हारमोनियम के गुण और दोष

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हारमोनियम में गुण और दोष दोनों पाए जाते हैं दोनों का विवेचन इस प्रकार किया जा सकता है

गुण
1. संगीत के प्रचार और प्रसार में हारमोनियम अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है इस वाद्य का बजाना अत्यंत सुगम है पर्दों पर उंगलियों को रखकर धोंकनी से हवा देने पर स्वर अपने आप बजने लगते हैं हारमोनियम बजा कर गाते-गाते छात्रों में संगीत सीखने की तीव्र इच्छा उत्पन्न होती है धीरे-धीरे कालांतर मैं वह एक महान संगीतकार बन जाते हैं
2. हारमोनियम में यह गुण पाया जाता है कि उसे अन्यान्य तंत्र वाद्य की भांति मिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती इसमें शुद्ध विकृत 12 स्वर निर्धारित है हारमोनियम बजाते ही स्वर अपनी अपनी मर्यादा में सुनाई देने लगते हैं।
3. किसी भी तंत्र वाद्य अथवा अवनद्ध वाद्य को मिलाने के लिए हारमोनियम की आवश्यकता पड़ती है कुछ गिने-चुने प्रकांड संगीतकार को छोड़ कर रहे सभी संगीतज्ञ वाद्यो को मिलाने के लिए हारमोनियम का सहारा लेते हैं सितार या तानपुरे जिन जिन स्वर पर मिलाना होता है हारमोनियम में उन्ही स्वरों को लगातार बजाकर अन्यान्य तंत्र या अवनद्ध वाद्य को मिलाया जाता है।
4. प्रारंभिक छात्रों के लिए हारमोनियम अत्यंत सहायक सिद्ध होता है तानपुरा आदि पर स्वरों का अभ्यास करते समय गुरु अथवा शिक्षक का रहना अत्यंत आवश्यक रहता है क्योंकि तानपुरे पर सा और पा को छोड़कर अन्य स्वर निर्धारित नहीं हैं और ना ही स्वतंत्र रुप से बचते हुए सुनाई पढ़ते हैं अन्य स्वर स्वयंभू नाद के रूप में उत्पन्न होते अवश्य है किंतु उनको सिद्ध संगीतकार ही सुन सकते हैं प्रारंभिक छात्र नहीं ।हारमोनियम बजा कर गाते समय शिक्षक का रहना आवश्यक नहीं है हारमोनियम के स्वर अपनी ऊंचाई और निचाई में अपने आप बजते हैं छात्र उनका अनुकरण कर ज्ञान कर लेते हैं।
दोष
1. हारमोनियम के स्वर कितने तेज और कर्कश होते हैं कि गाते समय गायक के कंठ से निकले हुए स्वर स्पष्ट रुप से सुनाई नहीं पड़ते हारमोनियम के स्वरों की आवाज से कंठ निःसृत स्वर दब जाते हैं।
2. हारमोनियम के स्वर एक दूसरे से स्फुट होते हैं एक के बाद दूसरा स्वर पर जाते समय तारतम्यता नहीं रहती ऐसी स्थिति में मींड या गमक सफलतापूर्वक उत्पन्न नहीं किया जा सकता जबकि भारतीय संगीत में मींड और गमक का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है
3. हारमोनियम पर स्वर साधना करने से स्वरों में वह घनत्व उत्पन्न नहीं हो पाता जो तानपुरे पर अभ्यास करने से होता है क्योंकि हारमोनियम के स्वर मानव कण्ठ के अनुकूल नहीं होते ।मानव कंठ के स्वरों के अनुकूल सदा तंत्र वाद्य से ही निकले स्वर पर होते हैं।
4 हारमोनियम बजाते समय आवेश में आकर जब गायक धोंकनी पर अधिक जोर देकर बजाने लगते हैं और उंगलियां को पर्दे पर जोर से पटकने लगते हैं तो स्वरों की मधुरता प्रायः नष्ट हो जाती है।
5. हारमोनियम एक पाश्चात्य वाद्य है वह पाश्चात्य संगीत के लिए भले उपयुक्त हो ,किंतु भारतीय संगीत के लिए उतना उपयुक्त नहीं है ।पाश्चात्य संगीत में शुद्ध विकृत 12 स्वर के ही आधार पर गायन और वादन किया जाता है ।इस में स्वरों के केवल तीन अवस्थाएं होती हैं शुद्ध कोमल तथा तीव्र किंतु भारतीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें श्रुतियों का भी सहारा लेना पड़ता है इस प्रकार कोमल गांधार कोमलतर गांधार तथा कोमलतम गांधार आदि प्रत्येक स्वर की तीन अवस्थाएं होती हैं दरबारी ,मुल्तानी तथा बाहर आदि राहों में गंधार की कोमल अवस्था भिन्न-भिन्न पाई जाती है इन राहों की ठीक-ठीक अवधारणा हारमोनियम पर संभव नहीं है क्योंकि हारमोनियम में शुद्ध और विकृत 12 स्वरों के अतिरिक्त अन्यान्य स्वर नहीं पाए जाते ।अतः भारतीय संगीत के सभी रागों को व्यक्त करने की क्षमता हारमोनियम में नहीं पाई जाती है।

अतः प्रारंभिक अवस्था में हारमोनियम का सहारा लेना कुछ ठीक है लेकिन जैसे जैसे संगीत मैं आगे सीखते हैं आप हारमोनियम का सहारा लेना बंद कर दें
गायन अथवा वादन नृत्य सीखते समय अगर गुरु शिष्य परंपरा उच्च कोटि की है तो कोई भी परेशानी नहीं होगी परेशानी तब होती है जब गुरु शिष्य परंपरा उच्च कोटि की ना हो अतः ध्यान रखें

 

 

 

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