राग परिचय

ठुमरी का नवनिर्माण

ठुमरी का नवनिर्माण

ठुमरी को लम्बे समय तक नायिका के बनाव शृंगार, मान-मनौव्वल, उपेक्षा-विरह और छेड़-छाड़ से जोड़ कर देखा गया लेकिन गिरिजा देवी ने इस ठुमरी गायकी को सात्विकता प्रदान की और इसे भक्ति रस से सराबोर कर दिया और उनका गायन उनके लिए भक्ति साधना कामाध्यम बन गया. Read More : ठुमरी का नवनिर्माण about ठुमरी का नवनिर्माण

बेहद लोकप्रिय है शास्त्रीय गायकी का किराना घराना

बेहद लोकप्रिय है शास्त्रीय गायकी का किराना घराना

किराना घराने की बात करने से पहले आपको बताते चलें कि शास्त्रीय गायकी के भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी किराना घराने से ही थे.

किराना घराना का प्रतिनिधि गायक अब्दुल करीब खान को माना जाता है. महान कलाकार सवाई गंधर्व भी किराना घराने से ही थे. इस घराने की गायकी में मींड और गमक को वीणा के सुर की तरह पैदा किया जाता है. सुरों की साधना इस घराने के कलाकारों की पहचान है. Read More : बेहद लोकप्रिय है शास्त्रीय गायकी का किराना घराना about बेहद लोकप्रिय है शास्त्रीय गायकी का किराना घराना

रामपुर सहसवां घराना भी है गायकी का मशहूर घराना

रामपुर सहसवां घराना

भारतीय शास्त्रीय संगीत के घरानों में रामपुर सहसवां का भी विशेष महत्व है. इसके प्रतिनिधि गायक उस्ताद इनायत हुसैन खान को माना जाता है. इस घराने में कलाकार गायकी में एक एक सुर के साथ बढ़त लेते हैं.

आलाप की शुरुआत बंदिश के साथ ही करने वाले रामपुर सहसवां के कलाकारों ने बंदिश के साहित्य पर बहुत ध्यान दिया है.उस्ताद इनायत खान के अलावा उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान, उस्ताद निसार हुसैन खान और राशिद खान इस घराने के प्रमुख गायक हैं.

राशिद खान इस वक्त देश के सबसे नामचीन शास्त्रीय गायकों में से एक हैं. उन्होंने शास्त्रीय गायकी को बड़ी बुलंदियों तक पहुंचाया है. Read More : रामपुर सहसवां घराना भी है गायकी का मशहूर घराना about रामपुर सहसवां घराना भी है गायकी का मशहूर घराना

कर्नाटक संगीत

कर्नाटक संगीत

कर्नाटक संगीत या संस्कृत में कर्णाटक संगीतं भारत के शास्त्रीय संगीत की दक्षिण भारतीय शैली का नाम है, जो उत्तरी भारत की शैली हिन्दुस्तानी संगीत से काफी अलग है। कर्नाटक संगीत ज्यादातर भक्ति संगीत के रूप में होता है और ज्यादातर रचनाएँ हिन्दू देवी देवताओं को संबोधित होता है। इसके अलावा कुछ हिस्सा प्रेम और अन्य सामाजिक मुद्दों को भी समर्पित होता है। जैसा कि आमतौर पर भारतीय संगीत मे होता है, कर्नाटक संगीत के भी दो मुख्य तत्व राग और ताल होता है। कर्नाटक शास्त्रीय शैली में रागों का गायन अधिक तेज और हिंदुस्तानी शैली की तुलना में कम समय का होता है। त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितार और श्यामा शास्त्री को Read More : कर्नाटक संगीत about कर्नाटक संगीत

बड़े गुलाम अली खान: जिन्होंने गाने के लिए रफी और लता से 50 गुना फीस ली

बड़े गुलाम अली खान

कहते हैं इनकार करने की नीयत से बड़े गुलाम अली खान ने के. आसिफ से मेहनताने के तौर पर एक गाने के 25,000 रुपए मांगे थे, ये वो दौर था जब लता और रफी जैसे मशहूर गायकों को एक गाने का 500 से कम मिलता था Read More : बड़े गुलाम अली खान: जिन्होंने गाने के लिए रफी और लता से 50 गुना फीस ली about बड़े गुलाम अली खान: जिन्होंने गाने के लिए रफी और लता से 50 गुना फीस ली

शास्त्रीय संगीत क्या है

शास्त्रीय संगीत क्या है

भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है भारतीय शास्त्रीय संगीत। आज से लगभग ३००० वर्ष पूर्व रचे गए वेदों को संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। ऐसा मानना है कि ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को संगीत वरदान में दिया था। चारों वेदों में, सामवेद के मंत्रों का उच्चारण उस समय के वैदिक सप्तक या समगान के अनुसार सातों स्वरों के प्रयोग के साथ किया जाता था। Read More : शास्त्रीय संगीत क्या है about शास्त्रीय संगीत क्या है

पण्डित अजॉय चक्रबर्ती

पण्डित अजॉय चक्रबर्ती

पण्डित अजॉय चक्रबर्ती (जन्म: २५ दिसम्बर १९५२) एक प्रतिष्ठित भारतीय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीतकार, गीतकार, गायक और गुरु हैं। उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीतकारी के विशिष्ठ व्यक्तित्वों में गिना जाता है। पटियाला कसूर घराना उनकी विशेष दक्षता है, तथा वे मूलतः उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली साहब और उस्ताद बरकत अली खान की गायकी का प्रतिनिधित्व करता हैं। तथा हिन्दुस्तानी शास्त्रीय परम्परा के अन्य घराने, जैसे इंदौर, दिल्ली, जयपुर, ग्वालियर, आगरा, किराना, रामपुर तथा दक्षिण भारतीय कर्नाटिक संगीत की शैलियों का भी इनकी गायिकी पर प्रभाव पड़ता है। Read More : पण्डित अजॉय चक्रबर्ती about पण्डित अजॉय चक्रबर्ती

लोक कला की ध्वजवाहिका

लोक कला की ध्वजवाहिका

गिरिजा देवी ने दशकों तक न सिर्फ शास्त्रीय और उप शास्त्रीय गायन की हर उंचाई को छुआ बल्कि ठुमरी को और परिष्कृत करते हुए उसे नवीनतम प्रतिमान दिए. संगीत के प्रारंभिक गुरु उनके पिता रहे लेकिन बाद में उन्होंने पंडित सरजू प्रसाद मिश्र और पंडित महादेव मिश्र से भी शिक्षा ली, लेकिन उनकी प्रतिभा को विस्तार दिया पंडित श्रीचंद्र मिश्र ने. उन्होंने अपनी जीवन यात्रा में बनारस घराना और पूरब अंग की गायकी का अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व किया. Read More : लोक कला की ध्वजवाहिका about लोक कला की ध्वजवाहिका

लोक और शास्त्र के अन्तरालाप की देवी

अन्तरालाप की देवी

गिरिजा देवी को उस दौर की ख्यातिलब्ध महिला गायिकाओं ने भी खासा प्रभावित किया और वे बड़ी मोतीबाई, छोटी मोतीबाई, रसूलनबाई, रोशन आरा बेगम, मुश्तरी समेत विद्याधरी एवं मोगूबाई कुरडीकर आदि के रिकॉर्ड सुनती थी. लेकिन रसूलनबाई ने गिरिजादेवी को खासा प्रभावित किया. इनके अलावा वे सिद्धेश्वरी देवी को जीवन भर असली ठुमरी साम्राज्ञी मानती रहीं और उन्होंने इन सब विभूतियों से कुछ न कुछ सीखा. उनके व्यक्तित्व के उजास और अंतर्दृष्टि को ठाकुर जयदेव सिंह ने पहचाना और न सिर्फ उसे सराहा बल्कि उन्हें संगीत के कुछ गूढ़ विषयों से अवगत भी कराया. Read More : लोक और शास्त्र के अन्तरालाप की देवी about लोक और शास्त्र के अन्तरालाप की देवी

काशी की गिरिजा

काशी की गिरिजा

उत्तर भारत कोकिला, गान शिरोमणि, संगीत शिरोमणि, गान सरस्वती जैसी उपाधियां उन्हें अल्पायु में ही मिल गयीं थीं. दुनिया उन्हें सुर साम्राज्ञी और अप्पा जी जैसे अनेक सम्मान सूचक शब्दों से नवाजती थी लेकिन बनारस आने के बाद वो सिर्फ गिरिजा होकर रह जाती थीं. उन्हें इस बात का गौरव सदा रहा कि वे उन कुछ गिने चुने लोगों में से थीं जिन्हें शास्त्रीय संगीत के उदभट विद्वान पंडित श्रीचन्द्र मिश्र का शिष्यत्व प्राप्त हुआ. Read More : काशी की गिरिजा about काशी की गिरिजा

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