व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ

व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ

 हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं। न तो हम पदार्थ के जगत में रहते हैं और न हम स्वर्ग के, चेतना के जगत में रहते हैं। हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं। इसे ठीक से, अपने आस-पास थोड़ी नजर फेंक कर देखेंगे, तो समझ में आ सकेगा। हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं-वी लिव इन थिंग्स। ऐसा नहीं कि आपके घर में फर्नीचर है, इसलिए आप वस्तुओं में रहते हैं; मकान है, इसलिए वस्तुओं में रहते हैं; धन है, इसलिए वस्तुओं में रहते हैं। नहीं; फर्नीचर, मकान और धन और दरवाजे और दीवारें, ये तो वस्तुएं हैं ही। लेकिन इन दीवार-दरवाजों, इस फर्नीचर और वस्तुओं के बीच में जो लोग रहते हैं, वे भी करीब-करीब वस्तुएं हो जाते हैं।

 

मैं किसी को प्रेम करता हूं, तो चाहता हूं कि कल भी मेरा प्रेम कायम रहे; तो चाहता हूं कि जिसने मुझे आज प्रेम दिया, वह कल भी मुझे प्रेम दे। अब कल का भरोसा सिर्फ वस्तु का किया जा सकता है, व्यक्ति का नहीं किया जा सकता। कल का भरोसा वस्तु का किया जा सकता है। कुर्सी मैंने जहां रखी थी अपने कमरे में, कल भी वहीं मिल सकती है। प्रेडिक्टेबल है, उसकी भविष्यवाणी हो सकती है। और रिलायबल है, उस पर निर्भर रहा जा सकता है। क्योंकि मुर्दा कुर्सी की अपनी कोई चेतना, अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं है। लेकिन जिसे मैंने आज प्रेम किया, कल भी उसका प्रेम मुझे ऐसा ही मिलेगा-अगर व्यक्ति जीवंत है और चेतना है, तो पक्का नहीं हुआ जा सकता। हो भी सकता है, न भी हो। लेकिन मैं चाहता हूं कि नहीं, कल भी यही हो जो आज हुआ था। तो फिर मुझे कोशिश करनी पड़ेगी कि यह व्यक्ति को मिटा कर मैं वस्तु बना लूं। तो फिर रिलायबल हो जाएगा।

 

तो फिर मैं अपने प्रेमी को पति बना लूं या प्रेयसी को पत्नी बना लूं। कानून का, समाज का सहारा ले लूं। और कल सुबह जब मैं प्रेम की मांग करूं, तो वह पत्नी या वह पति इनकार न कर पाएगा। क्योंकि वादे तय हो गए हैं, समझौता हो गया है; सब सुनिश्चित हो गया है। अब मुझे इनकार करना मुझे धोखा देना है; वह कर्तव्य से च्युत होना है। तो जिसे मैंने कल के प्रेम में बांधा, उसे मैंने वस्तु बनाया। और अगर उसने जरा सी भी चेतना दिखाई और व्यक्तित्व दिखाया, तो अड़चन होगी, तो संघर्ष होगा, तो कलह होगी।

इसलिए हमारे सारे संबंध कलह बन जाते हैं। क्योंकि हम व्यक्तियों से वस्तुओं जैसी अपेक्षा करते हैं। बहुत कोशिश करके भी कोई व्यक्ति वस्तु नहीं हो पाता, बहुत कोशिश करके भी नहीं हो पाता। हां, कोशिश करता है, उससे जड़ होता चला जाता है। फिर भी नहीं हो पाता; थोड़ी चेतना भीतर जगती रहती है, वह उपद्रव करती रहती है। फिर सारा जीवन उस चेतना को दबाने और उस पदार्थ को लादने की चेष्टा बनती है।

 

और जिस व्यक्ति को भी मैंने दबा कर वस्तु बना दिया, या किसी ने दबा कर मुझे वस्तु बना दिया, तो एक दूसरी दुर्घटना घटती है, कि अगर सच में ही कोई बिलकुल वस्तु बन जाए, तो उससे प्रेम करने का अर्थ ही खो जाता है। कुर्सी से प्रेम करने का कोई अर्थ तो नहीं है। आनंद तो यही था कि वहां चैतन्य था। अब यह मनुष्य का डाइलेमा है, यह मनुष्य का द्वंद्व है, कि वह चाहता है व्यक्ति से ऐसा प्रेम, जैसा वस्तुओं से ही मिल सकता है। और वस्तुओं से प्रेम नहीं चाहता, क्योंकि वस्तुओं के प्रेम का क्या मतलब है? एक ऐसी ही असंभव संभावना हमारे मन में दौड़ती रहती है कि व्यक्ति से ऐसा प्रेम मिले, जैसा वस्तु से मिलता है। यह असंभव है। अगर वह व्यक्ति व्यक्ति रहे, तो प्रेम असंभव हो जाएगा; और अगर वह व्यक्ति वस्तु बन जाए, तो हमारा रस खो जाएगा। दोनों ही स्थितियों में सिवा फ्रस्ट्रेशन और विषाद के कुछ हाथ न लगेगा।

 

और हम सब एक-दूसरे को वस्तु बनाने में लगे रहते हैं। हम जिसको परिवार कहते हैं, समाज कहते हैं, वह व्यक्तियों का समूह कम, वस्तुओं का संग"ह ज्यादा है। यह जो हमारी स्थिति है, इसके पीछे अगर हम खोजने जाएं, तो लाओत्से जो कहता है, वही घटना मिलेगी। असल में, जहां है नाम, वहां व्यक्ति विलीन हो जाएगा, चेतना खो जाएगी और वस्तु रह जाएगी। अगर मैंने किसी से इतना भी कहा कि मैं तुम्हारा प्रेमी हूं, तो मैं वस्तु बन गया। मैंने नाम दे दिया एक जीवंत घटना को, जो अभी बढ़ती और बड़ी होती, फैलती और नई होती। और पता नहीं, कैसी होती! कल क्या होता, नहीं कहा जा सकता था। मैंने दिया नाम, अब मैंने सीमा बांधी। अब मैं कल रोकूंगा, उससे अन्यथा न होने दूंगा जो मैंने नाम दिया है।

 

कल सुबह जब मेरे ऊपर क्रोध आएगा, तो मैं कहूंगा, मैं प्रेमी हूं, मुझे क्रोध नहीं करना चाहिए। तो मैं क्रोध को दबाऊंगा। और जब क्रोध आया हो और क्रोध दबाया गया हो, तो जो प्रेम किया जाएगा, वह झूठा और थोथा हो जाएगा। और जो प्रेमी क्रोध करने में समर्थ नहीं है, वह प्रेम करने में असमर्थ हो जाएगा। क्योंकि जिसको मैं इतना अपना नहीं मान सकता कि उस पर क्रोध कर सकूं, उसको इतना भी कभी अपना न मान पाऊंगा कि उसे प्रेम कर सकूं।

लेकिन मैंने कहा, मैं प्रेमी हूं! तो कल जो सुबह क्रोध आएगा, उसका क्या होगा अब? उस वक्त मुझे धोखा देना पड़ेगा। या तो मैं क्रोध को पी जाऊं, दबा जाऊं, छिपा जाऊं, और ऊपर प्रेम को दिखलाए चला जाऊं। वह प्रेम झूठा होगा, क्रोध असली होगा। असली भीतर दबेगा, नकली ऊपर इकट्ठा होता चला जाएगा। तब फिर मैं एक झूठी वस्तु हो जाऊंगा, एक व्यक्ति नहीं। और यह जो भीतर दबा हुआ क्रोध है, यह बदला लेगा। यह रोज-रोज धक्के देगा, यह रोज-रोज टूट कर बाहर आना चाहेगा। और तब स्वभावतः, जिसे प्रेम किया है, उससे ही घृणा निर्मित होगी। और जिसे चाहा है, उससे ही बचने की चेष्टा चलने लगेगी।

 

ओशो: ताओ उपनिषद भाग 1

 

Vote: 
No votes yet

New Dhyan Updates

Total views Views today
ध्यान : काम ऊर्जा से मुक्ति 27 8
ध्यान : कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना 34 5
ध्यान : गर्भ की शांति पायें 131 2
ओशो स्टाॅप मेडिटेशन 103 2
संकल्प कैसे काम करता है? 270 2
जिस दिन जागरण पूर्ण होगा उस दिन : साक्षी साधना 114 2
ध्यान : अपना मुंह बंद करो! 118 2
ध्यान : सब काल्पनिक है 111 2
ध्यान : जहां कहीं भी तुम्हारा अवधान उतरे, उसी बिंदु पर, अनुभव। 83 2
सैक्स मनुष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऊर्जा का नाम है। 390 1
क्या जीवन को सीधा देखना संभव नहीं है? 121 1
ध्यान :"मैं यह नहीं हूं' 83 1
स्‍त्री-पुरूष जोड़ों के लिए नाद ब्रह्म ध्‍यान 290 1
साधक के लिए पहली सीढ़ी शरीर है 163 1
आप अच्छे हैं या स्वाभाविक? 101 1
ओशो नटराज ध्‍यान की विधि 139 1
त्राटक-एकटक देखने की विधि है | 148 1
ध्यान : अपने हृदय में शांति का अनुभव करें 72 1
विद्यार्थी क्यों अनुशासनहीन हो गए? 106 1
देखने के संबंध में सातवीं विधि 158 1
संन्यासी और गृहस्थी में क्या फर्क है? 102 1
पंख की भांति छूना ध्‍यान —ओशो 158 1
नासाग्र को देखना (ध्‍यान)—ओशो 372 1
ओशो – अपनी नींद में ध्‍यान कैसे करें 169 1
प्रेम से भर रहा है ? 91 1
ध्यान : "हां' का अनुसरण 85 1
ओशो —हर चक्र की अपनी नींद 189 1
स्वर्णिम प्रकाश ध्यान : ओशो 153 1
ध्यान विधि : - ओशो 137 1
समाधि का पहला अनुभव कैसा होता है? 148 1
ओशो की सक्रिय ध्यान विधि 833 1
जिबरिश ध्यान विधि 209 1
ओशो देववाणी ध्यान 856 1
आज के युग मे ओशो सक्रिय ध्यान 243 1
ध्यान : मौन का रंग 114 1
ओशो नाद ब्रह्म ध्‍यान 522 1
तकिया पीटना ( ध्यान ) - नकारात्मकता को निकाल फेंकना 126 0
शब्दों के बिना देखना 80 0
शांत प्रयोग सफल नहीं होता 132 0
श्वास को शिथिल करो! 92 0
ध्यान : क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 110 0
सहज योग 144 0
ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह 153 0
ध्यान : ज्ञान और अज्ञान, दोनों के पार 91 0
ध्यान : संतुलन ध्यान 88 0
ध्यान : प्रमुदिता प्रकाश है 89 0
ओशो गौरीशंकर ध्‍यान 169 0
दूसरे का अवलोकन करो 134 0
सफलता कोई मूल्य नहीं है 93 0
ध्यान : ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 93 0
ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं 70 0
ओशो डाइनैमिक ध्‍यान 149 0
ग्रंथियों का पता लगाने का एक प्रयोग 152 0
कर्म का नियम 93 0
ध्यान : श्वास : सबसे गहरा मंत्र 61 0
ध्यान -:पूर्णिमा का चाँद 122 0
जगत ऊर्जा का विस्तार है 80 0
शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं। 96 0
ओशो – तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का अंग है 216 0
पुनर्जन्‍म की बात 114 0
ध्यान:: त्राटक ध्यान : ओशो 87 0
साक्षी को खोजना— ओशो 262 0
करने की बीमारी 72 0
जब हनीमून समाप्त हो जाता है तो इसके बाद क्या? 96 0
ध्यान :: गर्भ की शांति पायें 50 0
ध्वनि के केंद्र में स्नान करो 123 0
मैं एक युवती के प्रेम में था। वह मुझे धोखा दे गई ! मैं क्या करूं 102 0
ध्यान : संतुलन ध्यान 97 0
ध्यान : स्टॉप! (जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो, रुक जाओ।) 84 0
ध्यान :: कभी, अचानक ऐसे हो जाएं जैसे नहीं हैं 96 0
चक्रमण सुमिरन एक वरदान है 234 0
प्रेम जितना बढ़ेगा, सेक्‍स उतना क्षीण होगा: ओशो 115 0
ध्यान : संयम साधना 93 0
अपनी श्वास का स्मरण रखें 174 0
ध्यान शरीर की आदत नहीं है 81 0
यही शरीर, बुद्ध: हां, तुम। 96 0
स्त्रियां पुरुष के लिए आकर्षक क्यों बनना चाहती हैं जबकि वे पुरुषों की कामुकता जरा भी पसंद नहीं करतीं ? 188 0
आप ट्रिम होना चाहते है, यह देखे 89 0
प्रेम का अनुभव पूर्णता का अनुभव है : ईशावास्य उपनिषद 87 0
ओशो नियो-विपस्याना ध्यान 69 0
ओशो जिबरिश ध्यान विधि 151 0
व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ 76 0
व्यस्त लोगों के लिये ध्यान 108 0
सिरविहीन होने के प्रयोग को--करके देखो 134 0
प्यारे प्रभु! प्रश्नों के अंबार लगे हैं 135 0
ध्यान: क्या आप स्वयं के प्रति सच्चे हैं? 98 0
मैं अकेलेपन से बहुत दुखी हूं, मैं इसके लिए क्या करूं? 197 0
बहुत समय बाद किसी मित्र से मिलने पर जो हर्ष होता है, उस हर्ष में लीन होओ। 153 0
युवक कौन .... ?? 140 0
प्रत्येक ध्यान के शीघ्र बाद करुणावान रहो 146 0
हँसने के पाँच फायदे 126 0
मैं--तू' ध्यान - (ओशो: ध्यान विज्ञान) 73 0
ध्यान : अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें 82 0
सम्मोहन: दुर्व्यसनों से छुटकारा पाने का सशक्त उपाय 53 0
स्‍त्री-पुरूष जोड़ों के लिए नाद ब्रह्म ध्‍यान 367 0
दूसरे को तुम उतना ही देख पाओगे जितना तुम अपने को देखते हो 129 0