रागों के प्रकार

रागों के प्रकार

मुग़ल़कालीन शासन के दौरान ही शायद रागों के गाने बजाने का निर्धारित समय कभी प्रचलन में आया। जिन्हें उनकी प्रकृति के आधार पर विभाजित किया गया। जिनका वर्णन निम्न प्रकार से दिया जा सकता है:-

जिन रागों को दोपहर के बारह बजे से मध्यरात्रि तक गाया बजाया जाता था उन्हें पूर्व राग कहा गया।
मध्यरात्रि से दोपहर के बीच गाए बजाए जाने वाले रागों को उत्तर राग कहा गया।
कुछ राग जिन्हें भोर या संध्याकालीन समय में गाया जाता था उन्हें संधिप्रकाश राग कहा गया। *यही नहीं कुछ राग ऋतुप्रधान भी माने गए। जैसे राग मेघमल्हार वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला राग है। इसी तरह राग बसंत को वसंत ऋतु में गाए जाने की प्रथा है।
लक्षण
प्राचीन काल में राग के दस लक्षण माने जाते थे, जिनके नाम हैं– ग्रह, अंश, न्यास, अपन्यास, षाडवत्व, ओडवत्व, अल्पत्व, बहुत्व, मन्द और तार। इनमें से कुछ लक्षण आज भी परिवर्तित रूप में प्रयोग किये जाते हैं। आधुनिक समय में राग के निम्नलिखित लक्षण माने जाते हैं–

राग केदार
ऊपर यह बताया गया है कि वह रचना जो कानों को अच्छी लगे, राग कहलाती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि राग का प्रथम लक्षण या विशेषता है कि प्रत्येक राग में रंजकता अवश्य होना चाहिए।
राग में कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर होने चाहिए। पाँच स्वरों से कम का राग नहीं होता है।
प्रत्येक राग को किसी न किसी ठाट से उत्पन्न माना गया है। जैसे राग भूपाली को कल्याण ठाट से और राग बागेश्वरी को काफ़ी ठाट से उत्पन्न माना गया है।
किसी भी राग में षडज अर्थात् सा कभी वर्जित नहीं होता, क्योंकि यह सप्तक का आधार स्वर होता है।
प्रत्येक राग में म और प में से कम से कम एक स्वर अवश्य रहना चाहिए। दोनों स्वर एक साथ वर्जित नहीं होते। अगर किसी राग में प के साथ शुद्ध म भी वर्जित है, तो उसमें तीव्र म अवश्य रहता है। भूपाली राग में म वर्जित है तो मालकोश में प, किन्तु कोई राग ऐसा नहीं है जिसमें म और प दोनों एक साथ वर्ज्य होते हों।
प्रत्येक राग में आरोह-अवरोह, वादी-साम्वादी, पकड़, समय आदि आवश्यक हैं।
राग में किसी स्वर के दोनों रूप एक साथ एक दूसरे के बाद प्रयोग नहीं किये जाने चाहिए। उदाहरणार्थ कोमल रे और शुद्ध रे अथवा कोमल ग और शुद्ध ग दोनों किसी राग में एक साथ नहीं आने चाहिए। यह अवश्य ही सम्भव है कि आरोह में शुद्ध प्रयोग किया जाए और अवरोह में कोमल, जैसे खमाज राग के आरोह में शुद्धि नि और अवरोह में कोमल नि प्रयोग किया जाता है।
भारत की संस्कृति का एक स्तंभ भारतीय शास्त्रीय संगीत, जीवन को संवारने और सुरुचिपूर्ण ढंग से जीने की कला है। यह आधार है हर तरह के संगीत का साथ ही ऐसी गरिमामयी धरोहर है, जिससे लोक और लोकप्रिय संगीत की अनेक धाराएँ निकलती हैं। यह न केवल तीज त्योहारों में राग रंग भरती हैं बल्कि विभिन्न संस्कारों और अवसरों में भी उल्लासमय बनाते हुए अनोखी रौनक प्रदान करती हैं।

 

 

 

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