संगीत शास्त्र परिचय

संगीत के स्वर, संगीत की परिभाषा, संगीत का अर्थ, संगीत के राग, भारतीय शास्त्रीय संगीत, गमक के प्रकार, संगीत किसे कहते हैं, आलाप की परिभाषा

भारतीय संगीत से, सम्पूर्ण भारतवर्ष की गायन वादन कला का बोध होता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की 2 प्रणालियाँ हैं। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति अथवा कर्नाटक संगीत प्रणाली और दूसरी हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली, जो कि समुचे उत्तर भारतवर्ष मे प्रचलित है। दक्षिण भारतीय संगीत कलात्मक खूबियों से परिपूर्ण है। और उसमें जनता जनार्दन को आकर्षित करने की और समाज मे संगीत कला की मौलिक विधियों द्वारा कलात्मक संस्कार करने की क्षमता है।

हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली के गायन वादन में, जन साधारण को कला की ओर आकर्षित करते हुए, भावना तथा रस का ऐसा स्त्रोत बहता है कि श्रोतृवर्ग स्वरसागर में डूब जाता है और न केवल मनोरन्जन होता है अपितु आत्मानन्द की अनुभूति भी होती है; जो कि योगीजन अपनी आत्मसमाधि मे लाभ करते हैं।

नाद
आवाज अथवा ध्वनि विशेष को नाद कहते हैं। दो पदार्थों के परस्पर टकराने से नाद या आवाज उत्पन्न होती है। इसके दो भेद हैं - एक, जो नाद क्षणिक हो, लहर शून्य अथवा जड़ हो, तो वह आवाज संगीत के लिये अनुपयोगी तथा स्वर शून्य रहेगी। लेकिन दूसरे प्रकार की आवाज कुछ देर तक वायुमंडल पर अपना मधुर प्रभाव डालती है। वह सस्वर होने के कारण संगीत के लिये उपयोगी है।

नाद के दो प्रकार हैं, अनहद नाद और लौकिक नाद। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जिसने संगीत रूपी दैवी शक्ति को न सुना हो। नदियों की मधुर कलकल ध्वनि, झरनों की झरझर, पक्षियों का कूजन किसने नहीं सुना है। प्रकृति प्रदत्त जो नाद लहरी उत्पन्न होती है, वह अनहद नाद का स्वरूप है जो कि प्रकृति की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जो नाद स्वर लहरी, दो वस्तुओं के परस्पर घर्षण से अथवा टकराने से पैदा होती है उसे लौकिक नाद कहते हैं।

वातावरण पर अपने नाद को बिखेरने के लिये, बाह्य हवा पर कंठ के अँदर से उत्पन्न होने वाली वजनदार हवा जब परस्पर टकराती है, उसी समय कंठ स्थित 'स्वर तंतु' (Vocal Cords) नाद पैदा करते हैं। अत: मानव प्राणी द्वारा निर्मित आवाज लौकिक है।

स्वर
स्वर एक निश्चित ऊँचाई की आवाज़ का नाम है। यह कर्ण मधुर आनंददायी होता है। जिसमें स्थिरता होनी चाहिये, जिसे कुछ देर सुनने पर, मन में आनंद की लहर पैदा होनी चाहिये। यह अनुभूति की वस्तु है। भारतीय संगीत में एक स्वर की उँचाई से ठीक दुगुनी उँचाई के स्वर के बीच 22 संगीतोपयोगि नाद हैं जिन्हें "श्रुति" कहा गया है। इन्हीं दोनो उँचाईयों के बीच निश्चित श्रुतियों पर सात शुद्ध स्वर विद्यमान हैं जिन्हें सा, रे, ग, म, प, ध और नि, से जाना जाता है और जिनके नाम क्रमश: षडज, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद हैं। इसे सप्तक के नाम से जाना जाता है। 
प्रायः गायक अथवा गायिका के आवाज कि रेंज तीन सप्तक तक सीमित होती है। जिसमें गायक के प्राकृतिक सप्तक को मध्य सप्तक कहते है। मध्य सप्तक से कम फ्रिक्वेंसी वाले सप्तक को मंद्र सप्तक एवम उँची फ्रिक्वेंसी वाले सप्तक को तार सप्तक कहते है।

उपरोक्त सात शुद्ध स्वरों में 'सा' और 'प' अचल स्वर हैं पर बाकी 5 स्वर अपनी जगह से हटते हैं, जिनमें रे, ग, ध, नि ये चार स्वर नीचे की तरफ हटते हैं और उन्हे कोमल स्वर कहते हैं। इसी तरह मध्यम ऊपर की तरफ हटता है और उसे तीव्र स्वर कहते हैं। इस तरह एक सप्तक में कोमल, शुद्ध और तीव्र स्वर मिलाकर कुल 12 स्वर होते हैं। 12 स्वरों के नाम इस प्रकार हैं - सा, रे कोमल, रे शुद्ध, ग कोमल, ग शुद्ध, म शुद्ध, म तीव्र, पंचम, ध कोमल, ध शुद्ध, नि कोमल और नि शुद्ध।

वर्ण
वर्ण का अर्थ है मोड। संगीत मे 4 प्रकार के वर्ण होते हैं:

आरोही वर्ण - केवल आरोह मात्र। तात्पर्य यह कि नीची आवाज़ को ऊँचाई की ओर ले जाना। फिर चाहे वह एक स्वर तक ही ऊँची क्यों न हो, आरोही वर्ण है।

अवरोही वर्ण - केवल अवरोह मात्र। ऊँची से नीची आवाज़ ले आना।

स्थाई वर्ण - एक ही जगह पर रुकते हुए कुछ देर तक कायम रहना। जैसे - ममम धध गग रेरे पप आदि।

संचारी वर्ण - ऊपर लिखे हुए तीनो वर्णों का मिला-जुला रूप। जहाँ से मन चाहा वहाँ को आवाज़ कि दिशा बदल दी या एक ही स्थान पर रुक गये।

आरोह-अवरोह
आरोह : (सा से सा') अर्थात मध्य सप्तक के सा से तार सप्तक के सा तक चढाने की क्रिया का नाम है आरोह। 
अवरोह : सा' से सा अर्थात तार सप्तक से मध्य सप्तक के सा तक उतरने का नाम है अवरोह।

राग
स्वरों की ऐसी मधुर तथा आकर्षक ध्वनि जो सुनिश्चित् आरोह-अवरोह, जाति, समय, वर्ण, वादी-संवादी, मुख्य-अंग आदि नियमों से बद्घ हो और जो वायुमंडल पर अपना प्रभाव अंकित करने मे समर्थ हो। वातावरण पर प्रभाव डालने के लिये राग मे गायन, वादन के अविभाज्य 8 अंगों का प्रयोग होना चाहिये।

ये 8 अंग या अष्टांग इस प्रकार हैं: स्वर, गीत, ताल और लय, आलाप, तान, मींड, गमक एवं बोलआलाप और बोलतान। उपर्युक्त 8 अंगों के समुचित प्रयोग के द्वारा ही राग को सजाया जाता है।

जाति
राग स्वरूप अपने विशेष प्रकार के आरोह-अवरोह के क्रम में रहता है। जिस राग में सातों स्वर सा रे ग म प ध नि हों उसे सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति कहते हैं। इसी प्रकार 6 स्वरों के क्रम को षाढव। 5 स्वरों के क्रम को औढव और 4 स्वरों को सुरतर कहते हैं। ध्यान में रखें कि आरोह में जितने स्वर लगेंगे उससे कहीं अधिक या कम से कम आरोह के बराबर स्वर अवरोह में आने चाहिये। आरोह की अपेक्षा अवरोह में कम स्वर भारतीय संगीत में नहीं लिये जाते कारण वह नितान्त अस्वाभाविक बात है। इस प्रकार जातियों के कुल 10 प्रकार बनते हैं -

सम्पूर्ण - सम्पूर्ण

षाढव - सम्पूर्ण

षाढव - षाढव

औढव - सम्पूर्ण

औढव - षाढव

औढव - औढव

सुरतर - सम्पूर्ण

सुरतर - षाढव

सुरतर - औढव

सुरतर - सुरतर

थाट
संस्कृत में थाट का अर्थ है मेल। थाट, यह रागों के वर्गीकरण हेतु तैयार की हुई पद्धति है। पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने १० थाट प्रचिलित किये जिनको कोमल, शुद्ध और तीव्र स्वरों के आधार पर बनाया गया जो निम्न हैं - (१) कल्याण (२) बिलावल (३) खमाज (४) भैरव (५) पूर्वी (६) मारवा (७) काफी (८) आसावरी (९) भैरवी (१०) तोड़ी। उपरोक्त राग पद्धति प्रचलन में होते हुए भी आज बहुत से ऐसे राग हैं जो इन थाटों के खांचों में नहीं बैठते। अतः कुछ विद्वान इन्हें नकारते हुए रागांग पद्धति अर्थात राग वाचक स्वर समूह तथा उसके आरोह अवरोह को ही मान्यता देते हैं।

वादी/संवादी
राग एक माहौल या वातावरण विशेष का नाम है जो रंजक भी है। स्पष्ट रूप से इस वातावरण निर्मिती के केंद्र में वह स्वरावली है जो रागवाचक है इसे रागांग कहते हैं। इस रागांग का केंद्र बिंदु होता है वादी स्वर। इसे राग का जीव या प्राण स्वर भी कहा गया है। राग को राज्य की संज्ञा देकर वादी स्वर को उसका राजा कहा जाता है। स्पष्टतः वादी का प्रयोग अन्य स्वरों की अपेक्षा सर्वाधिक होता है तथा इस पर ठहराव भी अधिक होता है।

यह सर्वविदित है की एक सप्तक में दो भाव पैदा होते हैं - षड्ज-पंचम (सा-प) व षड्ज-मध्यम (सा-म) भाव। इस परिपेक्ष्य में यदि वादी स्वर पूर्वांग में है तो उसका, उस स्वर से संवाद करने वाला, उक्त दोनों भावों में से किसी एक भाव में (किसी निश्चित राग के अनुसार), उत्तरांग में एक स्वर जरूर होगा जो सप्तक के दोनों अंगों (पूर्वांग या उत्तरांग) को संतुलित कर राग की रंजकता में वृद्धि करने में सहायक होगा। इस स्वर को संवादी स्वर कहते हैं। वादी और संवादी स्वर पूर्वांग और उत्तरांग की तुलना पर समान वज़न के होने चाहिए तभी राग स्वरुप शुद्ध शास्त्रीय और रस स्रोत बहाने में समर्थ होगा।

घराना
भारतीय संगीत में संगीत शिक्षा एक कंठ से दूसरे कंठ में ज्यों की त्यों उतारी जाती है। जिसे नायकी ढंग की शिक्षा कहते हैं। और जब एक ही गुरू के अनेक शिष्य हो जाते हैं तो उन्हें घराना या परम्परा कहा जाता है। किराना घराना, ग्वालियर घराना, आगरा घराना, जयपुर घराना इत्यादि घराने भारतीय संगीत में प्रसिद्ध हैं।

आविर्भाव-तिरोभाव
आविर्भाव व तिरोभाव भारतीय संगीत में अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। किसी भी राग के स्वरों को ऐसे क्रम में लगाना, जिससे किसी दूसरे राग की छाया दृष्टिगोचर होने लगे उसे तिरोभाव कहते हैं। परन्तु राग के मार्मिक स्वर पुन: लगाकर राग का आविर्भाव किया जाता है जिससे रागरूप स्पष्ट अपने रूप में आ जाए, आविर्भाव कहलाता है।

आविर्भाव-तिरोभाव बहुत कलापूर्ण है और अनुभवी, राग विज्ञान के दक्ष लोगों द्वारा ही संभव है अन्यथा इसमें राग स्वरूप नष्ट होने की अधिक संभावना रहती है।

मनाक् तथा इषत् स्पर्श
मींड जहाँ से प्रारम्भ होती है उस स्वर का आभास जो कानों के द्वारा सूक्ष्मतर ढंग से सुना जाता है, उस प्रारंभिक आभास वाले स्वर को इषत् स्पर्श कहते हैं।

जिस प्रकार मन में कहीं से भी विचार आते हैं तदनुसार मींड आती हुई दिखाई दे, लेकिन कहाँ से आ रही है वह सिर्फ मन द्वारा ही जान सकते हैं उसे मनाक् स्पर्श कहते हैं।

लाग-डाट
मींड के आरोह को लाग और मींड के अवरोह को डाट कहते हैं। इशत् और मनाक् स्पर्श लाग-डाट के आगे की स्थितियाँ हैं।

श्रुति
भारतीय शास्त्रीय संगीत श्रुतिव्यवस्था पर प्रतिष्ठित है और अनेक राग, जैसे राग बहार आदि, हमें आज के १२ स्वरों के प्रचलित वातावरण से श्रुतियों की ओर खींचते हैं। श्रुति का अर्थ है वह सूक्ष्म नाद लहरी जो कि श्रवणेन्द्रिय (कान) के द्वारा सुनी जा सके। और ऐसी 22 श्रुतियां, सा से सां (मध्य सप्तक के सा से तार सप्तक के सा तक) तक अवस्थित है।

पूर्वांग-उत्तरांग
मध्य सप्तक के आधे भाग यानि षडज, ॠषभ, गंधार व मध्यम स्वरों को पूर्वांग कहते हैं। तथा दूसरे भाग यानि पंचम, धैवत, निषाद व तार-षडज को उत्तरांग कहते हैं।

पुरुष राग
प्राचीन काल के संगीत विश्लेषण के अनुसार छह (6) पुरुष राग और छत्तीस (36) रागिनियाँ या उनकी भार्याएँ हैं। वे 6 राग हैं भैरव, मालकौंस, हिन्डोल, श्रीराग, दीपक और मेघ।

ताल
ताल एक निश्चित मात्राओं मे बंधा और उसमे उपयोग में आने वाले बोलों के निश्चित् वज़न को कहते हैं। मात्रा (beat) किसी भी ताल के न्यूनतम अवयव को कहते हैं। हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में विभिन्न तालों का प्रयोग किया जाता है। जैसे, एकताल, त्रिताल (तीनताल), झपताल, केहरवा, दादरा, झूमरा, तिलवाड़ा, दीपचंदी, चांचर, चौताल, आडा-चौताल, रूपक, चंद्रक्रीड़ा, सवारी, पंजाबी, धुमाली, धमार इत्यादि।

हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में प्रचलित गायन के प्रकार
हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में निम्न गायन के प्रकार प्रचलित हैं - ध्रुवपद, लक्षण गीत, टप्पा, सरगम, कव्वाली, धमार, ठुमरी, तराना, भजन, गीत, खयाल, होरी, चतुरंग, गज़ल, लोक-गीत, नाट्य संगीत, सुगम संगीत, खटके और मुरकियाँ ।

ध्रुवपद - गंभीर सार्थ शब्दावली, गांभीर्य से ओतप्रोत स्वर संयोजन द्वारा जो प्रबन्ध गाये जाते हैं वे ही हैं ध्रुवपद। गंभीर नाद से लय के चमत्कार सहित जो तान शून्य गीत हैं वह है ध्रुवपद। इसमें प्रयुक्त­ होने वाले ताल हैं - ब्रम्हताल, मत्तताल, गजझंपा, चौताल, शूलफाक आदि। इसे गाते समय दुगनी चौगनी आड़ी कुआड़ी बियाड़ी लय का काम करना होता है।

लक्षण गीत - राग स्वरूप को व्य­क्त करने वाली कविता जो छोटे ख्याल के रूप में बंधी रहती है लक्षण गीत कहलाती है।

टप्पा - टप्पा का अर्थ है निश्चित स्थान पर पहुंचना या ठहरी हुई मंजिल तय करना। गुजरात, काठियावाड से पंजाब, काबुल, बलोचिस्तान के व्यापारी जब पूर्व परम्परा के अनुसार ऊंटों के काफिलों पर से राजपुताना की मरुभूमि में से यात्रा करते हुए ठहरी हुई मंजिलों तक पहुंचकर पड़ाव डाला करते थे, उस समय पंजाब की प्रेमगाथाओं के लोकगीत, हीर-राँझा, सोहिनी-महिवाल आदि से भरी हुई भावना से गाये जाते थे। उनका संकलन हुसैन शर्की के द्वारा हुआ। शोरी मियां ने इन्हें विशेष रागों में रचा। यही पंजाबी भाषा की रचनाएँ टप्पा कहलाती हैं। टप्पा, भारतीय संगीत के मुरकी, तान, आलाप, मीड के अंगों कि सहायता से गाया जाता है। पंजाबी ताल इसमें प्रयुक्त होता है। टप्पा गायन के लिये विशेष प्रकार का तरल, मधुर, खुला हुआ कन्ठ आवश्यक है, जिसमें गले की तैयारी विशेषता रखती है।

सरगम - स्वरों की ऐसी मधुर मालिका जो कर्णमधुर एवं आकर्षक हो और राग रूप को स्पष्ट कर दे वही सरगम है। इसे आलाप के बजाय स्वरों का उच्चार करते हुये गाया जाता है।

कव्वाली - कव्वाली नामक ताल में जो प्रबंध गाया जाता है वह है कव्वाली। विशेषकर मुस्लिम भजन प्रणाली जिन्हें खम्सा और नात् कव्वाली कहते हैं।

धमार - धमार नामक ताल में होरी के प्रसंग के गीत जो कि ध्रुवपद शैली पर गाये जाते हैं, धमार कहलाते हैं।

ठुमरी - राधाकृष्ण के या प्रेम की भावना से परिपूर्ण श्रंगारिक गीत जिसका अर्थ मिलन अथवा विरह की भावना में लिपटा रहता है, खटकेदार स्वरसंगतियों और भावानुकूल बोल आलापों एवं बोलॅतानों से सजाते हुए अर्थ सुस्पष्ट करके गाया जाता है उसे ठुमरी कहते हैं। लखनऊ, बनारस तथा पंजाब शैली की ठुमरियां अपनी अपनी विशेषता से परिपूर्ण होती हैं। इसमे प्रयक्त होने वाले ताल हैं पंजाबी, चांचर, दीपचंदी, कहरवा और दादरा आदि।

तराना - वीणा वादन के आघात प्रत्याघातों को निरर्थक दमदार बोलों द्वारा व्यक्त करते हुए वाद्य संगीत कि चमाचम सुरावट कंठ द्वारा निकालना और लय के बांटों का रसभंग न होते हुए सफल प्रदर्शन तराना गायन की अविभाज्य विशेषता है। तेज लय में ना ना ना दिर दिरर्रर्र आदि कहने का नाम तराना नही है। वीणावादन का सफल प्रदर्शन कंठ द्वारा होना चाहिये, वही तराना है।

भजन - सूरदास, मीरा, तुलसी, युगलप्रिया, प्रताप बाला, जाम सुत्ता, कबीर आदि संतों द्वारा रचे हुए ईश्वर के गुणानुवाद तथा लीलाओं के वर्णन के प्रबन्ध जिन्हे गायन करके आत्मानन्द व आत्मतुष्टि अनुभूत की जाती है उसे भजन कहते हैं। इनके ताल हैं कहरवा, धुमाली, दादरा आदि।

गीत - आधुनिक कवियों द्वारा रचे हुए भावगीत जो शब्द अर्थ प्रधान रहते हैं लोकॅसंगीत के आधार पर अर्थानुकूल गाये जाते हैं इन्हें ही गीत कहते हैं।

खयाल अथवा ख्याल - ख्याल फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है कल्पना। ख्याल के २ भेद हैं। पहिला है बड़ा ख्याल और दूसरा छोटा ख्याल। बड़ा ख्याल, विलम्बित लय में ध्रुवपद की गंभीरता के साथ गाया जाता है और कल्पना के आधार पर विस्तारित किया जाता है। इसे गाते समय आठों अंगों का व्यवहार समुचित किया जाता है। बड़े ख्याल में प्रयुक्त होने वाले ताल हैं एकताल, तिलवाड़ा, झूमरा, रूपक, झपताल, आड़ा-चौताल, आदिताल आदि।

छोटा ख्याल चंचल सरस चमत्कार प्रधान और लय के आकर्षण से परिपूर्ण होता है इसे गाते समय भी आठों अंगों का प्रयोग किया जाता है। त्रिताल, एकताल, झपताल, रूपक और आड़ा-चौताल आदि द्रुतलय में बजाये जाते हैं जो कि छोटे ख्याल में प्रयुक्त होते हैं।

होरी - होली के प्रसंग की कविता या गीत जो ठुमरी के आधार पर गाया जाता है, होरी कहलाता है।

चतुरंग अथवा चतरंग - चतरंग गीत का ऐसा प्रकार है जिसमें चार प्रकार के प्रबंध दर्शन एक साथ होते हैं, ख्याल, तराना, सरगम और तबला या पखावज की छोटी सी परन, इनका समावेश होता है चतरंग में।

ग़ज़ल - उर्दू भाषा की शायरी या कविता गायन को ग़ज़ल गायन कहते हैं। यह शब्द प्रधान, अर्थ दर्शक, गीत प्रकार है जो कि विशेष प्रकार के खटके, मुरकियों आदि से मंडित किया जाता है। इसमें कहरवा, धुमाली, दादरा आदि तालों का प्रयोग किया जाता है।

खटके और मुरकियाँ - सुन्दर मुरकियाँ ही ठुमरी की जान है। मुरकी वह मीठी रसीली स्वर योजनाएँ हैं, जो मधुर भाव से कोमल कंठ द्वारा ली जाती हैं। जबकि खटके की स्वर योजनाएँ भरे हुए कंठ द्वारा निकाली जाती हैं। यही मुरकी और खटके में भेद है।

लोक-गीत - यह संगीत दूर दराज के गावों में गाया जाता है, और इसके अनेक रूप विविध भाषाओं में देखने को मिलते हैं। चैती, कजरी आदि लोकगीत के रूप हैं।

नाट्य संगीत - नाटकों में गाया जाने वाला संगीत नाट्य संगीत कहलाता है।

सुगम संगीत - शास्त्रीय संगीत से सुगम अथवा सरल संगीत, सुगम संगीत कहलाता है। इसमें गाई जाने वाली विधाएँ हैं गीत, गजल, भजन, कव्वाली, लोक-गीत इत्यादि।

गायकी के 8 अंग (अष्टांग गायकी)
वातावरण पर प्रभाव डालने के लिये राग मे गायन, वादन के अविभाज्य 8 अंगों का प्रयोग होना चाहिये। ये 8 अंग या अष्टांग इस प्रकार हैं - स्वर, गीत, ताल और लय, आलाप, तान, मींड, गमक एवं बोलआलाप और बोलतान। उपर्युक्त 8 अंगों के समुचित प्रयोग के द्वारा ही राग को सजाया जाता है।

स्वर - स्वर एक निश्चित ऊँचाई की आवाज़ का नाम है। यह कर्ण मधुर आनंददायी होती है। जिसमें स्थिरता होनी चाहिये, जिसे कुछ देर सुनने पर मन में आनंद की लहर पैदा होनी चाहिये। यह अनुभूति की वस्तु है। सा, रे, ग, म, प, ध और नि जिन्हें क्रमश: षडज, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद के नाम से ग्रंथों में वर्णित किया गया है। 12 स्वरों के नाम इस प्रकार हैं - सा, रे कोमल, रे शुद्ध, ग कोमल, ग शुद्ध, म शुद्ध, म तीव्र, पंचम, ध कोमल, ध शुद्ध, नि कोमल और नि शुद्ध।

गीत, बंदिश - बंदिश, परम आकर्षक सरस स्वर में डूबी हुई, भावना प्रधान एवं अर्थ को सुस्पष्ट करने वाली होनी चाहिये। गायक के कंठ द्वारा अपने सत्य रूप में अभिव्यक्त होने चाहिये गीत।

ताल - ताल एक निश्चित मात्राओं मे बंधा और उसमे उपयोग में आने वाले बोलों के निश्चित् वज़न को कहते हैं। मात्रा (beat) किसी भी ताल के न्यूनतम अवयव को कहते हैं। हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में विभिन्न तालों का प्रयोग किया जाता है। जैसे, एकताल, त्रिताल (तीनताल), झपताल, केहरवा, दादरा, झूमरा, तिलवाड़ा, दीपचंदी, चांचर, चौताल, आडा-चौताल, रूपक, चंद्रक्रीड़ा, सवारी, पंजाबी, धुमाली, धमार इत्यादि।

आलाप अथवा बेहेलावे - आकार में स्वर की ताकत और आवश्यक भाव धारा बहाने के लिये, धीमी गति से, ह्रदयवेधी ढंग से, जो राग स्वरों के छोटे-छोटे स्वर समूह, रुकते हुए लिये जाते हैं वे ही आलाप हैं। मींड प्रधान सरस स्वर योजना ही आलाप का आधार है।

तान - राग के स्वरों को तरंग या लहर के समान, न रुकते हुए, न ठिठकते हुए सरस लयपूर्ण स्वर योजनाएं तरंगित की जाती हैं वे हैं तानें। मोती के दाने के समान एक-एक स्वर का दाना सुस्पष्ट और आकर्षक होना चाहिये, तभी तान का अंग सही माना जाता है।

मींड - मींड का अर्थ होता है घर्षण, घसीट। किसी भी स्वर से आवाज़ को न तोडते हुए दूसरे स्वर तक घसीटते हुए ले जाने कि क्रिया को मींड कहते हैं। सुलझे हुए मस्तिष्क और स्वर संस्कारित कंठ की चरम अवस्था होने पर ही मींड कंठ द्वारा तय होती है।

गमक - मींड के स्वरों के साथ आवश्यक स्वर को उसके पिछले स्वर से धक्का देना पड़ता है ऐसी क्रिया को गमक कहते हैं।

बोल-आलाप बोल-तान - आलाप तानों में लय के प्रकारों के साथ रसभंग न होते हुए भावानुकूल अर्थानुकूल गीत की शब्दावली कहना ही बोल-आलाप बोल-तान की अपनी विशेषता है।

लय
लय किन्ही दो मात्राओं के बीच कि समयावधि को कहते हैं। लय ३ प्रकार की होती हैं - विलंबित-लय, मध्य-लय एवं द्रुत-लय। ताल के निश्चित् समयचक्र में सुनिश्चित् गति अर्थात् लय से किन्चित् भी न चूकते हुए सम पर अचूक आना, ताल और लय की कसौटी है।

मात्रा
समय का माना हुआ टुकडा या भाग, यह ही ताल की नाड़ी है। सतत् मनन, चिंतन द्वारा इसकी लम्बाई एक सी रखने का प्रयत्न होना चाहिये। क्योंकि, किसी भी ताल की मात्राएँ बराबर होती हैं। अत: इन मात्राओं को एक सा रखना ही ताल, लय में पूर्णता प्राप्त करना है। लय यदि ठीक होगी तो ताल बराबर आयेगा ही। और ताल के शुद्घ होने पर सम, सम पर आयेगी। इस प्रकार इनका एक दूसरे से घनिष्ठ संबंध है।

ताली या ताल
ताल का अर्थ है ताली देना। दूसरे अर्थ में ताल निश्चित समय चक्र का नाम है। जैसे - ताल तीनताल या त्रिताल में ताल 3 हैं इसका अर्थ यह है कि इसके 16 मात्रा के समय चक्र में 3 स्थानों पर ताली देते हैं। 1ली, 5वी तथा 13वीं मात्रा पर ताली दी जाती है। जबकि 9वी मात्रा पर खाली अथवा काल होता है। खाली के बाद जो ताली आती है वह 1ली, 2री, 3री इस प्रकार इसका क्रम रहता है।

काल या खाली
काल का मतलब है खाली या शून्य। काल का शाब्दिक अर्थ है मृत्यु समय। मृत्यु होने पर जैसे मनुष्य संसार को खाली कर देता है उसी भाँति काल है। काल प्राय: ताल चक्र के मध्य में रहता है। कुछ अपवाद छोड़कर जैसे रूपक ताल में खाली 1ली मात्रा पर होती है। खाली के बाद जो ताली आती है वह 1ली, 2री, 3री इस प्रकार इसका क्रम रहता है।

सम
सम ताल के आरंभ को कहते हैं। सम सदैव किसी भी ताल की १ली मात्रा पर आती है। और इसके आने पर गायन-वादन में स्वाभाविक जोर व आकर्षण पैदा हो जाता है। सम यदि अपने स्थान पर नहीं आई तो सारा मजा फीका हो जाता है। और साधारण श्रोताओं की समझ में आ जाता है कि कहीं कुछ बिगड़ गया है।

वाद्ययन्त्रों (साजों) के प्रकार
भारतीय संगीत में प्रयुक्त होने वाले वाद्ययन्त्रों (साजों) में अष्टांगों में से सात अंगों को व्यक्त करने की क्षमता होनी चाहिये। सुरीले साजों में गमक, मींड, तान के खटके, यथास्थान स्वर, आलाप आदि अंग पूर्ण रूप में अभिव्यक्त होना चाहिये। भारतीय संगीत में 5 प्रकार के वाद्य प्रचलित हैं - तत् वाद्य, तंतु वाद्य, सुषिर वाद्य, अवनद्घ वाद्य, घन वाद्य।

तत् वाद्य - तत् वाद्य वे हैं जो कि नखी, मिजराब या अन्य किसी अंगूठी द्वारा अथवा अंगुली के आघात प्रत्याघातों द्वारा बजाये जाते हैं। जिसमें तानपूरा, विचित्र वीणा, वीणा, सरोद, गिटार, सितार, सुरबहार, रबाब आदि वाद्य आते हैं। इन साजों में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि आघात होने पर स्वर अत्यन्त अल्पकालिक रहता है। और बजाने वाले कलाकारों का रियाज और तालीम ही उसमें सौंदर्य वर्धन करती है। साथ ही इनका स्वर अत्यन्त कर्णप्रिय व हृदयग्राही होता है।

तंतु वाद्य - तंतु वाद्य अर्थात तांत, गट लगे हुए वाद्य जो कि गज् (bow) की सहायता से बजाये जाते हैं। इनका नाद, गज की लम्बाई के हिसाब से दीर्घकाल तक कायम रहता है। जैसे सारंगी, दिलरुबा, बेला (violin), तार शहनाई आदि साज़ों पर गायन के आधार की बन्दिशें बजाई जाती हैं। इन वाद्यों की संगत से, गायन की सरसता, चरमकोटि की सुन्दर बन जाती है।

सुषिर वाद्य - तीसरे प्रकार के वाद्य हैं सुषिर वाद्य जो कि हवा के दबाव के कारण बजते हैं। जैसे बांसुरी, अलगोजा, शहनाई, क्लेरियोनेट, पिकलो, हार्मोनियम आदि।

अवनद्घ वाद्य - चौथे प्रकार के वाद्य हैं अवनद्घ वाद्य जो कि चमड़े से मढ़े रहते हैं और विशेषत: यह ताल के वाद्य होते हैं। संगत के वाद्यों में पखावज, तबला, ढोलक आदि वाद्य, ताल की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं।

घन वाद्य - पाँचवें प्रकार के वाद्य हैं घन वाद्य जो कि धातुओं द्वारा बने रहते हैं। जिन्हें हम जलतरंग, झांझ, तासा, मंजीरा, घुंघरू, घंटा आदि के नाम से भलि-भांति पहिचानते हैं।

 

 

 

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राग परिचय

राग परिचय
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सात स्वर, अलंकार सा, रे, ग, म, प ध, नि 8,719 14
नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज। 967 8
स्वर मालिका तथा लिपि 1,112 7
संगीत संबंधी कुछ परिभाषा 2,420 6
थाट,थाट के लक्षण,थाटों की संख्या 2,777 5
रागांग वर्गीकरण पद्धति एवं प्रमुख रागांग 2,931 5
रागों मे जातियां 2,333 5
राग दरबारी कान्हड़ा 1,613 5
रागांग राग वर्गीकरण से अभिप्राय 504 4
आविर्भाव-तिरोभाव 1,656 4
राग 'भैरव':रूह को जगाता भोर का राग 1,267 4
राग यमन (कल्याण) 1,824 4
रागों का विभाजन 407 4
राग,पकड़,वर्ज्य स्वर,जाति,वादी स्वर,संवादी स्वर,अनुवादी स्वर,विवादी स्वर,आलाप,तान 756 3
सात स्वरों को ‘सप्तक’ कहा गया है 1,657 3
राग मारू बिहाग का संक्षिप्त परिचय- 2,623 3
रागों के प्रकार 3,223 3
राग भूपाली 2,036 3
सप्तक क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समूह को कहते हैं। 558 3
सुर-ताल के साथ गणित को समझना आसान 1,536 3
राग रागिनी पद्धति 2,150 3
स्वर (संगीत) 1,116 2
स्वर मालिका तथा लिपि 1,721 2
वादी - संवादी 1,609 2
रागो पर आधारित फ़िल्मी गीत 1,774 2
ठुमरी : इसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है 1,009 2
राग बहार 1,087 2
स्वन या ध्वनि भाषा की मूलभूत इकाई हैक्या है ? 854 1
टप्पा गायन : एक परिचय 338 1
‘राग’ शब्द संस्कृत की धातु 'रंज' से बना है 178 1
राग मुलतानी 627 1
सुर की समझ गायकी के लिए बहुत जरूरी है. 1,448 1
षड्जग्राम-तान बोधिनी 228 1
शुद्ध स्वर 1,664 1
राग- गौड़ सारंग 412 0
कुछ रागों की प्रकृति इस प्रकार उल्लेखित है- 747 0
राग ललित! 1,372 0
शास्त्रीय संगीत में समय का महत्व 2,322 0
मध्यमग्राम-तान-बोधिनी 227 0
भारतीय शास्त्रीय संगीत
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अलंकार- भारतीय शास्त्रीय संगीत 3,346 9
भारतीय परम्पराओं का पश्चिम में असर 1,570 6
हारमोनियम के गुण और दोष 3,312 5
संस्कृत में थाट का अर्थ है मेल 400 4
संगीत का विकास और प्रसार 1,353 3
षडजांतर | शास्त्रीय संगीत के जाति लक्षण क्यां है 849 3
संगीत से सम्बन्धित 'स्वर' के बारे में है 1,128 3
जानिए भारतीय संगीत के बारे में 1,370 3
गायकी के 8 अंग (अष्टांग गायकी) 575 2
ध्वनि विशेष को नाद कहते हैं 728 2
भारतीय संगीत 601 2
राग भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं। 418 2
स्वरों का महत्त्व क्या है? 577 2
तानपुरे अथवा सितार के खिचे हुये तार को आघात करने से तार कम्पन करता है 795 1
भारतीय शास्त्रीय संगीत की जानकारी 1,853 1
भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है भारतीय शास्त्रीय संगीत। 318 1
हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति रागों पर आधारित है 940 1
नाट्य-शास्त्र संगीत कला का प्राचीन विस्तरित ग्रंथ है 814 1
हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में प्रचलित गायन के प्रकार 1,149 1
संगीत शास्त्र परिचय 2,943 1
भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है 962 1
'राग' शब्द संस्कृत की 'रंज्' धातु से बना है 805 1
ख्याल गायकी के घरानेएक दृष्टि : भाग्यश्री सहस्रबुद्धे 1,623 0
रागों की उत्पत्ति ‘थाट’ से होती है। 627 0
नाद-साधन भी मोक्ष प्राप्ति का ऐक मार्ग है। 444 0
निबद्ध- अनिबद्ध गान: व्याख्या, स्वरूप, भेद 1,359 0
रागों का सृजन 610 0
निबद्ध- अनिबद्ध गान: 464 0
संगीत और हमारा जीवन
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रियाज़ कैसे करें 10 तरीके 1,756 9
गले में सूजन, पीड़ा, खुश्की 710 6
गायक बनने के उपाय और कैसे करें रियाज़ 1,713 6
गाने का रियाज़ करते समय साँस लेने के सही तरीका 1,585 6
संगीत का वैज्ञानिक प्रभाव 729 5
संगीत का प्राणि वर्ग पर असाधारण प्रभाव 975 5
गायकी और गले का रख-रखाव 773 4
नवजात शिशुओं पर संगीत का प्रभाव 941 4
संगीत के लिए हमारे जीवन में एक प्राकृतिक जगह है 736 3
नई स्वरयंत्र की सूजन(मानव गला) 618 3
रागों में छुपा है स्वास्थ्य का राज 753 3
भारतीय संगीत के सुरों द्वारा बीमारियो का इलाज 724 3
शास्त्रीय संगीत और योग 831 3
गुरु की परिभाषा 2,725 3
कैसे रखें आवाज के जादू को बरकरार 1,254 3
खर्ज और ओंकार का अभ्यास क्या है ? 936 2
भारतीय परम्पराओं का पश्चिम में असर 342 2
कंठध्वनि 548 2
माइक्रोफोन की हानि : 405 2
माइक्रोफोन के प्रकार : 894 2
संगीत सुनें और पाएं इन सात समस्याओं से छुटकारा 671 2
भारतीय संगीत में आध्यात्मिकता स्रोत 973 2
वैदिक विज्ञान ने भारतीय शास्त्रीय संगीत'रागों' में चिकित्सा प्रभाव होने का दावा किया है। 765 2
अबुल फजल ने 22 नाड़ियों में सात स्वरों की व्याप्ति बताई जो इस प्रकार 299 2
पैर छूने के पीछे का वैज्ञानिक रहस्य 1,052 2
कैसे जानें की आप अच्छा गाना गा सकते हैं 705 2
संगीत द्वारा रोग-चिकित्सा 1,421 2
क्या प्रभाव पड़ता है संगीत का किशोरों पर? 75 2
चमत्कार या लुप्त होती संवेदना एक लेख 908 2
टांसिल होने पर 529 1
क्या आप भी बनना चाहेंगे टीवी एंकर 659 1
गुनगुनाइए गीत, याददाश्त रहेगी दुरुस्त 617 1
नई स्वरयंत्र की सूजन 623 1
Sounds magic ध्वनियों का इंद्रजाल 637 1
भारतीय कलाएँ 576 1
संगीत सुनने से दिमाग पर होता है ऐसा असर 91 1
अल्कोहल ड्रिंक्स - ये दोनों आपके गले के पक्के (पक्के मतलब वाकई पक्के) दुश्मन हैं 139 0
माता-पिता अपने किशोर बच्चों को गानो के गलत प्रभाव से कैसे बचा सकते हैं? 83 0
संगीत कितने प्रकार का होता है और उसका किशोरों के दिमाग पर क्या असर पड़ता है? 114 0
गायक कलाकारों और बच्चों के लिए विशेष 643 0
हमारे पूज्यनीय गुरु
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तानसेन या मियां तानसेन या रामतनु पाण्डेय 732 5
बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और फिल्म संगीत 298 3
पण्डित अजॉय चक्रबर्ती 43 3
उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ां 735 2
अकबर और तानसेन 755 2
ठुमरी गायिका गिरिजा देवी हासिल कर चुकी हैं कई पुरस्कार और सम्मान 263 1
जब बेगम अख्तर ने कहा, 'बिस्मिल्लाह करो अमजद' 709 1
रचन: श्री वल्लभाचार्य 931 1
अमवा महुअवा के झूमे डरिया 204 0
बड़े गुलाम अली खान: जिन्होंने गाने के लिए रफी और लता से 50 गुना फीस ली 52 0
ओंकारनाथ ठाकुर (1897–1967) भारत के शिक्षाशास्त्री, 648 0
फकीर हरिदास और तानसेन के संगीत में क्या अंतर है? 74 0
बैजू बावरा 729 0
शास्त्रीय नृत्य
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नाट्य शास्त्रानुसार नृतः, नृत्य, और नाट्य में तीन पक्ष हैं – 670 5
आगरा का भी है अपना शास्त्रीय घराना 27 4
लोक कला की ध्वजवाहिका 46 3
भारतीय शास्त्रीय संगीत का आधार: 34 2
क्या अलग था गिरिजा देवी की गायकी में 46 2
राग क्या हैं 98 2
वेद में एक शब्द है समानिवोआकुति 23 2
रागदारी: शास्त्रीय संगीत में घरानों का मतलब 31 2
लता मंगेशकर का नाम : भारतीय संगीत की आत्मा 91 2
शास्त्रीय संगीत क्या है 46 1
ठुमरी का नवनिर्माण 51 1
राग भीमपलास और भीमपलास पर आधारित गीत 227 1
माइक्रोफोन का कार्य 465 1
पंडित भीमसेन गुरुराज जोशी 51 1
काशी की गिरिजा 43 1
भारतीय नृत्य कला 1,363 1
लोक और शास्त्र के अन्तरालाप की देवी 41 0
भरत नाट्यम - तमिलनाडु 364 0
कर्नाटक संगीत 58 0
कर्नाटक गायन शैली के प्रमुख रूप 34 0
बेहद लोकप्रिय है शास्त्रीय गायकी का किराना घराना 48 0
मेवाती घराने की पहचान हैं पंडित जसराज 44 0
जयपुर- अतरौली घराने की देन हैं एक से बढ़कर एक कलाकार 38 0
वीडियो
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द ब्यूटी ऑफ राग बिलासखानी तोड़ी 380 3
नुसरत फतेह के द्वारा राग कलावती 445 2
राग यमन 454 2
वंदेमातरम् 286 1
ब्रेथलेसऔर अरुनिकिरानी 308 1
कौन दिसा में लेके चला रे बटुहिया 90 1
राग बागेश्री | पंडित जसराज जी 722 0
मोरा सइयां 318 0
राग भीमपलासी पर आधारित गीत 1,527 0
कर्ण स्वर 388 0
हिंदुस्तानी संगीत के घराने
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गुरु-शिष्य परम्परा 1,107 2
संगीत घराने और उनकी विशेषताएं 4,171 2
कैराना का किराना घराने से नाता 381 2
भारत में संगीत शिक्षण 1,394 1
रामपुर सहसवां घराना भी है गायकी का मशहूर घराना 48 0
स्वर परिचय
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संगीत के स्वर 864 2
स्वर षड्ज का शास्त्रीय परिचय 306 2
स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय 231 2
संगीत रत्नाकर के अनुसार स्वरों के कुल, जाति 440 2
स्वर धैवत का शास्त्रीय परिचय 252 1
स्वर ऋषभ का शास्त्रीय परिचय 269 0
स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय 261 0
स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय 225 0
स्वर निषाद का शास्त्रीय परिचय 210 0
स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां 268 0
सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर 242 0
सिलेबस
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सिलेबस : प्रारंभिक महागुजरात गन्धर्व संगीत समिति 441 2
सिलेबस : उप विशारद महागुजरात गन्धर्व संगीत समिति 343 0
सिलेबस : मध्यमा महागुजरात गन्धर्व संगीत समिति 306 0
सिलेबस : सांगीत विनीत (मध्यमा पूर्व) महागुजरात गन्धर्व संगीत समिति 233 0