहार निकल जाती है। हल्‍का-सा स्‍पर्श, और ऊर्जा भीतर जाने लगती है। द्वार बंद हो जाता है। बस द्वार बंद होता है और ऊर्जा वास लौट पड़ती है। जिस क्षण ऊर्जा वापस लौटती है, तुम आपने चेहरे और सिर पर एक हलकापन व्‍याप्‍त होता अनुभव करोगे। यह वापस लौटती ऊर्जा तुम्‍हें हल्‍का कर देती है।

और इन दोनों आंखों के बीच में तीसरी आंख, प्रज्ञा-चक्षु है। ठीक दोनों आंखों के मध्‍य में तीसरी आँख है। आँखो से वापस लोटती ऊर्जा तीसरी आँख से टकराती है। यहीं कारण है कि व्‍यक्‍ति हल्‍का और जमीन से उठता हुआ अनुभव करता है। जैसे कि कोई गुरुत्वाकर्षण न रहा हो। और तीसरी आँख से ऊर्जा ह्रदय पर बरस जाती है; यह एक शारीरिक प्रक्रिया है: बूंद-बूंद करके ऊर्जा टपकती है। और तुम अत्‍यंत हल्‍कापन अपने ह्रदय में प्रवेश करता अनुभव करोगे। ह्रदय गति कम हो जाएगी। श्‍वास धीमी हो जाएगी। तुम्‍हारा पूरा शरीर विश्रांत अनुभव करेगा।

यदि तुम गहन ध्‍यान में प्रवेश नहीं भी कर रहे हो, तो भी यह प्रयोग तुम्‍हें शारीरिक रूप से उपयोगी होगा। दिन में किसी भी समय, आराम से कुर्सी पर बैठ जाओ—या तुम्‍हारे पास यदि कुर्सी न हो, जब तुम रेलगाड़ी में सफर कर रहे हों—तो अपनी आंखें बंद कर लो। पूरे शरीर में एक विश्रांति अनुभव करो। और फिर दोनों हथेलियों को अपनी आंखों पर रख लो। लेकिन दबाव मत डालों—यह बड़ी महत्‍वपूर्ण बात है। बस पंख की भांति छुओ।

जब तुम स्‍पर्श करो और दबाव न डालों, तो तुम्‍हारे विचार तत्‍क्षण रूक जाएंगे। विश्रांत मन में विचार नहीं चल सकते। वे जम जाते है। विचारों को उन्‍माद और बुखार की जरूरत होती है। उनके चलने के लिए तनाव की जरूरत होती है। वे तनाव के सहारे ही जीते है। जब आंखें शांत व शिथिल हों और ऊर्जा पीछे लौटने लगे तो विचार रूक जायेंगे। तुम्‍हें एक मस्‍ती का अनुभव होगा। जो रोज-रोज गहराता जाएगा।
तो इस प्रयोग को दिन में कई बार करो। एक क्षण के लिए छूना भी अच्‍छा रहेगा। जब भी तुम्‍हारी आंखे थकी हुई ऊर्जा विहीन और चुकी हुई महसूस करें—पढ़कर, फिल्‍म देखकर, या टेलिविजन देखकर। जब भी तुम्‍हें ऐसा लगे, अपनी आंखे बंद कर लो। और स्‍पर्श करो मोर पंखी। तत्‍क्षण प्रभाव होगा। लेकिन यदि तुम इसे एक ध्‍यान बनाना चाहते हो तो इसे कम से कम चालीस मिनट के लिए करो। और पूरी बात यही है कि दबाव नहीं डालना। एक क्षण के लिए तो पंख जैसा स्‍पर्श सरल है; चालीस मिनट के लिए कठिन है। कई बार तुम भूल जाओगे और दबाव डालने लगोगे।

दबाव मत डालों। चालीस मिनट के लिए वह बोध बनाए रहो कि तुम्‍हारे हाथों में कोई बोझ नहीं है। वे बस स्‍पर्श कर रहे है। यह बोध बनाए रहो कि वे दबाव नहीं डाल रहे है, बस स्‍पर्श कर रहे है। यह एक गहन बोध बन जाएगा। बिलकुल ऐसे जैसे श्‍वास-प्रश्‍वास। जैसे बुद्ध कहते है कि पूरे जाग कर श्‍वास लो। ऐसा ही स्‍पर्श के साथ भी होगा। तुम्‍हें सतत स्‍मरण रखना होगा कि तुम दबाव नहीं डाल रहे। तुम्‍हारा हाथ बस एक पंख, एक भारहीन वस्‍तु बन जाना चाहिए। जो बस छुए। तुम्‍हारा चित समग्ररतः: सचेत होकर वहां आंखों के पास लगा रहेगा। और ऊर्जा सतत बहती रहेगी। शुरू में तो वह बूंद-बूंद करके ही टपकेगी। कुछ ही महीनों में तुम्‍हें लगेगा वह सरिता सी हो गई है, और एक साल बीतते-बीतते तुम्‍हें लगेगा कि वह एक बाढ़ की तरह हो गई है। और जब ऐसा होता है—‘’आँख की पुतलियाँ को पंख की भांति छूने से उनके बीच का हलकापन…।‘’ जब तुम स्‍पर्श करोगे तो तुम्‍हें हलकापन महसूस कर सकते हो। जैसे की तुम स्‍पर्श करते हो, तत्क्षण एक हलकापन आ जाता है। और वह ‘’उनके बीच का हलकापन ह्रदय में खुलता है।‘’…वह हलकापन ह्रदय में प्रवेश कर जाता है, खुल जाता है। ह्रदय में केवल हलकापन ही प्रवेश कर सकता है। कोई भी बोझिल चीज प्रवेश नहीं कर सकती है। ह्रदय के साथ बहुत हल्‍की फुलकी घटनाएं ही घट सकती है।

दोनों आंखों के बीच का यह हलकापन ह्रदय में टपकने लगेगा। और ह्रदय उसको ग्रहण करने के लिए खुल जाएगा—‘’और वहां ब्रह्मांड व्‍याप जाता है।‘’ और जैसे-जैसे यह बहती ऊर्जा पहले एक धारा, फिर एक सरिता और फिर एक बाढ़ बनती है तुम पूरी तरह बह जाओगे, दूर बह जाओगे। तुम्‍हें लगेगा ही नहीं कि तुम हो। तुम्‍हें लगेगा कि बस ब्रह्मांड ही है। श्‍वास लेते हुए, श्‍वास छोड़ते हुए तुम्‍हें ऐसा ही लगेगा। कि तुम ब्रह्मांड बन गए हो। ब्रह्मांड भीतर आता है और ब्रह्मांड बाहर जाता है। वह इकाई जो तुम सदा बने रहे—अहंकार—वह नहीं बचता।

Vote: 
No votes yet

New Dhyan Updates

Total views Views today
साक्षी को खोजना— ओशो 126 4
ओशो की सक्रिय ध्यान विधि 572 3
ओशो जिबरिश ध्यान विधि 102 3
ध्यान शरीर की आदत नहीं है 45 3
पंख की भांति छूना ध्‍यान —ओशो 102 3
जिबरिश ध्यान विधि 131 2
मैं--तू' ध्यान - (ओशो: ध्यान विज्ञान) 39 2
तकिया पीटना ( ध्यान ) - नकारात्मकता को निकाल फेंकना 73 2
ध्यान : ज्ञान और अज्ञान, दोनों के पार 35 2
त्राटक-एकटक देखने की विधि है | 110 2
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान 38 1
नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो 153 1
ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 71 1
मैं अकेलेपन से बहुत दुखी हूं, मैं इसके लिए क्या करूं? 68 1
चक्रमण सुमिरन एक वरदान है 130 1
ओशो —हर चक्र की अपनी नींद 126 1
अपनी श्वास का स्मरण रखें 122 1
व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ 40 1
स्वर्णिम प्रकाश ध्यान : ओशो 109 1
समाधि का पहला अनुभव कैसा होता है? 79 1
प्यारे प्रभु! प्रश्नों के अंबार लगे हैं 61 1
ओशो देववाणी ध्यान 651 1
ओशो नाद ब्रह्म ध्‍यान 347 1
हँसने के पाँच फायदे 67 1
सैक्स मनुष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऊर्जा का नाम है। 290 1
शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं। 47 1
सहज योग 91 1
श्वास को शिथिल करो! 59 1
ओशो स्टाॅप मेडिटेशन 64 1
ओशो डाइनैमिक ध्‍यान 79 1
संकल्प कैसे काम करता है? 98 1
जब हनीमून समाप्त हो जाता है तो इसके बाद क्या? 53 1
ओशो नटराज ध्‍यान की विधि 98 1
साधक के लिए पहली सीढ़ी शरीर है 64 1
ओशो – तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का अंग है 111 1
देखने के संबंध में सातवीं विधि 104 1
ध्यान : संयम साधना 54 0
मैं एक युवती के प्रेम में था। वह मुझे धोखा दे गई ! मैं क्या करूं 68 0
ध्यान : "हां' का अनुसरण 51 0
ओशो – अपनी नींद में ध्‍यान कैसे करें 108 0
प्रेम जितना बढ़ेगा, सेक्‍स उतना क्षीण होगा: ओशो 63 0
आप ट्रिम होना चाहते है, यह देखे 43 0
ध्यान : मौन का रंग 55 0
प्रेम से भर रहा है ? 61 0
सम्मोहन: दुर्व्यसनों से छुटकारा पाने का सशक्त उपाय 21 0
ध्यान विधि : - ओशो 89 0
स्त्रियां पुरुष के लिए आकर्षक क्यों बनना चाहती हैं जबकि वे पुरुषों की कामुकता जरा भी पसंद नहीं करतीं ? 72 0
ध्यान: क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 57 0
शब्दों के बिना देखना 45 0
सिरविहीन होने के प्रयोग को--करके देखो 94 0
ध्यान : जहां कहीं भी तुम्हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर, अनुभव। 50 0
ध्यान :"मैं यह नहीं हूं' 45 0
बहुत समय बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है, उस हर्ष में लीन होओ। 96 0
युवक कौन .... ?? 94 0
ध्यान : अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें 51 0
ध्यान : प्रमुदिता प्रकाश है 59 0
प्रत्येक ध्यान के शीघ्र बाद करुणावान रहो 99 0
आज के युग मे ओशो सक्रिय ध्यान 138 0
क्या जीवन को सीधा देखना संभव नहीं है? 54 0
ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं 37 0
स्‍त्री-पुरूष जोड़ों के लिए नाद ब्रह्म ध्‍यान 280 0
दूसरे को तुम उतना ही देख पाओगे जितना तुम अपने को देखते हो 95 0
ध्यान : गर्भ की शांति पायें 39 0
ध्यान : संतुलन ध्यान 47 0
आप अच्छे हैं या स्वाभाविक? 45 0
शांत प्रयोग सफल नहीं होता 94 0
ध्यान : क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 46 0
ध्यान : ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 45 0
स्‍त्री-पुरूष जोड़ों के लिए नाद ब्रह्म ध्‍यान 113 0
जगत ऊर्जा का विस्तार है 41 0
ध्यान :: कभी, अचानक ऐसे हो जाएं जैसे नहीं हैं 45 0
ओशो गौरीशंकर ध्‍यान 116 0
ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह 96 0
सफलता कोई मूल्य नहीं है 58 0
विद्यार्थी क्यों अनुशासनहीन हो गए? 52 0
ध्यान : सब काल्पनिक है 55 0
दूसरे का अवलोकन करो 86 0
कर्म का नियम 43 0
ग्रंथियों का पता लगाने का एक प्रयोग 83 0
ध्यान : अपना मुंह बंद करो! 64 0
ध्यान : स्टॉप! (जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो, रुक जाओ।) 44 0
ध्यान -:पूर्णिमा का चाँद 83 0
जिस दिन जागरण पूर्ण होगा उस दिन : साक्षी साधना 69 0
करने की बीमारी 45 0
पुनर्जन्‍म की बात 77 0
ध्यान : संतुलन ध्यान 52 0
प्रेम का अनुभव पूर्णता का अनुभव है : ईशावास्य उपनिषद 48 0
संन्यासी और गृहस्थी में क्या फर्क है? 63 0