राग परिचय

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान वाला पटियाला घराना

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान

पटियाला घराना ख्याल गायकी के बड़े घरानों में गिना जाता है. इस घराने के प्रतिनिधि गायकों में अली बख्श और फतेह अली खान की गिनती होती है.

हालांकि इस घराने की लोकप्रियता बड़े गुलाम अली खान के आने के बाद से बढ़ी. इस घराने में ठुमरियों की गायकी पर महारत हासिल है.

इस घराने की गायकी में भावपक्ष पर भी काफी जोर दिया जाता है. मंद्र, मध्य और तार यानी तीनों सप्तक में इस घराने के कलाकार अपनी द्रुत ताने प्रस्तुत करते हैं. Read More : उस्ताद बड़े गुलाम अली खान वाला पटियाला घराना about उस्ताद बड़े गुलाम अली खान वाला पटियाला घराना

सबसे पुराना माना जाता है ग्वालियर घराना

ग्वालियर घराना

ख्याल गायकी में ग्वालियर घराने को सबसे पुराना माना जाता है. इस घराने को शुरू करने वालों में नत्थन पीरबख्श का योगदान अहम माना जाता है.| ग्वालियर घराने की गायकी में स्वरों की बढ़त सरल होती है. इस घराने की बड़ी पहचान गंभीर किस्म की गायकी है. गंभीर किस्म की पहचान के पीछे पारंपरिक बंदिशों का गाया जाना है.

किसी भी राग के बीच में पेश की जाने वाली तानें भी इस घराने में बड़ी विविधता के साथ पेश की जाती हैं. संगीत सम्राट विष्णु दिगंबर पलुस्कर इसी घराने से थे. Read More : सबसे पुराना माना जाता है ग्वालियर घराना about सबसे पुराना माना जाता है ग्वालियर घराना

स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां

स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां

स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां

स्वर

श्रुति

स्वर

श्रुति

 

तीव्रा

 

वज्रिका

 

कुमुद्वती

 

प्रसारिणी

 

मन्द्रा

 

प्रीति

सा

छन्दोवती

मार्जनी

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वेद में एक शब्द है समानिवोआकुति

वेद में एक शब्द है समानिवोआकुति

वेद में एक शब्द है समानिवोआकुति जिसका अर्थ है श्रोताओं को मन के अनुसार बांध कर सामान भाव से संतुष्ट कर देना. उन्होंने ठुमरी को नीचे से ऊपर पहुँचाया और अगर उन्हें संगीत का वाज्ञेयकार कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.

"मुझे याद है 1972 में टाउनहॉल मैदान में एक कार्यक्रम के दौरान वो मंच पर आईं और उन्होंने राग यमन, मालकौंस के बाद कई बंदिशें सुनाई लेकिन उसके बाद जब ठुमरी शुरू हुई तो उपस्थित जनसमूह ने उन्हें कुछ देर और गाने का आग्रह किया. बड़े ही मीठे स्वर में उन्होंने कहा 'आप लोग जाए न देबा’ और वे एक घंटे तक अनवरत जाती रहीं. Read More : वेद में एक शब्द है समानिवोआकुति about वेद में एक शब्द है समानिवोआकुति

रागदारी: शास्त्रीय संगीत में घरानों का मतलब

रागदारी: शास्त्रीय संगीत में घरानों का मतलब

शास्त्रीय संगीत में घरानों की परंपरा बड़ी पुरानी है. आपने जब भी किसी शास्त्रीय कलाकार का नाम सुना होगा ज्यादातर मौकों पर उसके साथ एक घराने का नाम भी सुना होगा. घराना शब्द हिंदी के घर और संस्कृत के गृह शब्द से बना है. क्या आपने कभी सोचा कि इन घरानों का मतलब क्या है? दरअसल इस सवाल का जवाब बहुत आसान है. घराने से सीधा मतलब है एक विशेष किस्म की गायकी.

भारतीय शास्त्रीय संगीत में तमाम घराने हुए हैं. हर घराने में थोड़ा बहुत फर्क है. ये फर्क गायकी के अंदाज से लेकर बंदिशों तक में दिखाई और सुनाई देता है. |

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आगरा का भी है अपना शास्त्रीय घराना

फैयाज खान साहब को आगरा घराने की शुरुआत करने वाला माना जाता है. दरअसल आगरा घराने की पहचान पहले ध्रुपद गायकी में थी बाद में ख्याल गायकी में भी इस घराने के कलाकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई.

आगरा घराने की गायकी को दमदार गायकी कहा जाता है क्योंकि इस घराने के गायक स्वरों में दमदार प्रस्तुति देते हैं. इस घराने की गायकी में लयकारी का महत्व काफी ज्यादा है. इस घराने के बड़े कलाकारों में सीए व्यास, जितेंद्र अभिषेकी, विजय किचलू, सुमति मुटाटकर का नाम लिया जाता है. Read More : आगरा का भी है अपना शास्त्रीय घराना about आगरा का भी है अपना शास्त्रीय घराना

जयपुर- अतरौली घराने की देन हैं एक से बढ़कर एक कलाकार

जयपुर- अतरौली घराने की देन हैं एक से बढ़कर एक कलाकार

शास्त्रीय संगीत की दुनिया में मल्लिकार्जुन मंसूर, केसरबाई, किशोरी अमोनकर, श्रुति साडोलकर, पद्मा तलवलकर और अश्विनी भीड़े देशपांडे जैसे नामचीन कलाकारों की क्या कद है, ये बताने की जरूरत नहीं है. ये सभी कलाकार अतरौली घराने के हैं.

इस घराने की शुरुआत महान कलाकार अल्लादिया खान ने की थी. इस घराने की गायकी को कठिन इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इसमें वक्र स्वर समूहों को प्रस्तुत किया जाता है. आपको हाल ही में अपने लाखों चाहने वालों को अलविदा कह गईं किशोरी ताई की गायकी सुनाते हैं. Read More : जयपुर- अतरौली घराने की देन हैं एक से बढ़कर एक कलाकार about जयपुर- अतरौली घराने की देन हैं एक से बढ़कर एक कलाकार

कर्नाटक गायन शैली के प्रमुख रूप

कर्नाटक गायन शैली

वर्णम: इसके तीन मुख्य भाग पल्लवी, अनुपल्लवी तथा मुक्तयीश्वर होते हैं। वास्तव में इसकी तुलना हिंदुस्तानी शैली के ठुमरी के साथ की जा सकती है।

जावाली: यह प्रेम प्रधान गीतों की शैली है। भरतनाट्यम के साथ इसे विशेष रूप से गाया जाता है। इसकी गति काफी तेज होती है।

तिल्लाना: उत्तरी भारत में प्रचलित तराना के समान ही कर्नाटक संगीत में तिल्लाना शैली होती है। यह भक्ति प्रधान गीतों की गायन शैली है। Read More : कर्नाटक गायन शैली के प्रमुख रूप about कर्नाटक गायन शैली के प्रमुख रूप

भारतीय शास्त्रीय संगीत का आधार:

भारतीय शास्त्रीय संगीत का आधार

भारतीय शास्त्रीय संगीत आधारित है स्वरों व ताल के अनुशासित प्रयोग पर।सात स्वरों व बाईस श्रुतियों के प्रभावशाली प्रयोग से विभिन्न तरह के भाव उत्पन्न करने की चेष्टा की जाती है। सात स्वरों के समुह को सप्तक कहा जाता है। भारतीय संगीत सप्तक के ये सात स्वर इस प्रकार हैं 
षडज (सा), ऋषभ(रे), गंधार(ग), मध्यम(म), पंचम(प), धैवत(ध), निषाद(नि)।
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क्या अलग था गिरिजा देवी की गायकी में

क्या अलग था गिरिजा देवी की गायकी में

ठुमरी, टप्पा, भजन और खयाल इत्यादि सब कुछ पर समान अधिकार होने के अलावा उनकी अकृत्रिम सुमधुर आवाज़, भरपूर तैयारी और भक्ति भावना से ओत-प्रोत प्रस्तुतिकरण उन्हें अविस्मरणीय बनाता था. खुद भाव प्रमण होकर शब्दों से खेलना और उसके माध्यम रुलाना हँसाना उन्हें खूब आता था.

वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य बताते हैं, 'मैंने 1970 से लेकर 2017 तक लगातार, बनारस में हुए उनके हर कार्यक्रम को सुना है और मुझे यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि उनकी ख्याल गायकी में चारों वाणी सुनाई देती थी. अतिविलम्बित, दीर्घविलम्बित, मध्यविलम्बित और अंत में तेज़ तान के साथ जाती थी. Read More : क्या अलग था गिरिजा देवी की गायकी में about क्या अलग था गिरिजा देवी की गायकी में

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