नाद-साधन भी मोक्ष प्राप्ति का ऐक मार्ग है।

नाद-साधन भी मोक्ष प्राप्ति का ऐक मार्ग है।

हिन्दू मतानुसार मोक्ष प्राप्ति मानव जीवन का लक्ष्य है। नाद-साधन (म्यूजिकल साउँड) भी मोक्ष प्राप्ति का ऐक मार्ग है। नाद-साधन के लिये ऐकाग्रता, मन की पवित्रता, तथा निरन्तर साधना की आवश्यक्ता है जो योग के ही अंग हैं। आनन्द की अनुभूति ही संगीत साधना की प्राकाष्ठा है। संगीत के लिये भक्ति भावना अति सहायक है इस लिये संगीत आरम्भ से ही मन्दिरों, कीर्तनों (डिस्को), तथा सामूहिक परम्पराओं के साथ जुडा रहा है। भारत का अनुसरण करते हुये पाश्चात्य देशों में भी संगीत का आरम्भ और विकास चर्च के आँगन से ही हुआ था फिर वह नाट्यशालाओं में विकसित हुआ, और फिर जनसाधारण के साथ लोकप्रिय संगीत (पापुलर अथवा पाप म्यूज़िक) बन गया।

छन्द-गायन तथा जातीय-गायन वैदिक काल से ही वैदिक परम्पराओं के साथ जुड गया था जिस का उल्लेख महाकाव्यों, और सामाजिक साहित्य में मिलता है। भारत में यह कला ईसा से कई शताब्दियाँ पूर्व ही पूर्णत्या विकसित हो चुकी थी। इसी सामूहिक कंठ-गायन को पाश्चात्य जगत में कोरल संगीत कहा जाता है।

वैदिक छन्द-गायन की परम्परायें लिखित थीं। छन्दोग्य उपनिष्द पुजारी वर्ग को समान गायन परिशिक्षण देने का महत्वपूर्ण माध्यम था। ‘समन’ का गायन और वीणा के माध्यम से वादन दोनो होते थे। मन्दिरों के प्राँगणों में नृत्य भी पूजा अर्चना का अंग था। मन्दिरों से पनप कर यह कला राजगृहों तथा उत्सवों को सजाने लग गयी और फिर समस्त सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग बन गयी। मुस्लिम काल में संगीत राज घरानों के मनोरंजन का प्रमुख साधन बन गया था।

प्रथम दशक में भारतीय संगीत सम्बन्धी साहित्य के कई मौलिक ग्रँथ उपलब्ध हैं जिन से संगीत के विकास का पता चलता है। सप्तवीं शताब्दी में मातँगा कृत ‘बृहदेशी’ ऐक मुख्य ग्रँथ है जिस में प्रथम बार ‘राग’ का वर्णन किया गया है। अन्य कृति शारंगदेव का ग्रंथ ‘संगीत-रत्नाकर’ है जो तेहरवीं शताब्दी में लिखा गया था। इस में तत्कालिक शौलियों, पद्धतियों और परम्पराओं का विस्तरित उल्लेख है।

ईसा से 200-300 वर्ष पूर्व पिंगल ने संगीत पद्धति के क्षेत्र में योग्दान दिया है। उस के आलेखों में बाईनरी संख्या तथा ‘पास्कल-त्रिभुज’ का आलेख भी मिलता है। संगीत के क्षेत्र में ‘श्रुति’ (ध्वनि का सूक्षम रूप जो सुना और अनुसरन किया जा सके) का आधार वायु में आन्दोलन कारी तरंगें है जिन्हें ‘अनुराणना’ (टोनल हार्मनीज) कहा जाता है। दो या उस से अधिक श्रुतियों को मिला कर स्वरों की रचना भारत के संगीतिज्ञ्यों ने करी थी।

 

 

 

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राग परिचय

राग परिचय
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सात स्वर, अलंकार सा, रे, ग, म, प ध, नि 2,801 35
मध्यमग्राम-तान-बोधिनी 19 17
शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व 1,151 11
रागों के प्रकार 824 10
रागांग वर्गीकरण पद्धति एवं प्रमुख रागांग 1,633 9
सात स्वरों को ‘सप्तक’ कहा गया है 761 9
राग बहार 366 9
रागों मे जातियां 1,232 9
राग रागिनी पद्धति 987 9
वादी - संवादी 476 8
रागो पर आधारित फ़िल्मी गीत 239 7
राग मारू बिहाग का संक्षिप्त परिचय- 688 7
राग दरबारी कान्हड़ा 659 7
आविर्भाव-तिरोभाव 466 7
शुद्ध स्वर 576 6
राग 'भैरव':रूह को जगाता भोर का राग 451 5
थाट,थाट के लक्षण,थाटों की संख्या 918 5
राग यमन (कल्याण) 485 5
सुर-ताल के साथ गणित को समझना आसान 702 5
संगीत संबंधी कुछ परिभाषा 1,146 5
स्वन या ध्वनि भाषा की मूलभूत इकाई हैक्या है ? 217 4
राग मुलतानी 283 4
सुर की समझ गायकी के लिए बहुत जरूरी है. 371 4
राग भूपाली 600 4
षड्जग्राम-तान बोधिनी 26 4
स्वर (संगीत) 446 4
स्वर मालिका तथा लिपि 315 4
स्वर मालिका तथा लिपि 663 4
राग,पकड़,वर्ज्य स्वर,जाति,वादी स्वर,संवादी स्वर,अनुवादी स्वर,विवादी स्वर,आलाप,तान 182 3
रागांग राग वर्गीकरण से अभिप्राय 155 3
कुछ रागों की प्रकृति इस प्रकार उल्लेखित है- 222 2
राग ललित! 591 2
ठुमरी : इसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है 429 1
राग- गौड़ सारंग 133 1
नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज। 334 0
सप्तक क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समूह को कहते हैं। 209 0
शास्त्रीय नृत्य
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भारतीय नृत्य कला 490 18
माइक्रोफोन का कार्य 171 0
नाट्य शास्त्रानुसार नृतः, नृत्य, और नाट्य में तीन पक्ष हैं – 199 0
भरत नाट्यम - तमिलनाडु 144 0
भारतीय शास्त्रीय संगीत
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भारतीय परम्पराओं का पश्चिम में असर 575 12
संगीत का विकास और प्रसार 612 9
हारमोनियम के गुण और दोष 1,435 9
संगीत शास्त्र परिचय 1,698 9
भारतीय शास्त्रीय संगीत की जानकारी 618 7
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