राग परिचय

गले में सूजन, पीड़ा, खुश्की

गले में सूजन, पीड़ा, खुश्की

अक्सर ज्यादा धूम्रपान करने (बीड़ी, सिगरेट पीने से), शराब पीने, खाने में ठंडी चीजे खाने से, ठंडी चीजों के खाने के बाद तुरंत ही गर्म चीजें खाने से, पेट में बहुत ज्यादा कब्ज रहने से, कच्चे फल खाने या फिर नाक तथा गला खराब करने वाली चीजों को सूंघने से, अम्लीय (खट्टे) चीजों को खाने से या ज्यादा देर तक बातें करने के कारण गले में खराबी आ जाती है जिससे गले में सूजन, दर्द, खुश्की तथा थूक निगलने में परेशानी या गला बैठ जाना आदि रोग पैदा हो जाते हैं।

लक्षण

वैदिक विज्ञान ने भारतीय शास्त्रीय संगीत'रागों' में चिकित्सा प्रभाव होने का दावा किया है।

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प्राचीन काल से ही संगीत को बारंबार चिकित्सीय कारक के रूप में उपयोग में लाया जाता रहा है। भारत में संगीत, मधुर ध्वनि के माध्यम से एक योग प्रणाली की तरह है, जो मानव जीव पर कार्य करती है तथा आत्मज्ञान की हद के लिए उनके उचित कार्यों को जागृत तथा विकसित करती हैं, जोकि हिंदू दर्शन और धर्म का अंतिम लक्ष्य है। मधुर लय भारतीय संगीत का प्रधान तत्व है।'राग' का आधार मधुर लय है। विभिन्न'राग' केन्द्रीय तंत्रिका प्रणाली से संबंधित अनेक रोगों के इलाज में प्रभावी पाए गए हैं। चिकित्सा के रूप में संगीत के प्रयोग करने से पहले यह अवश्य पता करना चाहिए कि किस प्रकार के संगीत का उपयोग हो.

आविर्भाव-तिरोभाव

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आविर्भाव व तिरोभाव भारतीय संगीत में अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। किसी भी राग के स्वरों को ऐसे क्रम में लगाना, जिससे किसी दूसरे राग की छाया दृष्टिगोचर होने लगे उसे तिरोभाव कहते हैं। परन्तु राग के मार्मिक स्वर पुन: लगाकर राग का आविर्भाव किया जाता है जिससे रागरूप स्पष्ट अपने रूप में आ जाए, आविर्भाव कहलाता है।
आविर्भाव-तिरोभाव बहुत कलापूर्ण है और अनुभवी, राग विज्ञान के दक्ष लोगों द्वारा ही संभव है अन्यथा इसमें राग स्वरूप नष्ट होने की अधिक संभावना रहती है।

 

संस्कृत में थाट का अर्थ है मेल

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संस्कृत में थाट का अर्थ है मेल। थाट, यह रागों के वर्गीकरण हेतु तैयार की हुई पद्धति है। पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने १० थाट प्रचिलित किये जिनको कोमल, शुद्ध और तीव्र स्वरों के आधार पर बनाया गया जो निम्न हैं - 
(१) कल्याण 
(२) बिलावल 
(३) खमाज 
(४) भैरव 
(५) पूर्वी 
(६) मारवा 
(७) काफी 
(८) आसावरी 
(९) भैरवी 
(१०) तोड़ी

वादी - संवादी

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राग एक माहौल या वातावरण विशेष का नाम है जो रंजक भी है। स्पष्ट रूप से इस वातावरण निर्मिती के केंद्र में वह स्वरावली है जो रागवाचक है इसे रागांग कहते हैं। इस रागांग का केंद्र बिंदु होता है वादी स्वर। इसे राग का जीव या प्राण स्वर भी कहा गया है। राग को राज्य की संज्ञा देकर वादी स्वर को उसका राजा कहा जाता है। स्पष्टतः वादी का प्रयोग अन्य स्वरों की अपेक्षा सर्वाधिक होता है तथा इस पर ठहराव भी अधिक होता है।

कंठध्वनि

स्वर (Voice) या कंठध्वनि की उत्पत्ति उसी प्रकार के कंपनों से होती है जिस प्रकार वाद्ययंत्र से ध्वनि की उत्पत्ति होती है। अत: स्वरयंत्र और वाद्ययंत्र की रचना में भी कुछ समानता है। वायु के वेग से बजनेवाले वाद्ययंत्र के समकक्ष मनुष्य तथा अन्य स्तनधारी प्राणियों में निम्नलिखित अंग होते हैं :

1. कंपक (Vibrators) इसमें स्वर रज्जुएँ (Vocal cords)Clone भी सम्मिलित हैं।

2. अनुनादक अवयव (resonators) इसमें निम्नलिखित अंग सम्मिलित हैं :

क. नासा ग्रसनी (nasopharynx), ख. ग्रसनी (pharynx),

शुद्ध स्वर

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सा, रे, ग, म, प, ध, नि शुद्ध स्वर कहे जाते हैं। इनमें सा और प तो अचल स्वर माने गए हैं, क्योंकि ये अपनी जगह पर क़ायम रहते हैं। बाकी पाँच स्वरों के दो-दो रूप कर दिए गए हैं, क्योंकि ये अपनी जगह पर से हटते हैं, इसलिए इन्हें कोमल व तीव्र नामों से पुकारते हैं। इन्हें विकृत स्वर भी कहा जाता है।

पैर छूने के पीछे का वैज्ञानिक रहस्य

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पैर छूने से ऊर्जा का संचार होता है
भारतीय सभ्यता और संस्कृति बहुत प्राचीन हैं | ऋषि मुनियों द्वारा स्थापित इस संस्कृति का आधार गूढ़ वैज्ञानिक रहस्य है | इन ऋषियों ने काफी शोध के बाद हमारी सभ्यता और संस्कृति के लिए कुछ नियम बनाएं हैं और उन्हें शास्त्रों में संजों के रखा है | ऐसा ही एक नियम है भारतीय सभ्यता में "पैर छूना " जो सिर्फ एक अभिवादन और आदर करने का तरीका नहीं है बल्कि उसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी काम करता है | हम सिर्फ पैर ही क्योंछूते हैं ? शरीर का कोई और हिस्सा जैसे पेट, पीठ और टांग छू कर आशीर्वाद क्यों नहीं लेते ? क्यूंकि इसके पीछे भी एक तार्किक वैज्ञानिक कारण है |

गुनगुनाइए गीत, याददाश्त रहेगी दुरुस्त

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म्यूजिक थेरेपी 
गीत गुनगुनाने से सिर्फ आपका मूड ही फ्रेश नहीं होता, बल्कि इससे आपकी याददाश्त भी दुरुस्त होती है. फिनलैंड की हेलसिंकी यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है. तेपो सरकामो के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन के मुताबिक, गीत-संगीत विशेषकर गायन, डिमेंशिया रोग के शुरुआती चरण में काफी फायदा होता है.
इस शोध के अनुसार, संगीत मानसिक रोगियों की देखभाल में ज्यादा लाभकारी होता है. इसे डिमेंशिया की विभिन्न चरणों में असरदार माना गया है.

राग दरबारी कान्हड़ा

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राग दरबारी कान्हड़ा

प्राचीन संगीत ग्रन्थों मे राग दरबारी कान्हड़ा के लिये भिन्न नामों का उल्लेख मिलता है। कुछ ग्रन्थों मे इसका नाम कणार्ट, कुछ मे कणार्टकी तो अन्य ग्रन्थों मे कणार्ट गौड़ उपलब्ध है। वस्तुत: कन्हण शब्द कणार्ट शब्द का ही अपभ्रंश रूप है। कान्हड़ा के पूर्व दरबारी शब्द का प्रयोग मुगल शासन के समय से प्रचलित हुआ ऐसा माना जाता है। कान्हड़ा के कुल कुल 18 प्रकार माने जाते हैं-

संगीत सुनें और पाएं इन सात समस्याओं से छुटकारा

कोई संगीत इसलिए सुनता है कि उसे संगीत का शौक है, तो कोई अपनी दिन भर की थकान संगीत से मिटाता है। वजह कुछ भी हो लेकिन हर किसी के जीवन से कहीं न कहीं जुड़ा है।

अगर आप भी रोज संगीत सुनकर खुदको तरोताजा करते हैं तो जा‌न लें कि यह न सिर्फ आपके मूड को बेहतर बनाता है बल्कि सेहत से जुड़ी कई समस्याओं को सुलझाने में मदद करता है।

गुरु-शिष्य परम्परा

गुरु-शिष्य

गुरु-शिष्य परम्परा आध्यात्मिक प्रज्ञा का नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का सोपान। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत गुरु (शिक्षक) अपने शिष्य को शिक्षा देता है या कोई विद्या सिखाता है। बाद में वही शिष्य गुरु के रूप में दूसरों को शिक्षा देता है। यही क्रम चलता जाता है। यह परम्परा सनातन धर्म की सभी धाराओं में मिलती है। गुरु-शिष्य की यह परम्परा ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में हो सकती है, जैसे- अध्यात्म, संगीत, कला, वेदाध्ययन, वास्तु आदि। भारतीय संस्कृति में गुरु का बहुत महत्व है। कहीं गुरु को 'ब्रह्मा-विष्णु-महेश' कहा गया है तो कहीं 'गोविन्द'। 'सिख' शब्द संस्कृत के 'शिष्य' से व्युत्पन्न ह

संगीत घराने और उनकी विशेषताएं

संगीत घराने और उनकी विशेषताएं

घराना ( परिवार), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं।

इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु वा उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है।

राग 'भैरव':रूह को जगाता भोर का राग

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राग भैरव की उत्पत्ति भैरव थाट से  है. इसमें रे और ध कोमल लगते हैं, बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं. कोमल रे और ध को आंदोलित किया जाता है.
ये भोर का राग है, सुबह 4 बजे से 7 बजे तक इसे गाया-बजाया जाता है. सुबह का रियाज़ ज़्यादातर संगीतकार भैरव में ही करते हैं. आरोह और अवरोह में सातों स्वर लगते हैं इसलिए इस राग की जाति है संपूर्ण.
आरोह- सा रे ग म प ध नि सां
अवरोह- सां नि ध प म ग रे सा
पकड़- ग म ध s ध s प, ग म रे s रे सा

गायक कलाकारों और बच्चों के लिए विशेष

गायक कलाकारों और बच्चों के लिए विशेष

खाँसी रोग कई कारणों से पैदा होता है और यदि जल्दी दूर न किया जाए तो विकट रूप धारण कर लेता है। एक कहावत है, रोग का घर खाँसी। खाँसी यूँ तो एक मामूली-सी व्याधि मालूम पड़ती है, पर यदि चिकित्सा करने पर भी जल्दी ठीक न हो तो इसे मामूली नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ऐसी खाँसी किसी अन्य व्याधि की सूचक होती है। आयुर्वेद ने खाँसी के 5 भेद बताए हैं अर्थात वातज, पित्तज, कफज ये तीन और क्षतज व क्षयज से मिलाकर 5 प्रकार के रोग मनुष्यों को होते हैं।

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