राग परिचय

स्वर मालिका तथा लिपि

स्वर मालिका तथा लिपि

भारतीय संगीत शास्त्री अन्य कई बातों में भी पाश्चात्य संगीत कारों से कहीं आगे और प्रगतिशील थे। भारतीयों ने ऐक ‘सप्तक’ ( सात स्वरों की क्रमबद्ध लडी – ‘सा री ग म प ध और नि’ को 22 श्रुतियों (इन्टरवल) में बाँटा था जब कि पाश्चात्य संगीत में यह दूरी केवल 12 सेमीटोन्स में ही विभाजित करी गयी है। भारतीयों ने स्वरों के नामों के प्रथम अक्षर के आधार पर ‘सरगमें’ बनायी जिन्हें गाया जा सकता है। ईरानियों और उन के पश्चात मुसलमानों ने भी भारतीय स्वर मालाओं (सरगमों) को अपनाया है।

राग- गौड़ सारंग

ठाठ - कल्याण (मतान्तर में कई लोग इसे विलावल ठाठ से उत्पन्न भी मानते हैं) 
दोनों मध्यम का प्रयोग 
गायन समय- दोपहर या मध्यान्ह काल 
वादी - ग
संवादी- ध 
जाति- सम्पूर्ण (*वक्र सम्पूर्ण- अर्थात आरोह व अवरोह में सभी स्वरों का प्रयोग *वक्र होता है)

*वक्र स्वर का अर्थ - जिस स्वर का प्रयोग सीधे न होकर घुमा कर किया जाए - उदाहरानार्थ 'सा रे ग म' सीधे न गा कर अगर 'सा रे ग रे म' गाया जाए तो ग वक्र स्वर हुआ क्योंकि ग के बाद सीधे म न लगा कर रे पर उतर कर फिर म लगा )

रागों मे जातियां

रागों मे जातियां

राग विवरण मे सुनते है अमुक राग अमुक जाति का है। "जाति" शब्द राग मे प्रयोग किये जाने वाले स्वरों की संख्या का बोध कराती है । रागों मे जातियां उनके आरोह तथा अवरोह मे प्रयोग होने वाले स्वरों की संख्या पर निर्धारित होती है।

दामोदर पंडित द्वारा रचित संगीत दर्पण मे कहा गया है……

ओडव: पंचभि:प्रोक्त: स्वरै: षडभिश्च षाडवा।
सम्पूर्ण सप्तभिर्ज्ञेय एवं रागास्त्रिधा मत: ॥

शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व

शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समयानुसार गायन प्रस्तुत करने की पद्धति है, तथा उत्तर भारतीय संगीत-पद्धति में रागों के गायन-वादन के विषय में समय का सिध्दांत प्राचीन काल से ही चला आ रहा है, जिसे हमारे प्राचीन पंडितों ने दो भागों में विभाजित किया है। प्रथम भाग दिन के बारह बजे से रात्रि के बारह बजे तक और दूसरा रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक माना गया है। इसमें प्रथम भाग को पूर्व भाग और दुसरे को उत्तर भाग कहा जाता है। इन भागों में जिन रागों का प्रयोग होता है, उन्हें सांगीतिक भाषा में “पूर्वांगवादी राग” और “उत्तरांगवादी राग” भी कहते है। जिन रागों का वादी स्वर जब सप्तक के पूर्वांग अर्थात

राग,पकड़,वर्ज्य स्वर,जाति,वादी स्वर,संवादी स्वर,अनुवादी स्वर,विवादी स्वर,आलाप,तान

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राग- कम से कम पाँच और अधिक से अधिक ७ स्वरों से मिल कर बनता है राग। राग को गाया बजाया जाता है और ये कर्णप्रिय होता है। किसी राग विशेष को विभिन्न तरह से गा-बजा कर उसके लक्षण दिखाये जाते है, जैसे आलाप कर के या कोई बंदिश या गीत उस राग विशेष के स्वरों के अनुशासन में रहकर गा के आदि।

पकड़- पकड़ वह छोटा सा स्वर समुदाय है जिसे गाने-बजाने से किसी राग विशेष का बोध हो जाये। उदाहरणार्थ- प रे ग रे, .नि रे सा गाने से कल्याण राग का बोध होता है।

रागो पर आधारित फ़िल्मी गीत

रागो पर आधारित फ़िल्मी गीत

ना जइयो 2 सौतन घर सैया अभोग अभोगी
जिया लगे क्या करू सजना – अभोगी अभोगी
राधिके तूने बंसरी चुरायी- बेटी कट्टर अड़ाना
झनक झनक पायल बाजे झनक झनक पायल बाजे – अड़ाना
मनमोहन मन में हो तुम्ही -कैसे कहूंअदाना अदाना
चाह बर्बाद करेगी – शाहजहां बागेश्री बागेश्री
शुभ घड़ी आई रे- बागेश्री बागेश्री
दीवाने तुम कि दीवाने हम -बागेश्री बागेश्री
जा रे बेईमान तुझे जन लिया- बागेश्री बागेश्री
बेदर्दी हुआ बलमा -बागेश्री बागेश्री
दगाबाज्ज तू नहीं बलमा मोरा बागेश्री
राधा ना बोले ना बोले आजाद बागेश्री बागेश्री

कुछ रागों की प्रकृति इस प्रकार उल्लेखित है-

बागेश्री- विरहोत्कंठिता नारी का सजीव चित्रण

गुणक्री -वासक सज्जा नायिका

तोड़ी - विरह दग्धा, विरहिणी

ललित- खंडिता नारी (वियोग श्रृंगार)

रागेश्री- विप्रलब्धा

बहार- उत्साही युवक

जोगिया - वेदना, करूणा से भरी स्त्री

सोहनी- आवेश युक्त प्रेम कलह से उग्र

भैरवी - अनेक रंग, भक्ति, करूणा, विरह, खुशी।

दरबारी - प्रौढ़, गम्भीर, राजसी व्यक्तित्व वाला

अड़ाना - चंचल, उत्साही युवक

मारवा- वेदना ग्रस्त पुरूष

मालकौंस- शान्त, सौम्य

हिंडोल -आवेश युक्त, उग्र, उदभट

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राग परिचय

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