स्वर ऋषभ का शास्त्रीय परिचय

स्वर ऋषभ का शास्त्रीय परिचय

जैसा कि षड्ज स्वर के संदर्भ में उल्लेख किया जा चुका है, सूर्य की अथवा गुणों की अनुदित/अविकसित स्थिति षड्ज हो सकती है जबकि उदित/विकसित स्थिति ऋषभ हो सकती है। यदि प्राण षड्ज है तो वाक् ऋषभ हो सकती है। यदि मन षड्ज है तो वाक् ऋषभ हो सकती है(छान्दोग्य उपनिषद)। साम की भक्तियों में प्रस्ताव भक्ति ऋषभ के तुल्य कही जा सकती है। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि पशु तो हिंकार स्थिति है जबकि मनुष्य प्रस्ताव, क्योंकि मनुष्य ही परमेश्वर की स्तुति कर सकता है। इस कथन को इस प्रकार समझा जा सकता है कि किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अज्ञानपूर्वक जो संकल्प किया जाता है, वह तो षड्ज है और तत्पश्चात् उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो परमेश्वर से प्रार्थना की जाती है, अभीप्सा की जाती है, वह ऋषभ है। इस कथन का दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि पशु चतुष्पाद होता है, जबकि मनुष्य द्विपाद। चतुष्पाद से अर्थ चारों दिशाओं में गति करने वाला, तिर्यक दिशा में प्रगति करने वाला लिया जा सकता है जबकि द्विपाद का अर्थ ऊर्ध्व – अधो दिशाओं में प्रगति करने वाला हो सकता है।

     ऋषभ स्वर के विषय में  सूचनाएं पुराणों में उपलब्ध ऋषभ की कथाओं से मिल सकती हैं। स्कन्द पुराण ३.३.१० में एक  कथा है जिसमें एक वेश्या व उसका पति ऋषभ योगी की सेवा करने से अगले जन्म में रानी व राजा बनते हैं। विषपान के कारण रानी व उसका पुत्र कुष्ठ रोग से ग्रसित हो जाते हैं। कालान्तर में राजा द्वारा कुष्ठग्रस्त रानी व उसके पुत्र को निर्वासित कर दिया जाता है। ऋषभ योगी की कृपा से रानी का मृत पुत्र जीवित हो जाता है। ऋषभ योगी द्वारा प्रदत्त भस्म से रानी और उसके पुत्र का कुष्ठ ठीक हो जाता है और वह पुत्र ऋषभ योगी द्वारा प्रदत्त शंख व खड्ग अस्त्रों से अपने खोए हुए राज्य की शत्रुओं से पुनः प्राप्ति करता है। इस कथा में कुष्ठ रोग से तात्पर्य, डा. फतहसिंह के शब्दों में, अथर्ववेद के सूक्त के अनुसार, कहीं दूर स्थित, छिपी हुई ज्योति से है। वेश्या से तात्पर्य हमारी वृत्तियां हो सकता हैं जो ऋषभ योगी की सेवा करने से अन्तर्मुखी हो सकती हैं। ऋषभ योगी की दूसरी कथा भागवत पुराण के पांचवें स्कन्ध में मिलती है जिसमें ऋषभ के ज्येष्ठ पुत्र भरत को भारतवर्ष का राज्य मिलता है तथा ऋषभ योगी अवधूत वृत्ति ग्रहण कर लेते हैं। भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कन्ध में ऋषभ के अन्य ९ महायोगी पुत्रों कवि, हरि आदि का वर्णन है। वायु पुराण ६५.१०२ के अनुसार ऋषभ सुधन्वा के पुत्र हैं, रथकार हैं और उनकी व्याप्ति देव व ऋषि दोनों में है। वैदिक साहित्य में ऐसी स्थिति ऋभुओं की कही जाती है। यह स्पष्ट नहीं है कि ऋषभ का ऋभुओं से यह तादात्म्य वास्तविक है या भ्रामक।

ऋषभः

*नाभेस्समुत्थितो वायुः कण्ठशीर्षसमाहतः। ऋषभं नदते यस्मादृषभो हि प्रकीर्तितः।।- जगदेकः

*नाभिमूलाद्यदा वर्ण उद्गतः कुरुते ध्वनिम्। ऋषभस्येव निर्याति हेलया ऋषभस्वरः।। - पुरुषोत्तमः

*उद्गीथायास्समुत्पन्नो ऋषभो रञ्जितस्वरः। शुकपिञ्जरवर्णोऽयं ऋषभो वह्निदैवतः।।

ब्रह्मणा कथितः पूर्वं। वीररौद्राद्भुतेषु प्रवृत्तः। शिरसः उत्थितः। सनन्दो ऋषिः। प्रतिष्ठाच्छन्दः। सरस्वत्यधिदेवता। कुलीरे विश्रामान्तः। - जगदेकः?

( कुलीरः -- कर्कटः)।

*ऋषभस्त्रिश्रुतिस्तालुमूले तस्यापि संभवात्। मज्जाधात्वग्निजो नाद ऋषभस्त्रिश्रुतिः स्मृतः।। - जगदेकः

ऋषभस्य शाकद्वीपः। ऋषभ स्वर के विषय में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह स्वर मज्जा धातु में उत्पन्न होता है और वहां से इसका प्रभाव हृदय में आकर रक्त में मिलता है। राग देस आदि जितने स्वरों में ऋषभ स्वर वादी है, एक सोरठ राग को छोडकर अन्य सभी रागों में उसका संवादी स्वर पंचम है। यह संकेत देता है कि मज्जा धातु के अन्दर उत्पन्न हुए प्रभाव से सारे व्यक्तित्व को ओतप्रोत करना है।

कथासरित्सागर में ऋषभ पर्वत पर सूर्यप्रभ, नरवाहनदत्त आदि के चक्रवर्ती पद पर अभिषेक के उल्लेख आते हैं। अभिषेक को इस प्रकार समझा जा सकता है जैसे शिव मूर्ति पर कलश के जल से लगातार अभिषेक होता रहता है। इसी प्रकार मनुष्य के सिर में किसी प्रकार के शीतल जल से अभिषेक संभव है।

कुलीर/कर्कट राशि में ऋषभ स्वर के विश्राम के संदर्भ में, कर्क राशि कृक – केका, प्रतिध्वनि से सम्बन्धित है। कर्क राशि को अंग्रेजी भाषा में कैंसर कहते हैं और कैंसर रोग भी है। कैंसर रोग तब उत्पन्न होता है जब नई कोशिकाएं पुरानी कोशिकाओं का स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाती, उनके स्वरूप में अन्तर आ जाता है। कर्क राशि का अभिप्राय यही है कि कोशिकाएं पुरानी कोशिकाओं का प्रतिरूप हों। इससे निष्कर्ष निकलता है कि ऋषभ स्वर किसी प्रकार से कैंसर के निदान में उपयोगी हो सकता है।

*तिस्रो धमन्यो वर्धन्यो मज्जाया नाभिमाश्रिताः। तस्माद्धात्वाश्रितत्वेन ऋषभस्त्रिश्रुतिर्भवेत्।। - जगदेकः

*ऋषभः स्वरहस्तः – मृगमौलिश्चापविद्धो ऋषभस्वर ईरितः। - शृङ्गा

*ऋषभस्वरमन्त्रः – दक्षिणो हृदयाय नमः। वार्तिक शिरसे स्वाहा। चित्रशिखायै वषट्। चित्रः कवचाय हुम्। चित्रतरः नेत्रत्रयाय वौषट्। चित्रतमः अस्त्राय फट्। सनन्दन ऋषिः प्रतिष्ठाच्छन्दः सरस्वती देवता। ऐं क्लीं सौं रिं नमः। - जगदेकः

शिर में ऋषभ स्वर की स्थिति वार्तिक रूप में कही गई है। वार्तिक शब्द का प्रयोग किसी मन्त्र की व्याख्या करने के लिए होता है। हो सकता है कि वार्तिक का शुद्ध रूप वर्तन, बारम्बारता हो। वर्तन के लिए अपेक्षित है कि यह वर्तन प्रतिदिन एक जैसा हो, इसमें जडता न आए। यह वर्तन उपरिलिखित कर्क राशि का प्रतीक भी हो सकता है। इससे आगे मन्त्र में ऋषभ स्वर की चित्र, चित्रतर व चित्रतम स्थितियों का उल्लेख है। चित्र स्थिति किसी शुद्ध गुण के पृथिवी पर अवतरित होने पर विकृत अवस्था को प्राप्त होने की स्थिति है।

ऋषभ स्वर के मन्त्र में हृदय में ऋषभ को दक्षिणा कहा गया है। यह कथन महत्त्वपूर्ण है और व्यवहार में जहां-जहां भी दक्षिणा/दक्षता प्राप्ति की आवश्यकता पडे, वहां ऋषभ स्वर का विनियोग किया जाना चाहिए। दक्षता को इस प्रकार समझा जा सकता है कि जब हम कोई कार्य करते हैं तो एक प्रकार की ऊर्जा को दूसरे प्रकार की ऊर्जा में रूपान्तरित करते हैं। उदाहरण के लिए, बिजली के पंखे में वैद्युत ऊर्जा का यान्त्रिक ऊर्जा में रूपान्तरण होता है। लेकिन यह रूपान्तरण सौ प्रतिशत नहीं होता, कुछ प्रतिशत ऊष्मा प्रकार की ऊर्जा में व्यर्थ हो जाता है। आवश्यकता सौ प्रतिशत रूपान्तरण की है, वही दक्ष स्थिति कहलाएगी। यह विचित्र है कि पुराणों में जहां – जहां ऋषभ पर्वत आदि के उल्लेख आए हैं, उनमें से अधिकांश में उसकी स्थिति दक्षिण दिशा में कही गई है। दक्षता/दक्षिणा को कैसे उत्पन्न किया जा सकता है, इसके लिए ऐतरेय ब्राह्मण ४.३१ में पृष्ठ्य षडह सोमयाग के संदर्भ में याग के द्वितीय दिवस को समझना होगा। इस याग के लक्षण हैं – कुर्वत्(वर्तमान काल), न एति, न प्रेति, स्थितवत्, ऊर्ध्ववत्, प्रतिवत्, अन्तर्वत्, वृधन्वत्, वृषन्वत्, अभ्युदित, बार्हत इत्यादि। श्री रजनीश ने अपने व्याख्यानों में बहुत जोर दिया है कि हम वर्तमान में जीना सीखें। अभ्युदित लक्षण का उल्लेख षड्ज स्वर के लिए भी हो चुका है। ऋषभ स्वर के संदर्भ में भी जब अभ्युदित का उल्लेख है तो यह पहले अभ्युदित से भिन्न होना चाहिए। व्याख्या अपेक्षित है।  

*ऋषभाभिनयः – हंसास्याभिधहस्तेन दक्षिणेन करेण तु। कटिस्थेनार्धचन्द्रेण समेन शिरसा तथा। ब्राह्माख्यस्थानकेनापि धीमान् ऋषभमादिशेत् । - दामोदरः

*ऋषभस्तु ततः कल्पो ज्ञेयः पञ्चदशो द्विजाः। ऋषयो यत्र सम्भूताः स्वरो लोकमनोहरः।। - वायु पुराण २१.३१

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