प्यारे प्रभु! प्रश्नों के अंबार लगे हैं

चौथा प्रश्न: प्यारे प्रभु! प्रश्नों के अंबार लगे हैं
उत्तर चुप हैं
कौन सहेजे इन कांटों को
बगिया चुप है, माली चुप है
प्रश्न स्वयं में रहता चुप है
दिनकर चुप है, रातें चुप हैं
उठी बदरिया कारी-कारी
लगा अंधेरा बिलकुल घुप है
प्रभु, इस स्थिति का निराकरण करने की अनुकंपा करें।

कन्नूमल! जब तक प्रश्न हैं तब तक उत्तर चुप रहेंगे। प्रश्नों के कारण ही उत्तर चुप हैं। प्रश्नों से उत्तर नहीं मिलता; जब प्रश्न चले जाते हैं और चित्त निष्प्रश्न हो जाता है तब उत्तर मिलता है। प्रश्नों की भीड़ में ही तो उत्तर खो गया है।
ठीक कहते हो तुम: प्रश्नों के अंबार लगे हैं, उत्तर चुप हैं।
उत्तर चुप रहेंगे ही। प्रश्न इतना शोरगुल मचा रहे हैं, उत्तर बोलें तो कैसे बोलें? और खयाल रखना, प्रश्न अनेक होते हैं, उत्तर एक है। उत्तर तो एकवचन है, प्रश्न बहुवचन। प्रश्नों की भीड़ होती है। जैसे बीमारियां तो बहुत होती हैं, स्वास्थ्य एक होता है। बहुत तरह के स्वास्थ्य नहीं होते। तुम किसी से कहो कि मैं स्वस्थ हूं तो वह यह नहीं पूछता कि किस प्रकार के स्वस्थ, कौन-सी भांति के स्वास्थ्य में हो? लेकिन किसी से कहो मैं बीमार हूं तो तत्क्षण पूछता है--कौन-सी बीमारी? बीमारियां बहुत हैं, स्वास्थ्य एक है। प्रश्न बहुत हैं, उत्तर एक है। और बहुत प्रश्नों के कारण वह एक उत्तर पकड़ में नहीं आता। भीड़ लगी है प्रश्नों की, सच कहते हो। चारों तरफ प्रश्न ही प्रश्न हैं...प्रश्न से प्रश्न निकलते जाते हैं, खड़े होते जाते हैं, मिटते जाते हैं, नये बनते जाते हैं। तुम इतने घिरे हो प्रश्नों से यह सच है। मगर इसी कारण उत्तर चुप है।
तुम कहते हो: प्रश्नों के अंबार लगे हैं, उत्तर चुप हैं।
उत्तर चुप नहीं है; उत्तर भी बोल रहा है; लेकिन उत्तर एक है और प्रश्न अनेक हैं। नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसे खो जाये...। बाजार में, शोरगुल में कोई धीमे-धीमे स्वर में गीत गाये, जैसे खो जाये, ऐसा ही सब खो गया है।
उत्तर पाया जा सकता है। उत्तर दूर भी नहीं है। उत्तर बहुत निकट है। उत्तर तुम हो। उत्तर तुम्हारे केंद्र में बसा है। जरा प्रश्नों को जाने दो। प्रश्नों को मूल्य मत दो। प्रश्नों को बहुत ज्यादा अर्थ भी मत दो। प्रश्नों से धीरे-धीरे उदासीन हो जाओ। प्रश्नों को सहयोग मत दो, सत्कार मत दो। प्रश्नों की उपेक्षा करो। प्रश्नों के प्रति तटस्थ हो जाओ। क्योंकि जो प्रश्नों में चला गया, वह दर्शनशास्त्र के जंगल में भटक जाता है। तुम प्रश्नों को चलने दो, आने दो, जाने दो। ऐसे ही देखो प्रश्नों की भीड़ को, जैसे तुम रास्ते पर चलते लोगों को देखते हो--न कुछ लेना, न कुछ देना--असंग-भाव से, दूर खड़े...। तुम्हारे और तुम्हारे प्रश्नों के बीच जितनी दूरी बढ़ जाये, उतना हितकर है; क्योंकि उसी अंतराल में उत्तर उठेगा।
बुद्ध के पास जब भी कोई जाता था, कोई प्रश्न पूछने, तो बुद्ध कहते: रुक जाओ, दो वर्ष रुक जाओ। दो वर्ष चुप बैठो मेरे पास, फिर पूछ लेना।
ऐसा हुआ, एक बड़ा दार्शनिक बुद्ध के पास गया। मौलुंकपुत्त उसका नाम था। जाहिर दार्शनिक था। उसने बड़े प्रश्नों के अंबार लगा दिये। बुद्ध ने प्रश्न सुने और कहा कि मौलुंकपुत्त, तू सच ही उत्तर चाहता है? अगर सच ही चाहता है, कीमत चुका सकेगा?
मौलुंकपुत्त ने कहा: जीवन मेरा अंत होने के करीब आ रहा है। जीवन-भर से ये प्रश्न पूछ रहा हूं। बहुत उत्तर मिले, लेकिन कोई उत्तर उत्तर साबित नहीं हुआ। हर उत्तर में से नये प्रश्न निकल आये हैं। किसी उत्तर में समाधान नहीं हुआ है। आप क्या कीमत मांगते हैं? मैं सब कीमत चुकाने को तैयार हूं। मैं इन प्रश्नों के हल चाहता ही हूं। मैं इनका समाधान लेकर इस पृथ्वी से जाना चाहता हूं।
फिर, बुद्ध ने कहा, ठीक है। क्योंकि लोग उत्तर तो मांगते हैं, मगर कीमत चुकाने को राजी नहीं होते; इसलिए मैंने तुझसे पूछा। फिर दो साल तू चुप बैठ जा, यह कीमत है। तू मेरे पास दो साल चुप बैठ, बोलना ही मत। जब दो साल बीत जायेंगे, मैं खुद ही तुझसे पूछूंगा कि मौलुंकपुत्त, अब पूछ ले। फिर तू पूछ लेना तुझे जो पूछना हो। और आश्वासन देता हूं कि सब उत्तर दे दूंगा, सब निराकरण कर दूंगा! मगर दो साल बिलकुल चुप, सन्नाटा...दो साल बात मत उठाना।
मौलुंकपुत्त सोच ही रहा था कि हां कहूं कि ना, क्योंकि दो साल लंबा वक्त है और इस आदमी का क्या भरोसा, दो साल बाद देगा भी उत्तर कि नहीं? उसने कहा कि आप पक्का विश्वास दिलाते हैं कि दो साल बाद उत्तर देंगे? बुद्ध ने कहा: बिलकुल विश्वास दिलाता हूं, तू पूछेगा तो दूंगा। तू पूछेगा ही नहीं तो मैं किसको उत्तर दूंगा? तभी एक भिक्षु पास के एक वृक्ष के नीचे बैठा ध्यान कर रहा था। खिलखिलाकर हंसने लगा। मौलुंकपुत्त ने पूछा: यह भिक्षु क्यों हंस रहा है? बुद्ध ने कहा: तुम्हीं पूछ लो। उस भिक्षु ने कहा कि अगर पूछना हो, अभी पूछ लो। यही धोखा मेरे साथ हुआ। हम भी ऐसे ही बुद्धू बने! मगर यह बात सच कह रहे हैं वे कि अगर पूछोगे तो दो साल बाद उत्तर देंगे, मगर दो साल बाद कौन पूछता है! दो साल से मैं चुप बैठा हूं। अब वे मुझसे कुरेद-कुरेद कर पूछते हैं कि पूछो भाई, मगर दो साल चुप रहने के बाद पूछने को कुछ बचता नहीं, उत्तर मिल ही जाता है। अगर पूछना हो तो अभी पूछ लो, नहीं तो दो साल बाद फिर पूछने को कुछ न बचेगा।
और यही हुआ, मौलुंकपुत्त दो वर्ष रुका। दो वर्ष पूरे हुए, बुद्ध भूले नहीं, तिथित्तारीख सब याद रखी। ठीक दो साल पूरे होने पर, मौलुंकपुत्त तो भूल ही गया था, क्योंकि जिसके विचार धीरे-धीरे शांत हो जायें, उसे समय का बोध भी खो जाता है। क्या समय का हिसाब, कौन दिन आया, कौन वर्ष आया, क्या हिसाब! सब जा चुका था, सब बह चुका था। जरूरत भी क्या थी! बैठना था रोज बुद्ध के पास तो शुक्र हो कि शनि, कि रवि हो कि सोम, सब बराबर था। आषाढ़ हो कि जेठ, गर्मी हो कि सर्दी, सब बराबर था। भीतर तो एक ही रस था--शांति का, मौन का। दो वर्ष पूरे हो गये, बुद्ध ने कहा: मौलुंकपुत्त, तुम खड़े हो जाओ। खड़ा हो गया मौलुंकपुत्त। बुद्ध ने कहा: अब तुम पूछ लो, क्योंकि मैं अपने वचन से मुकरता नहीं। तुम्हें कुछ पूछना है?
मौलुंकपुत्त हंसने लगा और उसने कहा: वह भिक्षु ठीक कहा था। मेरे पास पूछने को अब कुछ भी नहीं है। उत्तर आ ही गया। आपकी कृपा से उत्तर आ ही गया।
उत्तर दिया नहीं गया और आ गया! उत्तर बाहर से आता ही नहीं, उत्तर भीतर से आता है। ऐसा ही समझो, जैसे कोई कुआं खोदता है तो पहले कंकड़-पत्थर निकलते हैं, कूड़ा-करकट निकलता है, सूखी जमीन निकलती है, फिर गीली जमीन आती है, फिर कीचड़ निकलती है, फिर जलस्रोत...। जलस्रोत तो दबे पड़े हैं। तुम्हारे प्रश्नों की ही पर्त-पर्त जम गयी है, उसी के नीचे जलस्रोत दबा पड़ा है। खुदाई करो, इन प्रश्नों को हटाओ। और हटाने का उपाय एक ही है: जाग कर साक्षी-भाव से इन प्रश्नों के प्रवाह को देखते रहो। सिर्फ देखते रहो इस प्रवाह को, कुछ मत करो। बैठ जाओ रोज घंटे-दो-घंटे, चलने दो प्रवाह को। जल्दी भी न करना कि आज ही बंद हो जाये।
इसलिए बुद्ध ने कहा, दो साल। कोई तीन महीने के बाद पहली सरसराहट सन्नाटे की शुरू होती है। और कोई दो साल होतेऱ्होते अनुभव पक जाता है। बस कोई इतना धीरज भी रखे कि दो घंटे रोज बैठता रहे, कुछ न करे...। उस कुछ न करने में सारी कला छिपी है।
लोग पूछते हैं: बुद्ध को पहली समाधि कैसे घटी? बैठे थे वृक्ष के नीचे, कुछ कर नहीं रहे थे, तब घटी। छह साल तक बहुत कुछ किया--बड़े यम, व्यायाम, प्राणायाम, न मालूम क्या-क्या किया। सब करके थक गये थे, उस रात तय करके सोये कि अब कुछ नहीं करना, हो गया बहुत। करने से भी कुछ नहीं होता। उस रात करना भी छोड़ दिया। उस रात बिलकुल बिना करने की अवस्था में सो गये। शून्य भाव था। सुबह आंख खुली और समाधि द्वार पर खड़ी थी। जिस मेहमान की प्रतीक्षा थी, वह आ गया। आखिरी तारा डूबता था सुबह का और भीतर बुद्ध के आखिरी विचार डूब गया। उधर आखिरी तारे से आकाश खाली हुआ, इधर आखिरी विचार भी डूब गया। समाधि आ गयी, उत्तर आ गया। इसीलिए तो समाधि कहते हैं उसे, क्योंकि उसमें समाधान है।

सांझ आई, चुप हुए धरती-गगन
नयन में गोधूलि के बादल उठे
बोझ से पलकें झपीं नम हो गईं
सांझ ने पूछा, उदासी किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

रात आई, कालिमा घिरती गई
सघन तम में द्वार मन के खुल गए
दाह की चिनगारियां हंसने लगीं
रात ने पूछा, जलन यह किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

नींद आई, चेतना सब मौन है
देह थककर सो गई, पर प्राण को
स्वप्न की जादूभरी गलियां मिलीं
नींद ने पूछा, भुलावे किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!
प्रश्न तो बिखरे यहां हर ओर हैं
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

तुम प्रश्नों को पकड़ो ही मत, उत्तर तुम्हें मिलेंगे भी नहीं। कोई कभी प्रश्नों के सहारे चलकर उत्तर पाया भी नहीं। तुम प्रश्न उठने दो, यह मन की खुजलाहट है। खुजलाहट ठीक शब्द है। कभी-कभी खुजलाहट उठती है, तुम खुजा लेते हो--बस ऐसे ही मन की खुजलाहट हैं प्रश्न। खुजा लेने से कुछ हल नहीं होता, लेकिन न खुजाओ तो भी बेचैनी होती है। खुजा लेने से थोड़ी-सी क्षण-भर को राहत मिलती है। बस ऐसे ही तुम्हारे उत्तर हैं। एक उत्तर पकड़ लिया, थोड़ी देर राहत मिलती है। जल्दी ही उस उत्तर में से भी प्रश्न निकल आयेंगे। फिर राहत खो जायेगी, फिर उत्तर की तलाश शुरू हो जायेगी।
कन्नूमल तुम ठीक कहते हो:
प्रश्नों के अंबार लगे हैं
उत्तर चुप हैं
कौन सहेजे इन कांटों को
बगिया चुप है, माली चुप है
प्रश्न स्वयं में रहता चुप है
दिनकर चुप है, रातें चुप हैं
उठी बदरिया कारी कारी
लगा अंधेरा बिलकुल घुप है
प्रश्नों के अंबार लगे हैं
उत्तर चुप हैं।
उत्तर चुप रहेंगे। उत्तर बोलते नहीं। तुम बोलना जब बंद कर दोगे, तत्क्षण उन्हें पहचान लोगे। तुम्हारी वाणी खो जायेगी और तुम पाओगे--शून्य तुम्हारे भीतर बोला, मौन तुम्हारे भीतर बोला। उस मौन में अचानक समाधान है, सब प्रश्नों का उत्तर है; क्योंकि उस मौन में शांति है, सुख है, परम आनंद है।
तुमने एक बात खयाल की, प्रश्न उठते दुख के कारण हैं! दुख प्रश्नों का जन्मदाता है। जैसे तुम्हारे सिर में दर्द होता है 

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