कपालभाति प्राणायाम नहीं बल्कि षट्कर्म का अभ्यास है।

कपालभाति प्राणायाम नहीं बल्कि षट्कर्म का अभ्यास है।

कपालभाति प्राणायाम नहीं बल्कि षट्कर्म का अभ्यास है। इसके लिए पालथी लगाकर सीधे बैठें, आंखें बंदकर हाथों को ज्ञान मुद्रा में रख लें। ध्यान को सांस पर लाकर सांस की गति को अनुभव करें और अब इस क्रिया को शुरू करें। इसके लिए पेट के निचले हिस्से को अंदर की ओर खींचे व नाक से सांस को बल के साथ बाहर फेंके। यह प्रक्रिया बार-बार इसी प्रकार तब तक करते जाएं जब तक थकान न लगे। फिर पूरी सांस बाहर निकाल दें और सांस को सामान्य करके आराम से बैठ जाएं।

कपालभाति के बाद मन शांत, सांस धीमी व शरीर स्थिर हो जाता है। कुछ समय के लिए ध्यान की अवस्था में बैठे रहें। यह एक राउंड कपालभाति है। एक राउंड में जितनी बार आप आराम से सांस बाहर फेंक सकें उतना ही करें। इस प्रकार इसका तीन से चार राउंड अभ्यास कर लें।

सावधानी : यह अभ्यास सुबह खाली पेट शौचादि के बाद खुले वातावरण में करें। हाई बीपी, हृदय रोग में इसका अभ्यास गाइडेंस में करें। हर्निया, अल्सर व पेट का ऑपरेशन हुआ हो तो इसका अभ्यास न करें। महिलाओं को गर्भावस्था व मासिक धर्म के दिनों में यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।

 

लाभ : अभ्यास के समय ध्यान को गिनती या घड़ी पर न रखें। बल्कि विचार करें कि निकलती हुई सांस अपने साथ अन्दर के विकारों को बाहर निकाल रही है।
पेट के बार-बार अन्दर जाने से पाचन तंत्र के अंग जैसे अमाशय, आंतें, लीवर, किडनी, पैंक्रियाज आदि अंग स्वस्थ हो रहे हैं।
इससे मोटापा, डायबटीज, कब्ज़, गैस, भूख ना लगना और अपच जैसे पेट के रोग ठीक होते हैं।
यह बाल झड़ने से भी बचाता है।
हृदय, फेफड़े, थायरॉयड व मस्तिष्क को बल मिलता है।
खून में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़कर रक्त शुद्ध होने लगता है।
महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता, कष्टार्तव, श्वेत प्रदर, आदि को ठीक कर गर्भाशय व ओवरी को बल मिलता है।
इसके अभ्यास से हार्मोंस संतुलित रहते हैं व शरीर में गांठे नहीं पड़ने देते।
- यह क्रिया शरीर का वज़न संतुलित रखने में भी मदद करती है।

 

 

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