राग परिचय

‘राग’ शब्द संस्कृत की धातु 'रंज' से बना है

‘राग’ शब्द संस्कृत

‘राग’ शब्द संस्कृत की धातु 'रंज' से बना है। रंज् का अर्थ है - रंगना। जिस तरह एक चित्रकार तस्वीर में रंग भरकर उसे सुंदर बनाता है, उसी तरह संगीतज्ञ मन और शरीर को संगीत के सुरों से रंगता ही तो हैं। कि उसमें कितने स्वर हैं। आरोह का अर्थ है चढना और अवरोह का उतरना। संगीत में स्वरों को क्रम उनकी ऊँचाई-निचाई के आधार पर तय किया गया है। ‘सा’ से ऊँची ध्वनि ‘रे’ की, ‘रे’ से ऊँची ध्वनि ‘ग’ की और ‘नि’ की ध्वनि सबसे अधिक ऊँची होती है। जिस तरह हम एक के बाद एक सीढ़ियाँ चढ़ते हुए किसी मकान की ऊपरी मंजिल तक पहुँचते हैं उसी तरह गायक सा-रे-ग-म-प-ध-नि-सां का सफर तय करते हैं। इसी को 'आरोह' कहते हैं। इसके विपरीत ऊ

टप्पा गायन : एक परिचय

टप्पा गायन

टप्पा शब्द हिंदी भाषा का शब्द है यह भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक गायन शैली है यह गायन शैली अत्यंत चंचल प्रकार की है  इसमें केवल स्थाई और अंतरा दो ही भाग होते हैं जो द्रुपद और खयाल की अपेक्षा अधिक संक्षिप्त होते हैं । इस शैली में करुण रस श्रृंगार रस की प्रधानता रहती है। परंतु रविंद्र संगीत में टप्पा गीत अधिकतर पूजा से संबंधित होते हैं। इसमें श्रंगार एक और प्रेम रस का अभाव रहता है ऐसा माना जाता है मियां छोरी ने बेसरा गीती के आधार पर इस का विकास किया था इस शैली का विकास अवध के दरबार में हुआ परंतु इसका उद्गम पंजाब के पहाड़ी क्षेत्र में हुआ ऐसा हम इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि अधिकतर शब्द इसमें प

स्वन या ध्वनि भाषा की मूलभूत इकाई हैक्या है ?

स्वन या ध्वनि भाषा की मूलभूत इकाई हैक्या है ?

स्वन या ध्वनि भाषा की मूलभूत इकाई है। ‘स्वन’ शब्द के लिए अंग्रेजी में ‘Phone’ शब्द है। ध्वनि का लघुत्तम अनुभवगम्य विच्छिन्न खण्ड स्वन विज्ञान में ‘स्वन’ कहलाता है। ‘ध्वनि’ शब्द संस्कृत ‘ध्वन्’ (आवाज करना, शब्द करना) धातु के साथ इण (इ) प्रत्यय संम्पृक्त करने से बनता है। इसका अर्थ होता है-‘आवाज’ या ‘आवाज करना’। व्यक्ति जब बोलता है, तो उसके मुख-विवर से वायु निकलती है जो वागेन्द्रिय के माध्यम से कुछ वाणी (आवाज) प्रकट करती है, उसी को ‘ध्वनि’ कहा जाता है। संस्कृत में उसके लिए ध्वन और ध्वनन तथा स्वन और स्वनन शब्दों का प्रयोग किया गया है। किंतु सभी का आशय एक ही है। डॉ.

रागो पर आधारित फ़िल्मी गीत

रागो पर आधारित फ़िल्मी गीत

मनमोहन मन में हो तुम्ही -कैसे कहूंअदाना अदाना
चाह बर्बाद करेगी – शाहजहां बागेश्री बागेश्री
शुभ घड़ी आई रे- बागेश्री बागेश्री
दीवाने तुम कि दीवाने हम -बागेश्री बागेश्री
जा रे बेईमान तुझे जन लिया- बागेश्री बागेश्री
बेदर्दी हुआ बलमा -बागेश्री बागेश्री
दगाबाज्ज तू नहीं बलमा मोरा बागेश्री
राधा ना बोले ना बोले आजाद बागेश्री बागेश्री
जाग दर्द ए इश्क जाग- अनारकली बागेश्री बागेश्री
चमन में रंग ए बहार उतरा तो मैंने देखा – ग़ज़ल गुलाम अली बागेश्री बागेश्री

स्वर मालिका तथा लिपि

स्वर मालिका तथा लिपि

भारतीय संगीत शास्त्री अन्य कई बातों में भी पाश्चात्य संगीत कारों से कहीं आगे और प्रगतिशील थे। भारतीयों ने ऐक ‘सप्तक’ ( सात स्वरों की क्रमबद्ध लडी – ‘सा री ग म प ध और नि’ को 22 श्रुतियों (इन्टरवल) में बाँटा था जब कि पाश्चात्य संगीत में यह दूरी केवल 12 सेमीटोन्स में ही विभाजित करी गयी है। भारतीयों ने स्वरों के नामों के प्रथम अक्षर के आधार पर ‘सरगमें’ बनायी जिन्हें गाया जा सकता है। ईरानियों और उन के पश्चात मुसलमानों ने भी भारतीय स्वर मालाओं (सरगमों) को अपनाया है।

राग भूपाली

राग भूपाली

राग भूपाली
राग परिचय--

: यह राग भूप के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इसका विस्तार तथा चलन अधिकतर मध्य सप्तक के पूर्वांग व मन्द्र सप्तक में किया जाता है। यह चंद्र प्रकाश के समान शांत स्निग्ध वातावरण पैदा करने वाला मधुर राग है। जिसका प्रभाव वातावरण में बहुत ही जल्दी घुल जाता है। रात्रि के रागों में राग भूपाली सौम्य है। शांत रस प्रधान होने के कारण इसके गायन से वातावरण गंभीर व उदात्त बन जाता है। राग भूपाली कल्याण थाट का राग है।

शुद्ध स्वर

विकृत स्वर, तीव्र स्वर, कोमल स्वर, स्वर के भेद, संगीत के स्वर, हिंदुस्तानी संगीत में शुद्ध और विकृत कुल मिलाकर कितने स्वर होते हैं, सप्तक के प्रकार, संगीत के सात सुर

सा, रे, ग, म, प, ध, नि शुद्ध स्वर कहे जाते हैं। इनमें सा और प तो अचल स्वर माने गए हैं, क्योंकि ये अपनी जगह पर क़ायम रहते हैं। बाकी पाँच स्वरों के दो-दो रूप कर दिए गए हैं, क्योंकि ये अपनी जगह पर से हटते हैं, इसलिए इन्हें कोमल व तीव्र नामों से पुकारते हैं। इन्हें विकृत स्वर भी कहा जाता है।

राग दरबारी कान्हड़ा

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राग दरबारी कान्हड़ा

प्राचीन संगीत ग्रन्थों मे राग दरबारी कान्हड़ा के लिये भिन्न नामों का उल्लेख मिलता है। कुछ ग्रन्थों मे इसका नाम कणार्ट, कुछ मे कणार्टकी तो अन्य ग्रन्थों मे कणार्ट गौड़ उपलब्ध है। वस्तुत: कन्हण शब्द कणार्ट शब्द का ही अपभ्रंश रूप है। कान्हड़ा के पूर्व दरबारी शब्द का प्रयोग मुगल शासन के समय से प्रचलित हुआ ऐसा माना जाता है। कान्हड़ा के कुल कुल 18 प्रकार माने जाते हैं-

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राग परिचय

राग परिचय
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सात स्वर, अलंकार सा, रे, ग, म, प ध, नि 7,007 7
स्वन या ध्वनि भाषा की मूलभूत इकाई हैक्या है ? 683 3
स्वर मालिका तथा लिपि 1,301 2
राग ललित! 1,095 2
नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज। 686 2
रागांग वर्गीकरण पद्धति एवं प्रमुख रागांग 2,527 1
ठुमरी : इसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है 815 1
राग मुलतानी 533 1
सात स्वरों को ‘सप्तक’ कहा गया है 1,445 1
राग बहार 791 1
रागों के प्रकार 2,419 1
रागों मे जातियां 2,065 1
सुर-ताल के साथ गणित को समझना आसान 1,251 1
राग दरबारी कान्हड़ा 1,311 1
शुद्ध स्वर 1,313 1
स्वर (संगीत) 865 1
स्वर मालिका तथा लिपि 853 1
कुछ रागों की प्रकृति इस प्रकार उल्लेखित है- 577 1
आविर्भाव-तिरोभाव 1,113 1
संगीत संबंधी कुछ परिभाषा 2,112 1
राग 'भैरव':रूह को जगाता भोर का राग 996 1
रागो पर आधारित फ़िल्मी गीत 1,342 1
टप्पा गायन : एक परिचय 143 0
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राग यमन (कल्याण) 1,354 0
रागों का विभाजन 334 0
सुर की समझ गायकी के लिए बहुत जरूरी है. 1,123 0
राग मारू बिहाग का संक्षिप्त परिचय- 1,814 0
राग रागिनी पद्धति 1,716 0
राग भूपाली 1,530 0
शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व 2,002 0
षड्जग्राम-तान बोधिनी 186 0
सप्तक क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समूह को कहते हैं। 446 0
मध्यमग्राम-तान-बोधिनी 183 0
राग- गौड़ सारंग 316 0
रागांग राग वर्गीकरण से अभिप्राय 395 0
वादी - संवादी 1,123 0
राग,पकड़,वर्ज्य स्वर,जाति,वादी स्वर,संवादी स्वर,अनुवादी स्वर,विवादी स्वर,आलाप,तान 566 0
थाट,थाट के लक्षण,थाटों की संख्या 2,136 0
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स्वर परिचय
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संगीत के स्वर 467 1
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स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय 210 0
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स्वर निषाद का शास्त्रीय परिचय 153 0
स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां 214 0
सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर 187 0
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शास्त्रीय नृत्य
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नाट्य शास्त्रानुसार नृतः, नृत्य, और नाट्य में तीन पक्ष हैं – 431 1
भारतीय नृत्य कला 1,048 0
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माइक्रोफोन का कार्य 356 0
हिंदुस्तानी संगीत के घराने
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संगीत घराने और उनकी विशेषताएं 3,501 0
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कैराना का किराना घराने से नाता 341 0
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सिलेबस
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सिलेबस : प्रारंभिक महागुजरात गन्धर्व संगीत समिति 351 0
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सिलेबस : सांगीत विनीत (मध्यमा पूर्व) महागुजरात गन्धर्व संगीत समिति 202 0
सिलेबस : उप विशारद महागुजरात गन्धर्व संगीत समिति 277 0