ध्यान

आप अच्छे हैं या स्वाभाविक?

स्वाभाविक होना बेहतर है अपने क्रोध पर नियंत्रण करने से।

 

प्रश्नकर्ता: ऐसे तो मैं अपने मित्र खो दूंगा... और ईमानदार होने के इतना मूल्य चुकाना बहुत ज़्यादा होगा।

 

ऐसा नहीं है, क्योंकि यदि आप स्वाभाविक हैं तो संभव है तत्काल आपको लगे कि मूल्य अधिक है; लेकिन ऐसा कभी होता नहीं! अंतत: स्वाभाविक होना सदा हितकर होता है। दमन आपको यह धोखा दे सकता है सब कुछ नियंत्रण में है और सब ठीक चल रहा है;लेकिन अंत में आपको भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा। तब बहुत देर हो चुकी होती है और आप कुछ नहीं कर पाते। सब के साथ यही हुआ है। हर मां ने हर बच्चे के साथ यही किया है।

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करने की बीमारी

करने की बीमारी

“पहले, कृत्य की प्रकृति और उसमें छिपे प्रवाह को समझना होगा, अन्यथा विश्रान्ति सम्भव नहीं है। यदि फिर भी तुम विश्रान्त होना चाहते हो, यह असम्भव होगा यदि तुम ने कृत्य की प्रकृति को ध्यान से नहीं देखा होगा, ध्यान नहीं रखा होगा, वास्तव में साकार होते नहीं देखा होगा, क्योंकि कृत्य साधारण घटना नहीं है।

 

बहुत से लोग विश्रान्त होना चाहते है, लेकिन वे विश्रान्त नहीं हो पाते। विश्रान्ति एक फूल खिलने के समान है: तुम इसे मजबूर नहीं कर सकते। तुम्हें पूरी घटना को समझना होगा। तुम इतने सक्रिय क्यों हो, सक्रियता की इतनी आतुरता क्यों, इसके लिए इतना पागलपन क्यों?

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ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं

ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं

तुम बगीचे में बैठे हो और सड़क पर ट्रैफिक है, शोरगुल है और तरहत्तरह की आवाजें आ रही हैं। तुम अपनी आंखें बंद कर लो और वहां होने वाली सबसे सूक्ष्म आवाज को पकड़ने की कोशिश करो। कोई कौआ कांव-कांव कर रहा है; कौए की इस कांव-कांव पर अपने को एकाग्र करो। सड़क पर यातायात का भारी शोर है, इसमें कौए की आवाज इतनी धीमी है, इतनी सूक्ष्म है कि जब तक तुम अपने बोध को उस पर एकाग्र नहीं करोगे तुम्हें उसका पता भी नहीं चलेगा। लेकिन अगर तुम एकाग्रता से सुनोगे तो सड़क का सारा शोरगुल दूर हट जाएगा और कौए की आवाज केंद्र बन जाएगी। और तुम उसे सुनोगे, उसके सूक्ष्म भेदों को भी सुनोगे। वह बहुत सूक्ष्म है, लेकिन तुम उसे सुन पाओग Read More : ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं about ध्यान : अनुभव करें, विचारें नहीं

ध्यान : स्टॉप! (जैसे ही कुछ करने की वृत्ति हो, रुक जाओ।)

तुम कहीं भी इसका प्रयोग कर सकते हो। तुम स्नान कर रहे हो; अचानक अपने को कहो: स्टॉप! अगर एक क्षण के लिए भी यह एकाएक रुकना घटित हो जाए तो तुम अपने भीतर कुछ भिन्न बात घटित होते पाओगे। तब तुम अपने केंद्र पर फेंक दिए जाओगे। और तब सब कुछ ठहर जाएगा। तुम्हारा शरीर तो पूरी तरह रुकेगा ही, तुम्हारा मन भी गति करना बंद कर देगा।

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व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ

व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ

 हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं। न तो हम पदार्थ के जगत में रहते हैं और न हम स्वर्ग के, चेतना के जगत में रहते हैं। हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं। इसे ठीक से, अपने आस-पास थोड़ी नजर फेंक कर देखेंगे, तो समझ में आ सकेगा। हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं-वी लिव इन थिंग्स। ऐसा नहीं कि आपके घर में फर्नीचर है, इसलिए आप वस्तुओं में रहते हैं; मकान है, इसलिए वस्तुओं में रहते हैं; धन है, इसलिए वस्तुओं में रहते हैं। नहीं; फर्नीचर, मकान और धन और दरवाजे और दीवारें, ये तो वस्तुएं हैं ही। लेकिन इन दीवार-दरवाजों, इस फर्नीचर और वस्तुओं के बीच में जो लोग रहते हैं, वे भी करीब-करीब वस्तुएं हो जाते हैं।

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ध्यान शरीर की आदत नहीं है

ध्यान इसलिए कठिन मालूम होता है क्योँकि शरीर की बंधी हुई आदतों को तोड़कर उसमेँ नई व्यवस्था निर्मित करनी होती है । शरीर की बंधी हुई आदतें कौन सी हैं और उन्हेँ कैसे तोड़ा जा सकता है इस पर पढ़िए ओशो का मार्गदर्शन जो उन्होँने एक ध्यान शिविर में साधकोँ को किया है। Read More : ध्यान शरीर की आदत नहीं है about ध्यान शरीर की आदत नहीं है

ध्यान :"मैं यह नहीं हूं'

ध्यान :"मैं यह नहीं हूं'

मन कचरा है! ऐसा नहीं है कि आपके पास कचरा है और दूसरे के पास नहीं है। मन ही कचरा है। और अगर आप कचरा बाहर भी फेंकते रहें, तो जितना चाहे फेंकते रह सकते हैं, लेकिन यह कभी खतम होने वाला नहीं है। यह खुद ही बढ़ने वाला कचरा है। यह मुर्दा नहीं है, यह सकि"य है। यह बढ़ता रहता है और इसका अपना जीवन है, तो अगर हम इसे काटें तो इसमें नई पत्तियां अंकुरित होने लगती हैं।

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कर्म का नियम

कर्म का नियम

कर्म का नियम , पहले तो, नियम ही नहीं है। वह शब्द उसे इस तरह की गंध देता है जैसे वह कुछ वैज्ञानिक हो , गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह। वह सिर्फ एक आशा है , नियम तो जरा भी नहीं है।सदियों तक यह आशा की

गई है कि तुम  भलाई करोगे तो कुछ भले परिणाम होंगे। यह अस्तित्व में एक मानवीय आशा है लेकिन अस्तित्व बिलकुल तटस्थ है।

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प्रेम का अनुभव पूर्णता का अनुभव है : ईशावास्य उपनिषद

प्रेम का अनुभव पूर्णता का अनुभव है

 मनोवैज्ञानिक तो कहते हैं कि हमारी सारी तकलीफ एक है, हमारा सारा तनाव, हमारी सारी एंग्जाइटी, हमारी सारी चिंता एक है; और वह चिंता इतनी है कि प्रेम कैसे मिले! और जब प्रेम नहीं मिलता तो हम सब्स्टीट्यूट खोजते हैं प्रेम के, हम फिर प्रेम के ही परिपूरक खोजते रहते हैं। लेकिन हम जिंदगीभर प्रेम खोज रहे हैं, मांग रहे हैं।

 

क्यों मांग रहे हैं? आशा से कि मिल जाएगा, तो बढ़ जाएगा। इसका मतलब फिर यह हुआ कि हमें फिर प्रेम का पता नहीं था। क्योंकि जो चीज मिलने से बढ़ जाए, वह प्रेम नहीं है। कितना ही प्रेम मिल जाए, उतना ही रहेगा जितना था।

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ध्यान : अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें

 तादात्मय तोड़ें

अपनी आंखें बंद करें, फिर दोनों आंखों को दोनों भवों के बीच में एकाग्र करें, ऐसे जैसे तुम दोनों आंखों से देख रहे हों। अपनी संपूर्ण एकाग्रता वहां ले जाएं। 

एक सही बिंदु पर तुम्हारी आंखें स्थिर हो जाएंगी। और अगर तुम्हारी एकाग्रता वहां है तो तुम्हें अजीब सा अनुभव होगा: पहली बार तुम्हारा साक्षात्कार तुम्हारे विचारों से होगा; तुम साक्षी हो जाओगे। यह चित्रपट की तरह है: विचार दौड़ रहे हैं और तुम साक्षी हो।  Read More : ध्यान : अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें about ध्यान : अपने विचारों से तादात्मय तोड़ें

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