सब रोगों की प्राणायाम

प्राणायाम

प्राणायाम दो शब्दों के योग से बना है-(प्राण+आयाम) पहला शब्द "प्राण" है दूसरा "आयाम"। प्राण का अर्थ जो हमें शक्ति देता है या बल देता है। सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने वाले डॉक्टर अब प्राणायाम, योग, ध्यान करके खुद भी स्वस्थ बनाने में जुट गए हैं। योग-प्रक्रियाओं के अन्तर्गत प्राणायाम का एक अतिविशिष्ट महत्त्व है। पतंजलि ऋषि ने मनुष्य-मात्र के कल्याण हेतु अष्टांग योग की विधान किया है। प्रकृति का नियम है कि प्रत्येक चल वस्तु, प्रत्येक क्रियाशील जड़ या चेतन में समय समय पर कुछ न कुछ खराबी निरंतर कार्य करने के कारण आ जाती है। मनुष्य का शरीर इसका अपवाद नहीं है। अतः एव नाना प्रकार की व्याधियों से भी मनुष्य ने अपनी रक्षा के साधन तलाश किये। रोगों से छुटकारा पाने के लिये नाना प्रकार की औषधियों को खोजा। उपचार के नियम बनाये। 

सदा मानव हित का चिन्तन करने ऋषि मुनियों का ध्यान विशेष रूप से इस और गया। इसी संदर्भ में महर्षि पतंजलि ने योगासनों का अविष्कार अथवा उनका चलन किया। बतलाया कि मनुष्य नित्य नियमित रूप से कुछ समय के लिये शारिरिक क्रियाएं कर अपने शरीर की संचालन व्यवस्था को सुचारू रूप से ठीक रख सकता है। ऐसा करने पर किसी भी प्रकार का रोग उसे पकड़ न सकेगा। उसका शरीर स्वस्थ बना रहेगा। वह दीर्घायु भी हो सकता है।
 

 

प्राणायाम-योग और आयुर्वेद पुरातन भारतीय संस्कृति की विश्व को अनुपम देन हैै।

प्राणायाम सभी चिकित्सा पद्धतियों में सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसके नियमित और विधिवत अभ्यास से समस्त स्नायु कोष, नस नाडि़याँ, अस्थियाँ, मांसपेशियाँ और अंग प्रत्यंग के रोग दूर होकर वे सशक्त और सक्रिय बनते हैं, प्राणशक्ति व जीवनीशक्ति बढ़ती है, सप्तधातुएं परिपुष्ट होती हैं। प्राणायाम से शारिरिक एवं मानसिक लाभ के साथ आध्यात्मिक उन्नति भी होती है।

सावधानियां

  • स्नान करके करें अन्यथा प्राणायाम-योगाभ्यास के आधा घंटा विश्राम के पश्चात स्नान करें।
  • प्राणायाम-योगाभ्यास के आधे घण्टे पश्चात पानी, जूस एवं एक घण्टे बाद ही भोजन आदि लें तथा भोजन के पांच घण्टे के अन्तराल पर ही प्राणायाम एवं योगासन करें।
  • रोगी/अस्वस्थ न करें। महिलाएं माहवारी व गर्भावस्था में आसन न करें।
  • श्वसन क्रिया में मुहँ बंद रखें नासिका का उपयोग करें। कमरदर्द वाले आगे झूकने वाले
  • आसन न करें तथा हर्निया के रोगी पीछे झूकने वाले आसन न करें।
  • अभ्यास के दौरान मल, मूत्र, छींक, खांसी आदि न रोकें। विसर्जित करके करें।
  • जल्दबाजी/प्रतिस्पर्धा/जबरदस्ती/झटके के साथ न करें।
     

शारिरिक स्थिती

  1. साधकगण किसी भी एक आसन सुखासन, वज्रासन पद्मासन, सिद्धासन मे बैठेंगे जो आपको सुखकर लगे व अधिक समय तक बैठ सकें।
  2. सिर गर्दन मेरूदण्ड को एक सीधी रेखा में सीधा रखें। चेहरा सामने सीधा रखें।
  3. आंखे कोमलता से बंद ताकि मन अंर्तमुखी हो बाहरी दृश्यों में चित्त अटके नहीं।
  4. चेहरे पर प्रसन्नता के भाव, किसी प्रकार का कोई तनाव नहीं।
  5. कोई भी एक मुद्रा लगा लें-ध्यान मुद्रा, पृथ्वीमुद्रा, वायुमुद्रा, प्राणमुद्रा, शुन्यमुद्रा मुद्रा में सीधी रहने वाली अंगुलियां सीधी रहें । 
  6. तीन बार ओउम् का उच्चारण लम्बा गहरा श्वांस नाक के द्वारा फेफड़ों में भरें और ओउम् का उच्चारण नाभि की गहराई से करें। तीन बार करेंगे।
  7.  
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