राग परिचय

अकबर और तानसेन

अकबर और तानसेन

एक बार अकबर अपने दरबार में तानसेन द्वारा गायन सुन रहे थे गायन सुनने के पश्चात अकबर बोले, "तानसेन आपसे अच्छा भी कोई गायन करता है" तानसेन ने जवाब दिया, "जी महाराज, मेरे गुरुजी" अकबर ने कहा, "तानसेन जी के गुरु को दरबार में पेश किया जाए" तानसेन ने जवाब दिया, "महाराज गुरुजी यहां नहीं आ पाएंगे अगर आपको गायन सुनना है तो आपको गुरुजी के पास चलना होगा अकबर को थोड़ा बुरा लगा लेकिन वह गायन सुनने के शौकीन थे वह तानसेन के साथ उनके गुरु जी से मिलने चले गए" वहां पहुंचे तो देखागुरुजी समाधि में बैठे हुए थे अब गायन कैसे हो गा सवाल यह था कभी तानसेन जी आश्रम में बैठकर गलत गलत राग गाने लगे गलत बात सुनकर गुरु जी Read More : अकबर और तानसेन about अकबर और तानसेन

नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज।

नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज।

्रिम नाद उत्पन्न करता है। संगीत दामोदर में नाद तीन प्रकार का माना गया है—प्राणिभव, अप्राणिभव और उभयसंभव। जो सुख आदि अंगों से उत्पन्न किया जाता है वह प्राणिभव, जो वीणा आदि से निकलता है वह अप्राणिभव और जो बाँसुरी से निकाला जाता है वह उभय- संभव है। नाद के बिना गीत, स्वर, राग आदि कुछ भी संभव नहीं। ज्ञान भी उसके बिना नहीं हो सकता। अतः नाद परज्योति वा ब्रह्मरुप है और सारा जगत् नादात्मक है। इस दृष्टि से नाद दो प्रकार का है— आहत और अनाहत। अनाहत नाद को केवल योगी ही सुन सकते हैं। इठयोग दीपिका में लिखा है कि जिनको तत्वबोध न हो सके वे नादोपासना करें। अँतस्थ नाद सुनने के लिये चाहिए कि एकाग्रचित होकर शां Read More : नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज। about नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज।

संगीत का विकास और प्रसार

संगीत का विकास और प्रसार

हिन्दू मतानुसार मोक्ष प्राप्ति मानव जीवन का लक्ष्य है। नाद-साधन (म्यूजिकल साउँड) भी मोक्ष प्राप्ति का ऐक मार्ग है। नाद-साधन के लिये ऐकाग्रता, मन की पवित्रता, तथा निरन्तर साधना की आवश्यक्ता है जो योग के ही अंग हैं। आनन्द की अनुभूति ही संगीत साधना की प्राकाष्ठा है। संगीत के लिये भक्ति भावना अति सहायक है इस लिये संगीत आरम्भ से ही मन्दिरों, कीर्तनों (डिस्को), तथा सामूहिक परम्पराओं के साथ जुडा रहा है। भारत का अनुसरण करते हुये पाश्चात्य देशों में भी संगीत का आरम्भ और विकास चर्च के आँगन से ही हुआ था फिर वह नाट्यशालाओं में विकसित हुआ, और फिर जनसाधारण के साथ लोकप्रिय संगीत (पापुलर अथवा पाप म्यूज़िक) Read More : संगीत का विकास और प्रसार about संगीत का विकास और प्रसार

राग बागेश्री | पंडित जसराज जी

Feel both the serenity and the energy of dawn with this rendering of Raga Bageshri by the legendary Pandit Jasraj from the Raga by Sunrise collection. Blessed with a soulful and sonorous voice, which traverses masterfully over all four and a half octaves, Jasraj’s vocalizing is characterized by a harmonious blend of the classic and opulent elements projecting traditional music as an intense spiritual expression, at once chaste and yet densely coloured. This gives his music a unique and sublime emotional quality, reaching out to the very soul of the listener. Read More : राग बागेश्री | पंडित जसराज जी about राग बागेश्री | पंडित जसराज जी

गायकी के 8 अंग (अष्टांग गायकी)

वातावरण पर प्रभाव डालने के लिये राग मे गायन, वादन के अविभाज्य 8 अंगों का प्रयोग होना चाहिये। ये 8 अंग या अष्टांग इस प्रकार हैं - स्वर, गीत, ताल और लय, आलाप, तान, मींड, गमक एवं बोलआलाप और बोलतान। उपर्युक्त 8 अंगों के समुचित प्रयोग के द्वारा ही राग को सजाया जाता है।

1. स्वर - Read More : गायकी के 8 अंग (अष्टांग गायकी) about गायकी के 8 अंग (अष्टांग गायकी)

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