काफी

राग: 

राग भीमपलास और भीमपलास पर आधारित गीत

यह राग काफी थाट से निकलता है। आरोह में ः?रे"' और ः?ध"' नहीं लगता और अवरोह में सब स्वर लगते हैं, इसलिये इस की जाति औडव-सम्पूर्ण मानी जाती है। इसमें ः?ग"' और ः?नी"' कोमल लगते हैं। वादी स्वर ः?म"' और सम्वादी स्वर ः?स"' माना जाता है।

गाने-बजाने का समय दिन का तीसरा प्रहर है।

आरोह--ड, स, ज्ञ, म प ड सं।

अवरोह--सं, ड, ध प, म ज्ञ रे स।

पकड़--ड स म, म ज्ञ, प म, ज्ञ म ज्ञ रे स।

रागांग वर्गीकरण पद्धति एवं प्रमुख रागांग

रागों का वर्गीकरण, टाइम थ्योरी ऑफ़ रागस इन हिंदी, संगीत राग, थाट व उसके प्रकार, राग दीपक नोट्स, राग की परिभाषा, मल्हार राग

प्रमुख रागों में ऐसे स्वर समूह होते है जिनसे उनकी स्वतंत्र छवि बनती है। ऐसे ही स्वतंत्र छवि बनाने वाले स्वर समूह को रागांग कहते है तथा स्वतंत्र अंग वाले राग, रागांग प्रमुख राग माने जाते हैं। ऐसे रागों में विस्तार की विस्तृत संभावनायें रहती है। आधुनिक काल में हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में रागांग वर्गीकरण पद्धति को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसी पद्धति एवं प्रमुख रागांग आदि का विश्लेषण इस लेख में प्रस्तुत किया गया है।

राग परिचय

राग परिचय
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सात स्वर, अलंकार सा, रे, ग, म, प ध, नि 6,916 17
आविर्भाव-तिरोभाव 1,074 12
थाट,थाट के लक्षण,थाटों की संख्या 2,101 9
राग मारू बिहाग का संक्षिप्त परिचय- 1,780 9
रागों के प्रकार 2,379 8
रागो पर आधारित फ़िल्मी गीत 1,319 5
राग भूपाली 1,508 5
सात स्वरों को ‘सप्तक’ कहा गया है 1,432 4
राग रागिनी पद्धति 1,696 4
वादी - संवादी 1,098 3
रागांग वर्गीकरण पद्धति एवं प्रमुख रागांग 2,509 3
ठुमरी : इसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है 807 3
राग यमन (कल्याण) 1,328 3
शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व 1,987 3
स्वर मालिका तथा लिपि 835 3
स्वर मालिका तथा लिपि 1,277 3
राग ललित! 1,079 2
राग,पकड़,वर्ज्य स्वर,जाति,वादी स्वर,संवादी स्वर,अनुवादी स्वर,विवादी स्वर,आलाप,तान 554 2
नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज। 672 2
स्वन या ध्वनि भाषा की मूलभूत इकाई हैक्या है ? 664 2
टप्पा गायन : एक परिचय 135 2
सुर की समझ गायकी के लिए बहुत जरूरी है. 1,116 2
रागों मे जातियां 2,049 2
राग बहार 766 2
स्वर (संगीत) 851 2
संगीत संबंधी कुछ परिभाषा 2,095 1
‘राग’ शब्द संस्कृत की धातु 'रंज' से बना है 93 1
सप्तक क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समूह को कहते हैं। 439 1
राग दरबारी कान्हड़ा 1,294 1
शुद्ध स्वर 1,295 1
राग 'भैरव':रूह को जगाता भोर का राग 979 0
राग मुलतानी 517 0
रागों का विभाजन 327 0
षड्जग्राम-तान बोधिनी 184 0
सुर-ताल के साथ गणित को समझना आसान 1,243 0
मध्यमग्राम-तान-बोधिनी 180 0
राग- गौड़ सारंग 310 0
रागांग राग वर्गीकरण से अभिप्राय 388 0
कुछ रागों की प्रकृति इस प्रकार उल्लेखित है- 567 0
स्वर परिचय
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संगीत के स्वर 443 11
स्वर षड्ज का शास्त्रीय परिचय 239 3
संगीत रत्नाकर के अनुसार स्वरों के कुल, जाति 245 2
स्वर ऋषभ का शास्त्रीय परिचय 197 0
स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय 208 0
स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय 183 0
स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय 173 0
स्वर धैवत का शास्त्रीय परिचय 179 0
स्वर निषाद का शास्त्रीय परिचय 150 0
स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां 212 0
सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर 183 0
भारतीय शास्त्रीय संगीत
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निबद्ध- अनिबद्ध गान: व्याख्या, स्वरूप, भेद 1,112 11
भारतीय शास्त्रीय संगीत की जानकारी 1,323 11
हारमोनियम के गुण और दोष 2,776 10
हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में प्रचलित गायन के प्रकार 950 9
संगीत से सम्बन्धित 'स्वर' के बारे में है 748 5
हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति रागों पर आधारित है 735 4
अलंकार- भारतीय शास्त्रीय संगीत 2,632 4
संगीत शास्त्र परिचय 2,597 4
नाट्य-शास्त्र संगीत कला का प्राचीन विस्तरित ग्रंथ है 611 3
भारतीय संगीत 521 2
भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है 809 2
तानपुरे अथवा सितार के खिचे हुये तार को आघात करने से तार कम्पन करता है 559 2
रागों की उत्पत्ति ‘थाट’ से होती है। 409 2
संस्कृत में थाट का अर्थ है मेल 325 1
संगीत का विकास और प्रसार 1,028 1
ध्वनि विशेष को नाद कहते हैं 526 1
निबद्ध- अनिबद्ध गान: 398 1
स्वरों का महत्त्व क्या है? 474 1
षडजांतर | शास्त्रीय संगीत के जाति लक्षण क्यां है 710 1
'राग' शब्द संस्कृत की 'रंज्' धातु से बना है 671 1
जानिए भारतीय संगीत के बारे में 1,191 1
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राग यमन 364 0
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कर्ण स्वर 339 0
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ठाटों का स्वरूप

भैरव भैरवि आसावरी, यमन बिलावल ठाट।
तोड़ी काफ़ी मारवा, पूर्वी और खमाज।।
शुद्ध सुरन की बिलावल, कोमल निषाद खमाज
म तीवर स्वर यमन मेल, ग नि मृदु काफ़ी ठाट।।
गधनि कोमल से आसावरी, रे ध मृदु भैरव रूप।।
रे कोमल चढ़ती मध्यम, मारवा ठाट अनूप।।
उतरत रे ग ध अरु नी से, सोहत ठाट भैरवी।।
तोड़ी में रेग धम विकृत, रेधम विकृत ठाट पूर्वी।।

 

थाट के लक्षण

  1. प्रत्येक ठाट में अधिक से अधिक और कम से कम सात स्वर प्रयोग किये जाने चाहिए। इसका कारण यह है कि अगर ठाट सम्पूर्ण (सात स्वर वाला) नहीं रहता है तो किस प्रकार उससे सम्पूर्ण रागों की उत्पत्ति मानी जाएगी?
  2. ठाट सम्पूर्ण होने के साथ-साथ उसके स्वर स्वाभाविक क्रम से होने चाहिए। उदाहरण के लिए सा के बाद रेरे के बाद    के बाद  और नी आने ही चाहिए। यह बात दूसरी है कि ठाट में किसी स्वर का शुद्ध रूप न प्रयोग किया जाए, बल्कि विकृत रूप प्रयोग किया जाए। उदाहरणार्थ भैरव ठाट में कोमल रे और कल्याण ठाट में तीव्र  स्वर प्रयोग किये जाते हैं।
  3. किसी ठाट में आरोह-अवरोह दोनों का होना आवश्यक नहीं है, क्योंकि प्रत्येक ठाट के आरोह और अवरोह में कोई अन्तर नहीं होता। केवल आरोह या अवरोह को देखन से ही यह ज्ञात हो जाता है कि वह कौन सा ठाट है।
  4. ठाट गाया-बजाया नहीं जाता। अत: उसमें वादी-सम्वादी, पकड़, आलाप-तान आदि की आवश्यकता नहीं होती।
  5. ठाट में राग उत्पन्न करने की क्षमता होती है।

थाटों की संख्या

हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में आजकल 10 ठाट माने जाते हैं। इन ठाटों से समस्त राग उत्पन्न माने गये। आधुनिक काल में स्व. विष्णु नारायण भातखण्डे ने ठाट-पद्धति को प्रचार में लाने की कल्पना की और ठाटों की संख्या को 10 माना है। ठाटों के नाम और स्वर निम्नलिखित हैं–

  1. बिलावल ठाट – प्रत्येक स्वर शुद्ध।
  2. कल्याण ठाट – केवल म तीव्र और अन्य स्वर शुद्ध।
  3. खमाज ठाट – नि कोमल और अन्य स्वर शुद्ध।
  4. आसावरी ठाट – ग, ध, नि कोमल और शेष स्वर शुद्ध।
  5. काफ़ी ठाट – ग, नि कोमल और शेष स्वर शुद्ध।
  6. भैरवी ठाट – रे, ग, ध, नि कोमल और शेष स्वर शुद्ध।
  7. भैरव ठाट – रे, ध कोमल और शेष स्वर शुद्ध।
  8. मारवा ठाट – रे कोमल, मध्यम तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध।
  9. पूर्वी ठाट – रे, ध कोमल, म तीव्र और शेष स्वर शुद्ध।
  10. तोड़ी ठाट – रे, ग, ध कोमल, म तीव्र और शेष स्वर शुद्ध।
  11.