ध्यान

प्रेम से भर रहा है ?

एक युवक एक युवती को देख कर प्रेम से भर जाए ।
किस चीज के प्रति प्रेम से भर रहा है ?
उस युवती में उसे कोई सौंदर्य दिखाई पडा़ है जो
बिलकुल अज्ञात है और रहस्यपूर्ण है ।
जिसे वह नहीं समझ पा रहा ।
जो उसकी समझ के पार हुआ जा रहा है ।
कोई अज्ञात सौंदर्य उसके प्राणों को खींच रहा है
जो उसकी समझ के बाहर है ।
वह आकर्षित हो गया है ।
वह उस युवती को प्रेम करके , विवाह करके घर
ले आता है । और महीने-पंद्रह दिन बीतता नहीं कि
प्रेम क्षीण होता मालूम पड़ता है ।
वर्ष दो वर्ष बीतते हैं कि वह ऊब जाता है । क्यों ?

प्यारे प्रभु! प्रश्नों के अंबार लगे हैं

चौथा प्रश्न: प्यारे प्रभु! प्रश्नों के अंबार लगे हैं
उत्तर चुप हैं
कौन सहेजे इन कांटों को
बगिया चुप है, माली चुप है
प्रश्न स्वयं में रहता चुप है
दिनकर चुप है, रातें चुप हैं
उठी बदरिया कारी-कारी
लगा अंधेरा बिलकुल घुप है
प्रभु, इस स्थिति का निराकरण करने की अनुकंपा करें।

संकल्प कैसे काम करता है?

अचेतन है संकल्प का मार्ग, और ध्यान की सीढ़ी है संकल्प ।

हमारा संकल्प बहुत ही क्षीण हो गया है । नाम मात्र को ही रह गया है। सुबह जिस बात का संकल्प हम लेते हैं शाम होते - होते वह बात ही भूला देते हैं । जीवन की छोटी - छोटी बातों को ही हम नहीं समझ पाते हैं, तंबाखू और धूम्रपान जैसे व्यसनों ने हमें अपना गुलाम बना लिया है । रोज यह कह कर कि "आज आखरी बार है... कल से ऐसा नहीं होगा..." हम अपने मन की चालबाजियों में फंसते चले जाते हैं ।

साधक के लिए पहली सीढ़ी शरीर है

साधक के लिए

साधक के लिए पहली सीढ़ी क्या है?

साधक के लिए पहली सीढ़ी शरीर है। लेकिन शरीर के संबंध में न तो कोई ध्यान है, न शरीर के संबंध में कोई विचार है। और थोड़े समय से नहीं, हजारों वर्षों से शरीर उपेक्षित है। यह उपेक्षा दो प्रकार की है। एक तो उन लोगों ने शरीर की उपेक्षा की है, जिन्हें हम भोगी कहते हैं—जों जीवन में खाने—पीने और कपड़े पहनने के अतिरिक्त और किसी अनुभव को नहीं जानते। उन्होंने शरीर की उपेक्षा की है, शरीर का अपव्यय, शरीर को व्यर्थ खोया है, शरीर की वीणा को खराब किया है।

संन्यासी और गृहस्थी में क्या फर्क है?

संन्यासी और गृहस्थी

संन्यासी और गृहस्थी में क्या फर्क है?

घर छोड़कर भागो मत - घर में ही संन्यासी की तरह रहो

संन्यासी और गृहस्थी में जगह का फर्क नहीं है, भाव का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में परिस्थिति का फर्क नहीं है, मनःस्थिति का फर्क है

ओशो स्टाॅप मेडिटेशन

तुम कहीं भी इसका प्रयोग कर सकते हो। तुम स्नान कर रहे हो; अचानक अपने को कहो: स्टॉप! अगर एक क्षण के लिए भी यह एकाएक रुकना घटित हो जाए तो तुम अपने भीतर कुछ भिन्न बात घटित होते पाओगे। तब तुम अपने केंद्र पर फेंक दिए जाओगे। और तब सब कुछ ठहर जाएगा। तुम्हारा शरीर तो पूरी तरह रुकेगा ही, तुम्हारा मन भी गति करना बंद कर देगा।

ओशो – तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का अंग है

ओशो – तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का अंग है

एक, तीसरी आँख की ऊर्जा वही है जो ऊर्जा दो सामान्‍य आंखों को चलाती है। ऊर्जा वही है, सिर्फ वह नई दिशा में नए केंद्र की और गति करने लगती है। तीसरी आँख है; लेकिन निष्‍क्रिय है। और जब तक सामान्‍य आंखे देखना बंद नहीं करती, तीसरी आँख सक्रिय नहीं हो सकती है। देख नहीं सकती। उसी उर्जा को यहां भी बहना है। जब उर्जा सामान्‍य आँखो में बहना बंद कर देती है तो वह तीसरी आँख में बहने लगती है। और जब ऊर्जा तीसरी आँख में बहती है तो सामान्‍य आंखों में देखना बंद कर देती है। अब उनके रहते हुए भी तुम उनके द्वारा कुछ नहीं देखते हो। जो ऊर्जा उनमें बहती थी वह वहां से हट कर नये केंद्र पर गतिमान हो जाती है। यह केंद्र दो

प्रत्येक ध्यान के शीघ्र बाद करुणावान रहो

करुणावान व्यक्ति सर्वाधिक धनी होता है, वह सृष्टि के शिखर पर विराजमान है। उसकी कोई परिधि नहीं, कोई सीमा नहीं। वह बस देता है और अपनी रास्ते चला जाता है। वह तुम्हारे धन्यवाद की भी प्रतीक्षा नहीं करता। वह अत्यंत प्रेम से अपनी उर्जा को बांटता है। इसी को मैं स्वास्थ्य्प्रद कहता हूं।

हँसने के पाँच फायदे

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1) हंसने से हद्रय की एक्सरसाइज हो जाती है। रक्त का संचार अच्छीतरह होता है। हँसने पर शरीर से एंडोर्फिन रसायन निकलता है, ये द्रव्य ह्रदय को मजबूत बनाता है। हँसने से हार्ट-अटैक की संभावना कम हो जाती है। 
2) एक रिसर्च के अनुसार ऑक्सीजन की उपस्थिती में कैंसर कोशिका और कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया एवं वायरस नष्ट हो जाते हैं। ऑक्सीजन हमें हँसने से अधिक मात्रा में मिलती है और शरीर का प्रतिरक्षातंत्र भी मजबूत हो जाता है। 

ओशो नटराज ध्‍यान की विधि

ओशो नटराज ध्‍यान की विधि

ओशो नटराज ध्‍यान ओशो के निर्देशन में तैयार किए गए संगीत के साथ किया जा सकता है। यह संगीत ऊर्जा गत रूप से ध्‍यान में सहयोगी होता है। और ध्‍यान विधि के हर चरण की शुरूआत को इंगित करता है।

नृत्‍य को अपने ढंग से बहने दो; उसे आरोपित मत करो। बल्‍कि उसका अनुसरण करो, उसे घटने दो। वह कोई कृत्‍य नहीं, एक घटना है। उत्‍सवपूर्ण भाव में रहो, तुम कोई बड़ा गंभीर काम नहीं कर रहे हो; बस खेल रहे हो। अपनी जीवन ऊर्जा से खेल रहे हो, उसे अपने ढंग से बहने दे रहे हो। उसे बस ऐसे जैसे हवा बहती है और नदी बहती है, प्रवाहित होने दो……तुम भी प्रवाहित हो रहे हो, बह रहे हो, इसे अनुभव करो।

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