देव गन्धार

थाट: 

इस राग का विस्तार राग जौनपुरी के समान होता है। राग गांधारी भी इसके पास का राग है परन्तु राग गांधारी में कोमल रिषभ लिया जाता है। जबकि देव गंधार में रिषभ शुद्ध है। जौनपुरी और गांधारी में आरोह में गंधार वर्ज्य है। परन्तु देव गंधार में आरोह में शुद्ध गंधार लिया जाता है। यह स्वर संगतियाँ राग देव गन्धार का रूप दर्शाती हैं -

सा ; रे ,नि१ ; सा रे ग म ; ग१ रे ; ग म ; म म प ; ध१ म प ; ग१ रे१ ग म ; नि१ ध१ प ; प ध१ ध१ प म प ग१ रे१ ग म ग१ रे सा रे ,नि१ ; सा रे ग म ; र ग म प ; म ; म प ध१ ध१ नि१ नि१ सा' ; रे' नि१ ध१ प ; ध१ प ग१ रे ; रे ग म ग१ रे ; रे सा म प सा' ; सा' रे' ग' म' ; म' ग१' रे' सा' ; रे' नि१ ; नि१ ध१ प ; ध१ प म ग१ ; रे ; ग म ; म ग१ रे ; ग म ग१ रे सा;

 

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