सहज योग

सहज योग

सहज योग सबसे कठिन योग है; क्योंकि सहज होने से ज्यादा कठिन और कोई बात नहीं। सहज का मतलब क्या होता है?सहज का मतलब होता है: जो हो रहा है उसे होने दें, आप बाधा न बनें। अब एक आदमी नग्न हो गया, वह उसके लिए सहज हो सकता है, लेकिन बड़ा कठिन हो गया। सहज का अर्थ होता है: हवा-पानी की तरह हो जाएं, बीच में बुद्धि से बाधा न डालें;जो हो रहा है उसे होने दें।

बुद्धि बाधा डालती है, असहज होना शुरू हो जाता है। जैसे ही हम तय करते हैं, क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए,बस हम असहज होना शुरू हो जाते हैं। जब हम उसी के लिए राजी हैं जो होता है, उसके लिए राजी हैं, तभी हम सहज हो पाते हैं।

तो इसलिए पहली बात समझ लें कि सहज योग सबसे ज्यादा कठिन है। ऐसा मत सोचना कि सहज योग बहुत सरल है। ऐसी भ्रांति है कि सहज योग बड़ी सरल साधना है। तो कबीर का लोग वचन दोहराते रहते हैं: साधो, सहज समाधि भली। भली तो है, पर बड़ी कठिन है। क्योंकि सहज होने से ज्यादा कठिन आदमी के लिए कोई दूसरी बात ही नहीं है। क्योंकि आदमी इतना असहज हो चुका है, इतना दूर जा चुका है सहज होने से कि उसे असहज होना ही आसान, सहज होना मुश्किल हो गया है। पर फिर कुछ बातें समझ लेनी चाहिए, क्योंकि जो मैं कह रहा हूं वह सहज योग ही है।

सहज योग कहता है: अगर तुम चोर हो तो तुम जानो कि तुम चोर हो--जानते हुए चोरी करो, लेकिन इस आशा में नहीं कि कल अचोर हो जाओगे। यह इतने जोर से छाती में तलवार की तरह चुभ जाएगी कि मैं चोर हूं, कि इसमें जीना असंभव हो जाएगा एक क्षण भी। क्रांति अभी हो जाएगी, यहीं हो जाएगी।

ये भी ध्यानमे रखे   

जिस तरह चुम्बक , लोहे को अपनी ऑर खींचता है ,उसी तरह स्वाभाव भी अपने जैसे स्वभाव को अपनी ऑर खींचता है।  ये एक प्रकृति का ही नियम है।  हरेक प्राणी के लिए सरीर छोड़ ने से पूर्व उसके अनुसार  गर्भ तैयार रहता है । जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही  गर्भ मिलता है । जहाँ किसी हिंस्रक - योनी मैं यैसा गर्भ  तैयार होगा , जहां उसकी सभी अतृप्त वासना की पूर्ति  के सारे साधन हों। जो मनुष्य अपनी हर मन की इच्छा की पूर्ति चाहता है। वो मनुष्य अपनी उन अतृप्त वासना के अनुसार ही पुनह  उत्त्पन्न होता है । परन्तु जिसने भी आत्मा साक्षात्कार कर लिया है । उस पूर्ण हुयी इच्छा वाले मनुष्य की समस्त कामनाएं उसी के सरीर मैं ही विलीन हो जाती है। ऑर वो मुक्त हो जाता है ।  जैसे की कहवत है की " अंत समय जो मति सो गति "।

 

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