स्वर्णिम प्रकाश ध्यान : ओशो

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श्वास भीतर लेते हुए स्वर्णिम प्रकाश को सिर से अपने भीतर आने दो, क्योंकि वहीं पर ही स्वर्ण-पुष्प प्रतीक्षा कर रहा है। वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा। वह तुम्हारे पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा और उसे सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा। यह पुरुष ऊर्जा है...

इसे दिन में कम से कम दो बार करो-सबसे अच्छा समय सुबह-सुबह का है, ठीक तुम्हारे बिस्तर से उठने से पहले। जिस क्षण तुम्हें लगे कि तुम जाग गए, इसे कम से कम बीस मिनट के लिए करो। सुबह सबसे पहला यही काम करो!-बिस्तर से मत उठो। वहीं, उसी समय, तत्क्षण इस विधि को करो, क्योंकि जब तुम नींद से जग रहे होते हो तब बहुत नाजुक और संवेदनशील होते हो। जब तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो तब बहुत ताजे होते हो और इस विधि का प्रभाव बहुत गहरा जाएगा। जिस समय तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो तो उस समय सदा की अपेक्षा तुम बुद्धि में कम होते हो। तो कुछ अंतराल हैं जिनके माध्यम से यह विधि तुम्हारे अंतर्तम सत्व में प्रवेश कर जाएगी। और सुबह-सुबह, जब तुम जाग रहे होते हो और पूरी पृथ्वी जाग रही होती है, उस समय पूरे विश्व में जाग रही ऊर्जा की एक विशाल लहर होती है। उस लहर का उपयोग कर लो; अवसर को मत चूको।

सभी प्राचीन धर्म सुबह-सुबह प्रार्थना किया करते थे जब सूर्य उगता है, क्योंकि सूर्य का उगना अस्तित्व में व्याप्त सभी ऊर्जाओं का उदित होना है। इस क्षण में तुम उदित होती ऊर्जा की लहर पर सवार हो सकते हो; यह सरल होगा। शाम तक यह कठिन हो जाएगा, ऊर्जाएं वापस बैठने लगेंगी; तब तुम धारा के विरूद्ध लड़ोगे। सुबह के समय तुम धारा के साथ जोओगे। तो इसे शुरू करने का सबसे अच्छा समय सुबह-सुबह का है, ठीक उसी समय जब तुम आधे सोए और आधे जागे होते हो। और प्रक्रिया बड़ी सरल है। इसके लिए किसी मुद्रा, किसी योगासन, किसी स्नान इत्यादि, किसी चीज की जरूरत नहीं है तुम अपने बिस्तर पर जैसे लेटे हुए हो, वैसे ही अपनी पीठ के बल लेटे रहो। अपनी आखें बंद रखो। जब तुम श्वास भीतर लो तो कल्पना करो कि एक विशाल प्रकाश तुम्हारे सिर से होकर तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर रहा है, जैसे तुम्हारे सिर के निकट ही कोई सूर्य उग गया हो-स्वर्णिम प्रकाश तुम्हारे सिर में उंडल रहा है, तुम बिलकुल रिक्त हो और स्वर्णिम प्रकाश तुम्हारे सिर में उंडल रहा है, और गहरे से गहरा जाता जा रहा है और तुम्हारे पंजों से बाहर निकल रहा है, जब तुम श्वास भीतर लो, तो इस कल्पना के साथ लो।

और जब तुम श्वास छोड़ो, तो एक और कल्पना करोः अंधकार पंजों से प्रवेश कर रहा है, एक विशाल अंधेरी नदी तुम्हारे पंजों से प्रवेश कर रही है, ऊपर बढ़ रही है और तुम्हारे सिर से बाहर निकल रही है। श्वास धीमी और गहरी रखो ताकि तुम कल्पना कर सको। बहुत धीरे-धीरे बढ़ो। और सो कर उठने के बाद तुम्हारी श्वास गहरी और धीमी हो सकती है क्योंकि शरीर विश्रांत और शिथिल है।

मुझे दोहराने दोः श्वास भीतर लेते हुए स्वर्णिम प्रकाश को सिर से अपने भीतर आने दो, क्योंकि वहीं पर ही स्वर्ण-पुष्प प्रतीक्षा कर रहा है। वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा। वह तुम्हारे पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा और उसे सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा। यह पुरुष ऊर्जा है।

फिर जब तुम श्वास छोड़ो, तो अंधकार को, जितने अंधेरे की तुम कल्पना कर सकते हो-जैसे कोई अंधेरी रात, नदी  के समान-अपने पंजों से उपर उठने दो। यह स्त्रैण ऊर्जा हैः यह तुम्हें शांत करेगी, तुम्हें ग्राहक बनाएगी, तुम्हें मौन करेगी, तुम्हें विश्राम देगी-और उसे अपने सिर से निकल जाने दो। तब फिर से श्वास लो, और स्वर्णिम प्रकाश भीतर प्रवेश कर जाता है।

इसे सुबह-सुबह बीस मिनट के लिए करो। और दूसरा सबसे अच्छा समय है, रात को, जब तुम वापस नींद में लौट रहे हो। बिस्तर पर लेट जाओ, कुछ मिनट आराम करो। जब तुम्हें लगे कि अब तुम सोने और जागने के बीच डोल रहे हो, तो ठीक उस मध्य में प्रक्रिया को फिर से शुरू करो, और उसे बीस मिनट तक जारी रखो। यदि तुम इसे करते-करते सो जाओ, तो सबसे अच्छा, क्योंकि इसका प्रभाव अचेतन में बना रहेगा और वह कार्य करता चला जाएगा।

तीन महीने की एक अवधि के बाद तुम हैरान होओगेः जो ऊर्जा सतत मूलाधर पर, निम्नतम कामकेंद्र पर इकट्ठी हो रही थी, अब वहां इकट्ठी नहीं हो रही है; वह उपर जा रही है।

-ओशो
पुस्तकः ध्यान योगः प्रथम और अंतिम मुक्ति से संकलित

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