स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय

स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय

गान्धार स्वर साम की ‘आदि’ भक्ति के तुल्य हो सकता है। आदि के विषय में कहा गया है कि चूंकि इसमें आदान किया जाता है, अतः इसका नाम आदि है(प्रस्ताव में प्र/प्रति वर्ण को महत्त्व दिया गया है। प्र ऊर्जा का प्रेषण हो सकता है)। आदि भक्ति में आदान किस वस्तु का किया जाता है, यह गान्धार स्वर के आगे के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है।   किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिन-जिन वस्तुओं को एकत्रित करना आवश्यक होता है, वही आदि हो सकते हैं। जैसे रोटी बनाने के लिए आटा, जल, अग्नि आदि। सूक्ष्म स्तर पर पहुंच कर स्थूल स्तर से ज्योति का आदान करना पडता है, अतः वही आदि है।

     नारद भक्ति सूत्र, शाण्डिल्य भक्ति सूत्र आदि में ‘आदि’ भक्ति का एक और लक्षण बताया गया है। वह है – संगव काल तथा पक्षियों का अन्तरिक्ष में अनाधार उडना। अन्तरिक्ष में अनाधार तभी उडा जा सकता है जब किसी ऊर्जा का क्षय न हो, अथवा जितनी ऊर्जा का क्षय हो, उतनी प्राप्त भी हो जाए।

*नाभेस्समुद्गतो वायुः गलं श्रोत्रं च चालयन्। सशब्दं येन निर्याति गान्धारस्तेन कथ्यते।। - पुरुषोत्तमः

*नाभेः समुद्गतो वायुरुरःकण्ठसमाहतः। गान्धर्वसुखहेतुत्वाद्गान्धारः परिकीर्तितः। गोशब्दोपपदाद्धारेः कर्ण्यप्यथवा मतः।। - कुम्भः

*गान्धारस्त्वेकवदनो गौरवर्णः चतुःकरः। वीणाफलाब्जघण्टाभृत्करः स्यान्मेषवाहनः।। शङ्करो दैवतं क्रौञ्चो द्वीपं सुपर्वजं कुलं। विष्णुर्गाता रसो वीरः . . . . . . . – सुधाकलशः

*त्रिष्टुप् छन्दः करुणो रसः छागो रौति, देवकुलसम्भवः सुवर्णवर्णः वैश्यजातिः कुशद्वीपभवः स्वर्लोके वासः गौडदेशगः कुजो वासराधीशः यजुर्वेदी माध्यन्दिनी शाखा पञ्चविंशतिवर्षदेशीयः तिस्रः कलाः ईश्वरसत्कारे प्रयोगः उच्चध्वनिः नादो गन्धं गन्धवहमित्यन्वेति यत्स्फुटं। तेन गान्धार एवासौ स्वरो गान्धार उच्यते। गान्धारो द्विश्रुतिः।। - पण्डितमण्डली

गान्धार स्वर हेतु कुज या मंगल वार अधिपति का उल्लेख है। मंगल के विषय में कहा जाता है कि वह पृथिवी तत्त्व की तन्मात्रा अग्नि है। इसे रोहित/लोहित भी कह सकते हैं।अथवा सूक्ष्म शरीर भी कह सकते हैं। यह कहा जा सकता है कि पृथिवी पर जो भी जीवन है, वनस्पति, जीव आदि, उसका कारण मंगल/लोहित रूपी अग्नि तत्त्व है। यदि अग्नि तत्त्व न हो तो पृथिवी नग्न की भांति होगी। गान्धार देश का एक राजा नग्नजित् है जिसकी पुत्री सत्या का परिणय कृष्ण ने स्वयंवर में सात वृषों को एक साथ वश में करने के द्वारा किया। नग्नजित् से तात्पर्य अज्ञान रूपी नग्नता पर विजय पा लेने वाले से हो सकता है।

गान्धार शब्द की एक निरुक्ति गं-ज्ञान को धारण करने वाले के रूप में हो सकती है। इस स्वर के बारे में सूचना का एक स्रोत महाभारत में धृतराष्ट्र-भार्या गान्धारी हो सकती है जो गान्धार देश के राजा की पुत्री है तथा जिसके सुबल, शकुनि आदि भ्राता हैं जो द्यूत विद्या में प्रवीण हैं। धृतराष्ट्र को अज्ञान का प्रतीक समझा जा सकता है। गान्धार स्वर हेतु त्रिष्टुप् छन्द का उल्लेख हुआ है। त्रिष्टुप् छन्द दक्षता प्राप्ति हेतु होता है।

*गान्धार स्वरहस्तः - करोऽप्यजमुखश्चापि गान्धारः स्वरनिर्णये। - शृङ्गार

*चतुर्दशस्तु गन्धर्वो गान्धर्वो यत्र वै स्वरः। उत्पन्नस्तु यथा नादो गन्धर्वा यत्र चोत्थिताः।। - वायु पुराण २१.३०

*गान्धारस्वरमन्त्रः – चतुरश्रो हृदयाय नमः। त्र्यश्रः शिरसे स्वाहा। मिश्रः शिखायै वषट्। खण्डः कवचाय हुम्। सङ्करो नेत्रत्रयाय वौषट्। चतुरश्रमिश्रखण्डसंकरा अस्त्राय फट्। सनत्कुमार ऋषिः अत्युक्तछन्दः दुर्गा देवता ऐं ह्रीं श्रीं गं नमः। - जगदेकः

इस मन्त्र में खण्ड शब्द द्यूत का संकेतक हो सकता है। गान्धार स्वर मध्यम स्वर से पूर्ववर्ती स्वर है। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि मध्यम स्वर की स्थिति मध्य में है तो गान्धार चतुर्दिक दिशाओं का प्रतीक हो सकता है। इसकी पुष्टि उपरोक्त गान्धारस्वर मन्त्र से होती है जहां चतुरस्र, त्रयस्त्र, मिश्र, संकर, खण्ड आदि का उल्लेख है। प्रत्येक दिशा एक विशिष्ट कार्य की सिद्धि हेतु होती है, जैसे पूर्व में ज्ञान की सिद्धि, दक्षिण में दक्षता की, पश्चिम में पाप नाश की, उत्तर में आनन्द की। गान्धार स्वरमन्त्र में मिश्र स्थिति का भी उल्लेख है। मन्त्र में चतुरस्र से अभिप्राय आयत ■ द्वारा प्रदर्शित चार दिशाओं से और त्र्यस्र से अभिप्राय त्रिकोण द्वारा प्रदर्शित तीन दिशाओं से हो सकता है। आयत की चार दिशाएं तिर्यक् होती हैं। डा. फतहसिंह के अनुसार त्रिकोण दो प्रकार का होता है – अधोमुखी ▼ और ऊर्ध्वमुखी ▲। यह उन्मनी और समनी स्थितियों का सूचक हो सकता है। वास्तविक संगीत में गान्धार स्वर क्या इन्हीं उद्देश्यों के लिए प्रकट हुआ है, यह अन्वेषणीय है।

     गान्धार स्वर को ऐतरेय ब्राह्मण ५.१ में पृष्ठ्य षडह याग के तृतीय दिवस के लक्षणों के आधार पर समझने का प्रयत्न भी किया जा सकता है। तृतीय अह के लक्षण हैं – जगती छन्दः, कृतम्, समानोदर्कं, अश्ववत्, अन्तवत्, पुनरावृत्तं, पुनर्निनृत्तं, रतवत्, पर्यस्तवत्, त्रिवत्, अन्तरूप, उत्तम पद में देवता, असौ लोक, अभ्युदित, वैरूप आदि। इन लक्षणों में कृत और अन्त लक्षण ध्यान देने योग्य हैं। यदि किसी कर्म के कर्मफल का अन्त हो जाए तो वह कृत कहलाएगा। गान्धार शब्द का अर्थ होता है – गं को, ज्ञान को धारण कर लिया, अब उसका क्षय नहीं होगा, क्षयरहित स्थिति। यह तभी हो सकता है जब कर्मफलों का अन्त/अस्त हो जाए, कोई पाप शेष न रहे। लेकिन गान्धार स्वर की पृष्ठ्य षडह के तृतीय दिवस से तुलना करने में दुविधा यह है कि गान्धार स्वर का छन्द त्रिष्टुप् कहा गया है जबकि तृतीय अह का छन्द जगती है। जगती में ही पापों का नाश होता है। त्रिष्टुप् छन्द दक्षता प्राप्ति के लिए होता है।

     भागवत पुराण के तृतीय स्कन्ध के आधार पर भी गान्धार स्वर की व्याख्या का प्रयास किया जा सकता है। इस स्कन्ध में कर्दम-देवहूति आख्यान है। कर्दम उस कीचड को कहते हैं जो पापनाश के कारण उत्पन्न होता है। 

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