अभोगी कान्ह्डा

राग कालिंगडा
थाट: 

राग अभोगी कान्हड़ा दक्षिण भारतीय पद्धति का राग है। इसमें कान्हड़ा का अंग है, इसलिये गन्धार को अन्दोलित करते हुए ग१ म रे सा ऐसे वक्र रूप मे लिया जाता है। कुछ संगीतकार इस राग को कान्हड़ा अंग के बिना गाते हैं और उसे सिर्फ अभोगी बोलते हैं जिसमें ग म रे सा की जगह म ग रे सा लिया जाता है।

इस राग की प्रकृति गंभीर है। इसका विस्तार तीनों सप्तकों में किया जा सकता है। यह स्वर संगतियाँ राग अभोगी कान्हड़ा का रूप दर्शाती हैं -

सा रे ,ध सा ; रे ग१ म ; ग१ म ध सा' ; सा' ध म ; ध म ग१ रे ; ग१ म रे सा ; रे ,ध सा ; रे ग१ म रे सा ;

 

स्वर पंचम, निषाद वर्ज्य। गंधार कोमल। बाकी सब शुद्ध स्वर।

जाति औढव - औढव वक्र

थाट काफी

वादी/संवादी मध्यम/षड्ज

समय रात्रि का दूसरा प्रहर

विश्रांति स्थान रे; म; ध; सा;

मुख्य अंग सा रे ,ध सा ; रे ग१ म ; ग१ म रे सा

आरोह-अवरोह सा रे ग१ म ध सा' - सा' ध म ग१ रे ग१ म रे सा ; रे ,ध ,ध सा।

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