राग परिचय

संगीत घराने और उनकी विशेषताएं

संगीत घराने और उनकी विशेषताएं

घराना ( परिवार), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं।

इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु वा उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है।

राग 'भैरव':रूह को जगाता भोर का राग

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राग भैरव की उत्पत्ति भैरव थाट से  है. इसमें रे और ध कोमल लगते हैं, बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं. कोमल रे और ध को आंदोलित किया जाता है.
ये भोर का राग है, सुबह 4 बजे से 7 बजे तक इसे गाया-बजाया जाता है. सुबह का रियाज़ ज़्यादातर संगीतकार भैरव में ही करते हैं. आरोह और अवरोह में सातों स्वर लगते हैं इसलिए इस राग की जाति है संपूर्ण.
आरोह- सा रे ग म प ध नि सां
अवरोह- सां नि ध प म ग रे सा
पकड़- ग म ध s ध s प, ग म रे s रे सा

गायक बनने के उपाय और कैसे करें रियाज़

गायक बनने के उपाय और कैसे करें रियाज़

गायन हर किसी में यह विशेषता नहीं होती हैं। संगीत को भगवान की दें मानी जाती है और ऐसा सोंचा जाता है की जिसपे भगवान की कृपा होती है वही गा सकता है. परन्तु ईश्वर ने सबको अपनी कर्मठता से अपने सपने साकार करने की शक्ति दी है. अगर आपका गला और आवाज़ साधारण भी है, तो भी जबरदस्त रियाज़ करके आप अपनी आवाज़ में न सिर्फ नयी जान ला सकते है बल्कि संगीत की बुलंदियों को छू सकते हैं. गायन में बेहतर बनने के लिए दैनिक अभ्यास की जरूरत होती है। संगीत सीखने के लिए पहले संगीत का ज्ञान जरूरी है, बेहतर गायक बनने के समय लगेगा, लेकिन आप जल्दी परिणाम देखने के लिए निम्न टिप्स शुरू करना चाहिए।

संगीत शास्त्र परिचय

संगीत के स्वर, संगीत की परिभाषा, संगीत का अर्थ, संगीत के राग, भारतीय शास्त्रीय संगीत, गमक के प्रकार, संगीत किसे कहते हैं, आलाप की परिभाषा

भारतीय संगीत से, सम्पूर्ण भारतवर्ष की गायन वादन कला का बोध होता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की 2 प्रणालियाँ हैं। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति अथवा कर्नाटक संगीत प्रणाली और दूसरी हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली, जो कि समुचे उत्तर भारतवर्ष मे प्रचलित है। दक्षिण भारतीय संगीत कलात्मक खूबियों से परिपूर्ण है। और उसमें जनता जनार्दन को आकर्षित करने की और समाज मे संगीत कला की मौलिक विधियों द्वारा कलात्मक संस्कार करने की क्षमता है।

अकबर और तानसेन

अकबर और तानसेन

एक बार अकबर अपने दरबार में तानसेन द्वारा गायन सुन रहे थे गायन सुनने के पश्चात अकबर बोले, "तानसेन आपसे अच्छा भी कोई गायन करता है" तानसेन ने जवाब दिया, "जी महाराज, मेरे गुरुजी" अकबर ने कहा, "तानसेन जी के गुरु को दरबार में पेश किया जाए" तानसेन ने जवाब दिया, "महाराज गुरुजी यहां नहीं आ पाएंगे अगर आपको गायन सुनना है तो आपको गुरुजी के पास चलना होगा अकबर को थोड़ा बुरा लगा लेकिन वह गायन सुनने के शौकीन थे वह तानसेन के साथ उनके गुरु जी से मिलने चले गए" वहां पहुंचे तो देखागुरुजी समाधि में बैठे हुए थे अब गायन कैसे हो गा सवाल यह था कभी तानसेन जी आश्रम में बैठकर गलत गलत राग गाने लगे गलत बात सुनकर गुरु जी

नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज।

नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज।

्रिम नाद उत्पन्न करता है। संगीत दामोदर में नाद तीन प्रकार का माना गया है—प्राणिभव, अप्राणिभव और उभयसंभव। जो सुख आदि अंगों से उत्पन्न किया जाता है वह प्राणिभव, जो वीणा आदि से निकलता है वह अप्राणिभव और जो बाँसुरी से निकाला जाता है वह उभय- संभव है। नाद के बिना गीत, स्वर, राग आदि कुछ भी संभव नहीं। ज्ञान भी उसके बिना नहीं हो सकता। अतः नाद परज्योति वा ब्रह्मरुप है और सारा जगत् नादात्मक है। इस दृष्टि से नाद दो प्रकार का है— आहत और अनाहत। अनाहत नाद को केवल योगी ही सुन सकते हैं। इठयोग दीपिका में लिखा है कि जिनको तत्वबोध न हो सके वे नादोपासना करें। अँतस्थ नाद सुनने के लिये चाहिए कि एकाग्रचित होकर शां

संगीत का विकास और प्रसार

संगीत का विकास और प्रसार

हिन्दू मतानुसार मोक्ष प्राप्ति मानव जीवन का लक्ष्य है। नाद-साधन (म्यूजिकल साउँड) भी मोक्ष प्राप्ति का ऐक मार्ग है। नाद-साधन के लिये ऐकाग्रता, मन की पवित्रता, तथा निरन्तर साधना की आवश्यक्ता है जो योग के ही अंग हैं। आनन्द की अनुभूति ही संगीत साधना की प्राकाष्ठा है। संगीत के लिये भक्ति भावना अति सहायक है इस लिये संगीत आरम्भ से ही मन्दिरों, कीर्तनों (डिस्को), तथा सामूहिक परम्पराओं के साथ जुडा रहा है। भारत का अनुसरण करते हुये पाश्चात्य देशों में भी संगीत का आरम्भ और विकास चर्च के आँगन से ही हुआ था फिर वह नाट्यशालाओं में विकसित हुआ, और फिर जनसाधारण के साथ लोकप्रिय संगीत (पापुलर अथवा पाप म्यूज़िक)

ठुमरी : इसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है

ठुमरी : इसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है

ठुमरी भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक गायन शैली है। इसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है। अर्थात जिसमें राग की शुद्धता की तुलना में भाव सौंदर्य को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।[1] यह विविध भावों को प्रकट करने वाली शैली है जिसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है साथ ही यह रागों के मिश्रण की शैली भी है जिसमें एक राग से दूसरे राग में गमन की भी छूट होती है और रंजकता तथा भावाभिव्यक्ति इसका मूल मंतव्य होता है। इसी वज़ह से इसे अर्ध-शास्त्रीय गायन के अंतर्गत रखा जाता है।

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