ध्यान

अपनी श्वास का स्मरण रखें

"अगर तुम अपनी सांस पर काबू पा सको तो अपनी भावनाओं पर काबू पा सकोगे। अवचेतन सांस की लय को बदलता रहता है, अत: अगर तुम इस लय के प्रति और उसमें होने वाले सतत बदलाव के बारे में होश से भर जाओगे तो तुम अपनी अवचेतन जड़ों के बारे में, अवचेतन की गतिविधि के बारे में सजग हो जाओगे।"
दि न्यू एल्केमी

1) जब भी स्मरण हो, दिन भर गहरी सांस लो, जोर से नहीं वरन धीमी और गहरी; और शिथिलता अनुभव करो, तनाव नहीं।

श्वास को शिथिल करो!

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जब भी आपको समय मिले, कुछ देर के लिए श्वास-प्रक्रिया को शिथिल कर दें। और कुछ नहीं करना है- पूरे शरीर को शिथिल करने की जरूरत नहीं है। रेलगाड़ी में, हवाई जहाज में या कार में बैठे हैं, किसी और को मालूम भी नहीं पड़ेगा कि आप कुछ कर रहे हैं। बस श्वास-प्रक्रिया को शिथिल कर दें। जैसे वह सहज चलती है, वैसे चलने दें। फिर आंखें बंद कर लें और श्वास को देखते रहें- भीतर गई, बाहर आई, भीतर गई।

ओशो जिबरिश ध्यान विधि

देखना, सुनना और सोचना यह तीन महत्वपूर्ण गतिविधियां हैं। इन तीनों के घालमेल से ही चित्र कल्पनाएं और विचार निर्मित होते रहते हैं। इन्हीं में स्मृतियां, इच्छाएं, कुंठाएं, भावनाएं, सपने आदि सभी 24 घंटे में अपना-अपना किरदार निभाते हुए चलती रहती है। यह निरंतर चलते रहना ही बेहोशी है और इसके प्रति सजग हो जाना ही ध्यान है। साक्ष‍ी हो जाना ही ध्यान है।

 

ध्वनि के केंद्र में स्नान करो

ध्वनि के केंद्र में स्नान करो, मानो किसी जलप्रपात की अखंड ध्वनि में स्नान कर रहे हो। या कानों में अंगुली डाल कर नादों के नाद, अनाहत को सुनो।

इस विधि का प्रयोग कई ढंग से किया जा सकता है। एक ढंग यह है कि कहीं भी बैठ कर इसे शुरू कर दो। ध्वनियां तो सदा मौजूद हैं। चाहे बाजार हो या हिमालय की गुफा, ध्वनियां सब जगह हैं। चुप होकर बैठ जाओ।

दूसरे का अवलोकन करो

दूसरे का अवलोकन करो

"बैठ जायें और एक दूसरे की आखों में देखें (बेहतर होगा पलकें कम से कम झपकें, एक कोमल टकटकी) बिना सोचे गहरे, और गहरे देखें। "यदि आप सोचते नहीं, यदि आप केवल आंखों के भीतर टकटकी लगाकर देखते हैं तो शीघ्र ही तरंगें विलीन हो जायेंगी और सागर प्रकट होगा। यदि आप आंखों में गहरे देख सकते हैं तो आप अनुभव करेंगे कि व्यक्ति विलीन हो गया है, मुखड़ा मिट गया। एक सागरीय घटना पीछे छिपी है और यह व्यक्ति बस उस गहराई का लहराना था, कुछ अनजाने की, कुछ छुपे हुए की एक तरंग।" "पहले तुम यह किसी व्यक्ति के साथ करो क्योंकि तुम इस तरह की तरंग के अधिक नज़दीक हो। फिर जानवरों के साथ करो-थोड़ा सा दूर। फिर पेड़ों के पास जाओ- थोड़ी स

ध्यान -:पूर्णिमा का चाँद

पूर्णिमा का चाँद

रात पूरे चाँद के नीचे बैठकर देखा, कभी टकटकी लगाकर आकाश में पूर्णिमा के चाँद को देखा।कुछ तुम्हारे भीतर भी आंदोलित होने लगता है।वैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य सबसे पहले समुद्र में ही पैदा हुआ। पहला रूप जीवन का मछली है।हिन्दुओं की बात ठीक मालूम होती है कि परमात्मा का पहला अवतार मत्स्य अवतार,मछली का अवतार।वैज्ञानिक विकासवाद भी इसे स्वीकार करता है। और उसके आधार हैं।अब भी मनुष्य के शरीर में जल का अनुपात अस्सी प्रतिशत है।उसमे वे ही रासायनिक द्रव्य हैं जो सागर के जल में हैं।

ग्रंथियों का पता लगाने का एक प्रयोग

ग्रंथियों का पता लगाने का एक प्रयोग

किसी दिन आधा घंटे को सप्ताह में एक एकांत कमरे मैं बंद हो जाएँ, और आपका शरीर जो करना चाहे, करने दें। हो सकता है शरीर आपका नाचे, हो सकता है आप कूदें,हो सकता है आप चिल्लाएं।यह हो सकता है।और तब आपको पता चलेगा कि यह क्या हो रहा है। ये सारी ग्रंथियां हैं, जो दबी हुई हैं और मौजूद हैं।और निकलना चाहती है,लेकिन समाज नहीं निकलने देता, और आप भी नहीं निकलने देते हैं।ऐसा शरीर बहुत-सी ग्रंथियों का घर बना हुआ है।

ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह

ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह

ध्यान आता है, एक फुसफुसाहट की तरह, वह नारे लगाते हुए नहीं आता । वह बहुत ही चुपचाप आता है.... यदि हम व्यस्त हैं,तो वह प्रतीक्षा करता है । और लौट जाता है ।

सहज योग

सहज योग

सहज योग सबसे कठिन योग है; क्योंकि सहज होने से ज्यादा कठिन और कोई बात नहीं। सहज का मतलब क्या होता है?सहज का मतलब होता है: जो हो रहा है उसे होने दें, आप बाधा न बनें। अब एक आदमी नग्न हो गया, वह उसके लिए सहज हो सकता है, लेकिन बड़ा कठिन हो गया। सहज का अर्थ होता है: हवा-पानी की तरह हो जाएं, बीच में बुद्धि से बाधा न डालें;जो हो रहा है उसे होने दें।

बुद्धि बाधा डालती है, असहज होना शुरू हो जाता है। जैसे ही हम तय करते हैं, क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए,बस हम असहज होना शुरू हो जाते हैं। जब हम उसी के लिए राजी हैं जो होता है, उसके लिए राजी हैं, तभी हम सहज हो पाते हैं।

शांत प्रयोग सफल नहीं होता

शांत प्रयोग सफल नहीं होता

शांत प्रयोग सफल नहीं होता। क्योंकि आप भीतर इतने अशांत है कि जब आप आँख बंद करके बैठते हैं तो सिवाय अशांति के भीतर और कुछ भी नहीं होता। वह जो भीतर

अशांति है, वह चक्कर जोर से मारने लगती है। जब आप शांत होकर बैठते हैं, तब आपको सिवाय भीतर के उपद्रव के और कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता।इसलिए, उचित तो यह है कि वह जो भीतर का उपद्रव है, उसे भी बाहर निकल जाने दें। हिम्मत से उसको भी बह जाने दें। उसके बह जाने पर, जैसे तूफान के बाद एक शांति आ जाती है, वैसी शांति आपको अनुभव होगी। तूफान तो धीरे-धीरे विलीन हो जाएगा और शांति स्थिर हो जाएगी।

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