राग परिचय

स्वर ऋषभ का शास्त्रीय परिचय

स्वर ऋषभ का शास्त्रीय परिचय

जैसा कि षड्ज स्वर के संदर्भ में उल्लेख किया जा चुका है, सूर्य की अथवा गुणों की अनुदित/अविकसित स्थिति षड्ज हो सकती है जबकि उदित/विकसित स्थिति ऋषभ हो सकती है। यदि प्राण षड्ज है तो वाक् ऋषभ हो सकती है। यदि मन षड्ज है तो वाक् ऋषभ हो सकती है(छान्दोग्य उपनिषद)। साम की भक्तियों में प्रस्ताव भक्ति ऋषभ के तुल्य कही जा सकती है। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि पशु तो हिंकार स्थिति है जबकि मनुष्य प्रस्ताव, क्योंकि मनुष्य ही परमेश्वर की स्तुति कर सकता है। इस कथन को इस प्रकार समझा जा सकता है कि किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अज्ञानपूर्वक जो संकल्प किया जाता है, वह तो षड्ज है और तत्पश्चात् उस उद्देश्य

स्वर षड्ज का शास्त्रीय परिचय

ऐतरेय ब्राह्मण ४.२९ में पृष्ठ्य षडह नामक सोमयाग के प्रथम दिवस के लक्षणों का उल्लेख है। इन लक्षणों में से एक है – करिष्यत्, अर्थात् जो भविष्य में किया जाने वाला अथवा होने वाला है। जो कुछ भविष्य में होने वाला है, जैसे आज जो गर्भ रूप में है, कल वह जन्म लेगा। गर्भ को बाहर से प्रभावित किया जा सकता है। यह षड्ज स्वर का उद्देश्य हो सकता है। करिष्यत् लक्षण के साथ-साथ अन्य लक्षणों का भी उल्लेख है – जैसे एति और प्रेति, युक्तवत्, रथवत्, आशुमत्, पिबवत्, अभ्युदित, राथन्तर, गायत्र, मन्त्र के प्रथम पद में देवता का उल्लेख आदि। एति से तात्पर्य है कि बाहर से, ब्रह्माण्ड से, सूर्य से ऊर्जा का ग्रहण किया जाता ह

संगीत के स्वर

संगीत के स्वर

श्रीमती विमला मुसलगाँवकर की पुस्तक ‘भारतीय संगीत शास्त्र का दर्शनपरक अनुशीलन’ में पृष्ठ १३९ पर उल्लेख है कि विशुद्धि चक्र की स्थिति कण्ठ में है। यह सोलह दल वाला होता है। यह भारती देवी(सरस्वती) का स्थान है। इसके पूर्वादि दिशाओं वाले दलों पर ध्यान का फल क्रमशः १-प्रणव, २-उद्गीथ, ३-हुंफट्, ४- वषट्, ५-स्वधा(पितरों के हेतु), ६-स्वाहा(देवताओं के हेतु), ७-नमः, ८-अमृत, ९-षड्ज, १०-ऋषभ, ११-गान्धार, १२-मध्यम, १३-पञ्चम, १४- धैवत, १५-निषाद, १६-विष – ये सोलह फल होते हैं—

कण्ठेऽस्ति भारतीस्थानं विशुद्धिः षोडशच्छदम्॥

तत्र प्रणव उद्गीथो हुंफड्वषडथ स्वधा॥

अबुल फजल ने 22 नाड़ियों में सात स्वरों की व्याप्ति बताई जो इस प्रकार

अबुल फजल ने 22 नाड़ियों में सात स्वरों की व्याप्ति बताई जो इस प्रकार

अबुल फजल ने 22 नाड़ियों में सात स्वरों की व्याप्ति बताई जो इस प्रकार है -

1. षड्ञ (सा) मयूर की आवाज से प्रतिस्ठित हुआचतुर्थ नाड़ी से इसका अभ्यूदय।

2. त्रषभ (रे) पपीहा (चातक) की आवाज से सप्तदश से नवम् नाड़ी तक व्याप्ति।

3. गान्धार (ग) बकरे की आवाज से गृहीता नवम् से त्रयोदश नाड़ी तक व्याप्ति।

4. मध्यम (म) सारस की आवाज से गृहीत। त्रयोदश से सप्तदश नाड़ी तक व्याप्ति।

5. पंचम (प) कोयल के सुरीले कंठ से गृहीत सप्तदश नाड़ी से विशं नाड़ी तक व्याप्ति।

6. धैवत (ध) मेढ़क की आवाज से गृहीत। विशं से द्वाविशं नाड़ी तक व्याप्ति।

बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और फिल्म संगीत

 बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और फिल्म संगीत

चार दशकों तक अपने संगीत सागर में श्रोताओं को डुबकी लगवाने वाले बालमुरलीकृष्ण ने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और फिल्म संगीत- दोनों जगह अपनी धाक जमाई।

ठुमरी गायिका गिरिजा देवी हासिल कर चुकी हैं कई पुरस्कार और सम्मान

ठुमरी गायिका गिरिजा देवी हासिल कर चुकी हैं कई पुरस्कार और सम्मान

देश की प्रसिद्ध ठुमरी गायिका गिरिजा देवी का आज कोलकाता में निधन हो गया। वो सेनिया और बनारस घराने से तुल्लुक रखती हैं। गिरिजा देवी शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत का गायन करतीं थीं। ठुमरी गायन को लोकप्रिय बनाने में इनका अहम योगदान रहा। गिरिजा देवी को सन 2016 में पद्म विभूषण एवं 1980 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।  

संगीत के लिए हमारे जीवन में एक प्राकृतिक जगह है

संगीत के लिए हमारे जीवन में एक प्राकृतिक जगह है

गुलज़ार साहब कहते है

" संगीत के लिए हमारे जीवन में एक प्राकृतिक जगह है , सुबह उठ कर पूजा के श्लोक , तकरीबन उसी समय दूधवाला आता है अपनी की साइकिल की घंटी और साथ में सिटी बजाने से लेकर एक फ़क़ीर के गाने की आवाज़ से लेकर हमारी माँ की खाना पकाते समय की गुनगुनाहट , और रात में लोरियों की गरमाहट , संगीत हमारे जीवन की खाली जगह को भर देता है और इसीलिए संगीत सब को पसंद है "

भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है भारतीय शास्त्रीय संगीत।

भारतीय संगीत

भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है भारतीय शास्त्रीय संगीत। आज से लगभग ३००० वर्ष पूर्व रचे गए वेदों को संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। ऐसा मानना है कि ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को संगीत वरदान में दिया था। चारों वेदों में, सामवेद के मंत्रों का उच्चारण उस समय के वैदिक सप्तक या समगान के अनुसार सातों स्वरों के प्रयोग के साथ किया जाता था।

रागों का सृजन

रागों का सृजन

रागों का सृजन बाईस श्रुतियों के विभिन्न प्रकार से प्रयोग, विभिन्न रस या भावों को दर्शाने के लिए किया जाता है। प्राचीन समय में रागों को पुरुष व स्त्री रागों में अर्थात राग व रागिनियों में विभाजित किया गया था। सिर्फ़ यही नहीं, कई रागों को पुत्र राग का भी दर्जा प्राप्त था। उदाहरणत: राग भैरव को पुरुष राग और भैरवी, बिलावली सहित कई अन्य रागों को उसकी रागिनियाँ तथा राग ललित, बिलावल आदि रागों को इनके पुत्र रागों का स्थान दिया गया था। बाद में आगे चलकर पंडित विष्णुनारायण भातखंडे ने सभी रागों को दस थाटों में बॉंट दिया। अर्थात एक थाट से कई रागों की उत्पत्ति हो सकती थी। अगर थाट को एक पेड़ माना जाए व उसस

राग भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं।

राग भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं। यह संगीत का मूलाधार है। 'राग' शब्द का उल्लेख भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में भी मिलता है। 'राग' में कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वरों होते हैं। राग वह सुन्दर रचना है, जो कानों को अच्छी लगे।

भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है भारतीय शास्त्रीय संगीत। आज से लगभग ३००० वर्ष पूर्व रचे गए वेदों को संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। ऐसा मानना है कि ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को संगीत वरदान में दिया था। चारों वेदों में, सामवेद के मंत्रों का उच्चारण उस समय के वैदिक सप्तक या समगान के अनुसार सातों स्वरों के प्रयोग के साथ किया जाता था।

Pages

आप भी अपने लेख फिज़िका माइंड वेबसाइट पर प्रकाशित कर सकते है|

आप अपने लेख WhatsApp No 9259436235 पर भेज सकते है जो की पूरी तरह से निःशुल्क है | आप 1000 रु (वार्षिक )शुल्क जमा करके भी वेबसाइट के साधारण सदस्य बन सकते है और अपने लेख खुद ही प्रकाशित कर सकते है | शुल्क जमा करने के लिए भी WhatsApp No पर संपर्क करे. या हमें फ़ोन काल करें 9259436235