बहुत समय बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है, उस हर्ष में लीन होओ।

बहुत समय बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है, उस हर्ष में लीन होओ।

उस हर्ष में प्रवेश करो और उसके साथ एक हो जाओ। किसी भी हर्ष से काम चलेगा। यह एक उदाहरण है।

‘’बहुत समय बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है।‘’

तुम्‍हें अचानक कोई मित्र मिल जाता है जिसे देखे हुए बहुत दिन, बहुत वर्ष हो गए है। और तुम अचानक हर्ष से, आह्लाद से भर जाते हो। लेकिन अगर तुम्‍हारा ध्‍यान मित्र पर है, हर्ष पर नहीं तो तुम चूक रहे हो। और यह हर्ष क्षणिक होगा। तुम्‍हारा सारा ध्‍यान मित्र पर केंद्रित होगा, तुम उससे बातचीत करने में मशगूल रहोगे। तुम पुरानी स्‍मृतियों को ताजा करने में लगेरहोगे। तब तुम इस हर्ष को चूक जाओगे। और हर्ष भी विदा हो जाएगा। इसलिए जब किसी मित्र से मिलना हो और अचानक तुम्‍हारे ह्रदय में हर्ष उठे तो उस हर्ष पर अपने को एकाग्र करो। उस हर्ष को महसूस करो। उसके साथ एक हो जाओ। और तब हर्ष से भरे हुए और बोधपूर्ण रहते हुए अपने मित्र को मिलो। मित्र को बस परिधि पर रहने दो और तुम अपने सुख के भाव के में केंद्रित हो जाओ।

अन्‍य अनेक स्‍थितियों में भी यह किया जा सकता है। सूरज उग रहा है और तुम अचानक अपने भीतर भी कुछ उगता हुआ अनुभव करते हो। तब सूरज को भूल जाओ, उसे परिधि पर ही रहने दो और तुम उठती हुई उर्जा के अपने भाव में केंद्रित होजाओ। जब तुम उस पर ध्‍यान दोगे, वह भाव फैलने लगेगा। और वह भाव तुम्‍हारे सारे शरीर पर, तुम्‍हारे पूरे अस्‍तित्‍व पर फैल जाएगा। और बस दर्शन ही मत बने रहो। उसमे विलीन हो जाओ।

ऐसे क्षण बहुत थोड़े होते है, जब तुम हर्ष या आह्लाद अनुभव करते हो, सुख और आनंद से भरते हो। और तुम उन्‍हें भी चूक जाते हो। क्‍योंकि तुम विषय केंद्रित होते हो। जब भी प्रसन्‍नता आती है। सुख आता है, तुम समझते हो कि यह बाहर से आ रहा है।

किसी मित्र से मिलने हो, स्‍वभावत: लगता है कि सुख मित्र से आ रहा है। मित्र के मिलने से आ रहा है। लेकिन यह हकीकत नहीं है। सुख सदा तुम्‍हारे भीतर है। मित्र तो सिर्फ परिस्‍थिति निर्मित करता है। मित्र ने सुख को बाहर आने का अवसर दिया। और उसने तुम्‍हें उस सुख को देखने में हाथ बंटाया।

यह नियम सुख के लिए ही नहीं। सब चीजों के लिए है; क्रोध, शोक, संताप, सुख, सब पर लागू होता है। ऐसा ही है। दूसरे केवल परिस्‍थिति बनाते है जिसमे जो तुम्‍हारे भीतर छिपा है वह प्रकट हो जाता है। वे कारण नहीं है। वे तुम्‍हारे भीतर कुछ पैदा नहीं करते है। जो भी घटित हो रहा है वह तुम्‍हें घटित हो रहा है। वह सदा है। मित्र का मिलन सिर्फ अवसर बना, जिसमे अव्‍यक्‍त व्‍यक्‍त हो रहा है। अप्रकट हो गया।

जब भी यह सुख घटित हो, उसके आंतरिक भाव में स्‍थित रहो और तब जीवन में सभी चीजों के प्रति तुम्‍हारी दृष्‍टि भिन्‍न हो जाएगी। नकारात्‍मक भावों के साथ भी यह प्रयोग किया जा सकता है। जब क्रोध आए तो उस व्‍यक्‍ति की फिक्र मत करो जिसने क्रोध करवाया, उसे परिधि पर छोड़ दो और तुम क्रोध ही हो जाओ। क्रोध को उसकी समग्रता में अनुभव करो, उसे अपने भीतर पूरी तरह घटित होने दो।

उसे तर्क-संगत बनाने की चेष्‍टा मत करो। यह मत कहो कि इस व्‍यक्‍ति ने क्रोध करवाया। उस व्‍यक्‍ति की निंदा मत करो। वह तो निर्मित मात्र है। उसका उपकार मानों कि उसने तुम्‍हारे भीतर दमित भावों को प्रकट होने का मौका दिया। उसने तुम पर कहीं चोट की। और वहां से घाव छिपा पडा था। अब तुम्‍हें उस घाव का पता चल गया है। अब तुम वह घाव ही बन जाओ।

विधायक या नकारात्‍मक, किसी भी भाव के साथ प्रयोग करो और तुम में भारी परिवर्तन घटित होगा। अगर भाव नकारात्‍मक है तो उसके प्रति सजग होकर तुम उससे मुक्‍त हो जाओगे। और अगर भाव विधायक है तो तुम भाव ही बन जाओगे। अगर यह सुख है तो तुम सुख बन जाओगे। लेकिन यह क्रोध विसर्जित हो जाएगा। और नकारात्‍मक और विधायक भावों का भेदभी यही है। अगर तुम किसी भाव के प्रति सजग होते हो और उससे वह भाव विसर्जित हो जाता है तो समझना कि वह नकारात्‍मक भाव है। और यदि किसी भाव के प्रति सजग होने से तुम वह भाव ही बन जाते हो और वह भाव फैलकर तुम्‍हारे तन-प्राण पर छा जाता है तो समझना कि वह विधायक भाव है। दोनों मामलों में बोध अलग-अलग ढंग से काम करता है। अगर कोई जहरीला भाव है तो बोध के द्वारा

तुम उससे मुक्‍त हो सकते हो। और अगर भाव शुभ है, आनंदपूर्ण है, सुंदर है तो तुम उससे एक हो जाते हो। बोध उसे प्रगाढ़ कर देता है।

मेरे लिए यही कसौटी है। अगर कोई वृति बोध से सघन होती है तो वह शुभ है और अगर बोध से विसर्जित हो जाती है तो उसे अशुभ मानना चाहिए। जो चीज होश के साथ न जी सके वह पाप है और जो होश के साथ वृद्धि को प्राप्‍त हो वह पुण्‍य है। पुण्‍य और पाप सामाजिक धारणाएं नहीं है। वे आंतरिक उपलब्‍धियां है।

अपने बोध को जगाओं, उसका उपयोग करो। यह ऐसा ही है जैसे कि अंधकार है और तुम दीया जलाये हो। दीए के जलते ही अंधकार विदा हो जाएगा। प्रकाश के आने से अँधेरा नहीं हो जाता है। क्‍योंकि वस्‍तुत: अँधेरा नहीं था। अंधकार प्रकाश का आभाव है। वह प्रकाश की अनुपस्‍थिति था। लेकिन प्रकाश के आने से वहां मौजूद अनेक चीजें प्रकाशित भी हो जाएंगी। प्रकट हो जायेगी। प्रकाश के आने से ये अलमारियां, किताबें, दीवारें विलीन नहीं हो जाएंगी। अंधकार में वे छिपी थी, तुम उन्‍हें नहीं देख सकते थे। प्रकाश के आने से अंधकार विदा हो गया लेकिन उसके साथ ही जो यथार्थ था वह प्रकट हो गया। बोध के द्वारा जो भी अंधकार की तरह नकारात्‍मक है—धृणा, क्रोध, दुःख, हिंसा—वह विसर्जित हो जाएगा और उसके साथ ही प्रेम, हर्ष,आनंद जैसी विधायक चीजें पहली बार तुम पर प्रकट हो जाएंगी।

इसलिए ‘’बहुत समय के बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है, उस हर्ष में लीन होओ।‘’

विज्ञान भैरव तंत्र, भाग—3

 

Vote: 
No votes yet

New Dhyan Updates

Total views Views today
ओशो नाद ब्रह्म ध्‍यान 727 10
सैक्स मनुष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऊर्जा का नाम है। 597 8
नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो 687 6
साक्षी को खोजना— ओशो 407 5
स्त्रियां पुरुष के लिए आकर्षक क्यों बनना चाहती हैं जबकि वे पुरुषों की कामुकता जरा भी पसंद नहीं करतीं ? 338 5
हँसने के पाँच फायदे 274 4
स्‍त्री-पुरूष जोड़ों के लिए नाद ब्रह्म ध्‍यान 498 4
संकल्प कैसे काम करता है? 556 4
साप्ताहिक ध्यान : मौन का रंग 112 4
जिबरिश ध्यान विधि 345 4
ओशो गौरीशंकर ध्‍यान 273 3
ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह 230 3
सफलता कोई मूल्य नहीं है 150 3
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : नकारात्मकता को निकाल फेंकना 99 3
आप अच्छे हैं या स्वाभाविक? 186 3
मैं एक युवती के प्रेम में था। वह मुझे धोखा दे गई ! मैं क्या करूं 194 3
ओशो —हर चक्र की अपनी नींद 292 3
तकिया पीटना ( ध्यान ) - नकारात्मकता को निकाल फेंकना 249 2
ध्यान: क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 189 2
मैं अकेलेपन से बहुत दुखी हूं, मैं इसके लिए क्या करूं? 307 2
स्‍त्री-पुरूष जोड़ों के लिए नाद ब्रह्म ध्‍यान 452 2
सहज योग 272 2
ध्यान : मौन का रंग 240 2
साप्ताहिक ध्यान : ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 145 2
दूसरे का अवलोकन करो 201 2
साधक के लिए पहली सीढ़ी शरीर है 269 2
क्या जीवन को सीधा देखना संभव नहीं है? 196 2
ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 202 2
ध्यान : श्वास : सबसे गहरा मंत्र 146 2
चक्रमण सुमिरन एक वरदान है 368 2
ओशो – अपनी नींद में ध्‍यान कैसे करें 399 2
ओशो की सक्रिय ध्यान विधि 1,170 2
ध्यान :: कभी, अचानक ऐसे हो जाएं जैसे नहीं हैं 178 2
ध्यान : "हां' का अनुसरण 203 2
ओशो देववाणी ध्यान 1,140 2
ध्यान शरीर की आदत नहीं है 153 2
प्रत्येक ध्यान के शीघ्र बाद करुणावान रहो 231 2
साप्ताहिक ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं 80 1
प्रेम का अनुभव पूर्णता का अनुभव है : ईशावास्य उपनिषद 166 1
दूसरे को तुम उतना ही देख पाओगे जितना तुम अपने को देखते हो 187 1
मैं--तू' ध्यान - (ओशो: ध्यान विज्ञान) 138 1
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान 194 1
शांत प्रयोग सफल नहीं होता 203 1
शरीर की शक्ति का ध्यान में उपयोग 92 1
साप्ताहिक ध्यान : ज्ञान और अज्ञान, दोनों के पार 73 1
ध्यान : क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 192 1
ध्यान : काम ऊर्जा से मुक्ति 178 1
शब्दों के बिना देखना 142 1
ओशो नटराज ध्‍यान की विधि 245 1
ग्रंथियों का पता लगाने का एक प्रयोग 242 1
ध्यान -:पूर्णिमा का चाँद 208 1
कर्म का नियम 175 1
ध्यान :"मैं यह नहीं हूं' 185 1
ध्यान : अपने हृदय में शांति का अनुभव करें 191 1
ध्यान: श्वास को विश्रांत करें 108 1
जगत ऊर्जा का विस्तार है 218 1
शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं। 197 1
अपनी श्वास का स्मरण रखें 271 1
प्रेम जितना बढ़ेगा, सेक्‍स उतना क्षीण होगा: ओशो 192 1
विद्यार्थी क्यों अनुशासनहीन हो गए? 211 1
जब हनीमून समाप्त हो जाता है तो इसके बाद क्या? 199 1
ध्यान विधि : - ओशो 238 1
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : श्वास को विश्रांत करें 77 1
क्या यंत्र समाधि प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं? 67 1
साप्ताहिक ध्यान : संयम साधना 71 1
समाधि का पहला अनुभव कैसा होता है? 251 1
ध्यान : सब काल्पनिक है 190 1
बहुत समय बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है, उस हर्ष में लीन होओ। 245 1
आज के युग मे ओशो सक्रिय ध्यान 309 1
प्यारे प्रभु! प्रश्नों के अंबार लगे हैं 208 1
आप ट्रिम होना चाहते है, यह देखे 244 1
यही शरीर, बुद्ध: हां, तुम। 177 1
युवक कौन .... ?? 222 0
व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ 154 0
ओशो नियो-विपस्याना ध्यान 159 0
साप्ताहिक ध्यान "मैं यह नहीं हूं' 72 0
ओशो: जब कामवासना पकड़े तब क्या करें ? 140 0
श्वास को शिथिल करो! 189 0
ध्यान : गर्भ की शांति पायें 225 0
ध्यान : अपनी श्वास का स्मरण रखें 105 0
साप्ताहिक ध्यान : सब काल्पनिक है 94 0
ओशो स्टाॅप मेडिटेशन 189 0
ध्यान : जहां कहीं भी तुम्हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर, अनुभव। 149 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान :: गर्भ की शांति पायें 66 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान -दूसरे का अवलोकन करो 81 0
ध्यान : ज्ञान और अज्ञान, दोनों के पार 169 0
ध्यान : अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें 143 0
सम्मोहन: दुर्व्यसनों से छुटकारा पाने का सशक्त उपाय 107 0
ओशो डाइनैमिक ध्‍यान 259 0
साप्ताहिक ध्यान : कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना 86 0
क्या आप सिगरेट छोड़ना चाहते हैं। 107 0
साप्ताहिक ध्यान : "हां' का अनुसरण 79 0
ओशो – तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का अंग है 333 0
त्राटक-एकटक देखने की विधि है | 227 0
साप्ताहिक ध्यान:: त्राटक ध्यान 85 0
जिस दिन जागरण पूर्ण होगा उस दिन : साक्षी साधना 193 0
ध्यान : अपना मुंह बंद करो! 190 0
ध्यान : संतुलन ध्यान 149 0
ध्यान : प्रमुदिता प्रकाश है 152 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : संतुलन ध्यान 76 0
देखने के संबंध में सातवीं विधि 242 0
पुनर्जन्‍म की बात 200 0
ध्यान : ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 166 0
ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं 136 0
पंख की भांति छूना ध्‍यान —ओशो 231 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान - व्यस्त लोगों के लिये ध्यान 61 0
संन्यासी और गृहस्थी में क्या फर्क है? 168 0
करने की बीमारी 128 0
साप्ताहिक ध्यान : अवधान को बढ़ा 99 0
साप्ताहिक ध्यान : श्वास को शिथिल करो 87 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : श्वास : सबसे गहरा मंत्र 102 0
ध्यान : संतुलन ध्यान 174 0
ध्यान:: त्राटक ध्यान : ओशो 196 0
साप्ताहिक ध्यान : संतुलन ध्यान 88 0
स्वर्णिम प्रकाश ध्यान : ओशो 226 0
प्रेम से भर रहा है ? 153 0
ध्यान : संयम साधना 173 0
ध्यान :: गर्भ की शांति पायें 130 0
ओशो जिबरिश ध्यान विधि 227 0
ध्यान : स्टॉप! (जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो, रुक जाओ।) 161 0
सिरविहीन होने के प्रयोग को--करके देखो 196 0
ध्यान : कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना 142 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 98 0