राग परिचय

सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर

सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर

सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर

 

स्वर नाम

संकेत

स्थान

तृप्ति(सामविधान ब्राह्मण १.१.१४)

स्वर नाम

स्थान

तृप्ति(नारद पुराण १.५०)

क्रुष्ट

११

मूर्द्धा

देव

पंचम

 

देव, पितर, ऋषि

रागों की उत्पत्ति ‘थाट’ से होती है।

रागों की उत्पत्ति

हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति रागों पर आधारित है । रागों की उत्पत्ति ‘थाट’ से होती है। थाटों की संख्या गणित की दृष्टि से ‘72’ मानी गयी है किन्तु आज मुख्यतः ‘10’ थाटों का ही क्रियात्मिक प्रयोग किया जाता है जिन के नांम हैं बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, भैरवी, काफी, आसावरी, पूर्वी, मारवा और तोडी हैं। प्रत्येक राग विशिष्ट समय पर किसी ना किसी विशिष्ट भाव (मूड – थीम) का घोतक है। राग शब्द सँस्कृत के बीज शब्द ‘रंज’ से लिया गया है। अतः प्रत्येक राग में स्वरों और उन के चलन के नियम हैं जिन का पालन करना अनिवार्य है अन्यथ्वा आपेक्षित भाव का सर्जन नहीं हो सकता। हिन्दूस्तानी संगीत में प्रत्येक राग अपने निर्धारि

स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां

स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां

स्वर और उनसे सम्बद्ध श्रुतियां

स्वर

श्रुति

स्वर

श्रुति

 

तीव्रा

 

वज्रिका

 

कुमुद्वती

 

प्रसारिणी

 

मन्द्रा

 

प्रीति

सा

छन्दोवती

मार्जनी

स्वर निषाद का शास्त्रीय परिचय

निषाद स्वर हेतु जगती छन्द का निर्देश है। जगती छन्द पाप नाश हेतु होता है। निषाद स्वर का वार शनिवार कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ४.६.८.१-२ का कथन है – या वै दीक्षा सा निषत्, तत् सत्रम्। शतपथ ब्राह्मण ५.४.४.५ तथा १२.८.३.१० में वाजसनेयि माध्यन्दिन संहिता १०.२७ व २०.२ में प्रकट हुई निम्नलिखित यजु की व्याख्या की गई है-

निषषाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा। साम्राज्याय सुक्रतुः।।

स्वर धैवत का शास्त्रीय परिचय

स्वर धैवत का शास्त्रीय परिचय

नारद पुराण में धैवत स्वर द्वारा असुर, निषाद व भूतग्राम के तृप्त होने का उल्लेख है। यहां भूतग्राम से तात्पर्य हमारे पूर्व जन्म के संस्कारों से हो सकता है। यदि धैवत शब्द का वास्तविक रूप दैवत हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ होगा कि धैवत स्वर में पुरुषार्थ का अभाव है, केवल कृपा, दैव शेष है। प्रथम स्थिति में धैवत/दैवत स्वर का रस भयानक या बीभत्स कहा जाएगा और दैवकृपा प्राप्त होने पर यह करुण रस बन जाएगा।

     नारदीय शिक्षा में धैवत स्वर के देवता के रूप में ह्रास-वृद्धि वाले सोम का उल्लेख है। अध्यात्म में, वृद्धि-ह्रास हमारे चेतन-अचेतन मन में हो सकता है।

स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय

स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय

पञ्चम स्वर साम की प्रतिहार भक्ति के तुल्य हो सकता है। प्रतिहार के विषय में कहा गया है कि इसमें अन्न का हरण किया जाता है। मध्यम अथवा उद्गीथ भक्ति द्वारा विकसित हुए सर्वोच्च स्थिति के प्राणों को, गुणों को जिस अन्न की आवश्यकता पडती होगी, पञ्चम स्वर उस अन्न को प्रदान करता होगा। नारद का वीणावादन पञ्चम स्वर में होता है।

स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय

स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय

मध्यम स्वर साम की उद्गीथ भक्ति के तुल्य हो सकता है। इसे सूर्य की सबसे विकसित स्थिति, मध्याह्न काल की स्थिति के रूप में समझा जा सकता है।

स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय

स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय

गान्धार स्वर साम की ‘आदि’ भक्ति के तुल्य हो सकता है। आदि के विषय में कहा गया है कि चूंकि इसमें आदान किया जाता है, अतः इसका नाम आदि है(प्रस्ताव में प्र/प्रति वर्ण को महत्त्व दिया गया है। प्र ऊर्जा का प्रेषण हो सकता है)। आदि भक्ति में आदान किस वस्तु का किया जाता है, यह गान्धार स्वर के आगे के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है।   किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिन-जिन वस्तुओं को एकत्रित करना आवश्यक होता है, वही आदि हो सकते हैं। जैसे रोटी बनाने के लिए आटा, जल, अग्नि आदि। सूक्ष्म स्तर पर पहुंच कर स्थूल स्तर से ज्योति का आदान करना पडता है, अतः वही आदि है।

स्वर मालिका तथा लिपि

स्वर मालिका तथा लिपि

भारतीय संगीत शास्त्री अन्य कई बातों में भी पाश्चात्य संगीत कारों से कहीं आगे और प्रगतिशील थे। भारतीयों ने ऐक ‘सप्तक’ ( सात स्वरों की क्रमबद्ध लडी – ‘सा री ग म प ध और नि’ को 22 श्रुतियों (इन्टरवल) में बाँटा था जब कि पाश्चात्य संगीत में यह दूरी केवल 12 सेमीटोन्स में ही विभाजित करी गयी है। भारतीयों ने स्वरों के नामों के प्रथम अक्षर के आधार पर ‘सरगमें’ बनायी जिन्हें गाया जा सकता है। ईरानियों और उन के पश्चात मुसलमानों ने भी भारतीय स्वर मालाओं (सरगमों) को अपनाया है।

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