राग परिचय

स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय

स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय

पञ्चम स्वर साम की प्रतिहार भक्ति के तुल्य हो सकता है। प्रतिहार के विषय में कहा गया है कि इसमें अन्न का हरण किया जाता है। मध्यम अथवा उद्गीथ भक्ति द्वारा विकसित हुए सर्वोच्च स्थिति के प्राणों को, गुणों को जिस अन्न की आवश्यकता पडती होगी, पञ्चम स्वर उस अन्न को प्रदान करता होगा। नारद का वीणावादन पञ्चम स्वर में होता है।

स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय

स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय

मध्यम स्वर साम की उद्गीथ भक्ति के तुल्य हो सकता है। इसे सूर्य की सबसे विकसित स्थिति, मध्याह्न काल की स्थिति के रूप में समझा जा सकता है।

स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय

स्वर गान्धार का शास्त्रीय परिचय

गान्धार स्वर साम की ‘आदि’ भक्ति के तुल्य हो सकता है। आदि के विषय में कहा गया है कि चूंकि इसमें आदान किया जाता है, अतः इसका नाम आदि है(प्रस्ताव में प्र/प्रति वर्ण को महत्त्व दिया गया है। प्र ऊर्जा का प्रेषण हो सकता है)। आदि भक्ति में आदान किस वस्तु का किया जाता है, यह गान्धार स्वर के आगे के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है।   किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिन-जिन वस्तुओं को एकत्रित करना आवश्यक होता है, वही आदि हो सकते हैं। जैसे रोटी बनाने के लिए आटा, जल, अग्नि आदि। सूक्ष्म स्तर पर पहुंच कर स्थूल स्तर से ज्योति का आदान करना पडता है, अतः वही आदि है।

स्वर मालिका तथा लिपि

स्वर मालिका तथा लिपि

भारतीय संगीत शास्त्री अन्य कई बातों में भी पाश्चात्य संगीत कारों से कहीं आगे और प्रगतिशील थे। भारतीयों ने ऐक ‘सप्तक’ ( सात स्वरों की क्रमबद्ध लडी – ‘सा री ग म प ध और नि’ को 22 श्रुतियों (इन्टरवल) में बाँटा था जब कि पाश्चात्य संगीत में यह दूरी केवल 12 सेमीटोन्स में ही विभाजित करी गयी है। भारतीयों ने स्वरों के नामों के प्रथम अक्षर के आधार पर ‘सरगमें’ बनायी जिन्हें गाया जा सकता है। ईरानियों और उन के पश्चात मुसलमानों ने भी भारतीय स्वर मालाओं (सरगमों) को अपनाया है।

भारतीय संगीत में आध्यात्मिकता स्रोत

भारतीय संगीत में आध्यात्मिकता स्रोत

भारतीय संगीत मूल रूप में ही आध्यात्मिक संगीत है। भारतीय संगीत को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग माना है तो कहीं साक्षात ईश्वर माना गया है। अध्यात्म अर्थात व्यक्ति के मन को ईश्वर में लगाना व व्यक्ति को ईश्वर का साक्षात्कार कराना अध्यात्म कहलाता है संगीत को अध्यात्मिक अभिव्यक्ति का साधन मानकर संगीत की उपासना की गई है। संगीत को ईश्वर उपासना हेतु मन को एकाग्र करने का सबसे सशक्त माध्यम माना गया है। वेदों में उपासना मार्ग अत्यंत सहज तथा ईश्वर से सीधा सम्पर्क स्थापित करने का सरल मार्ग बताया है। संगीत ने भी उपासना मार्ग को अपनाया है।

स्वर ऋषभ का शास्त्रीय परिचय

स्वर ऋषभ का शास्त्रीय परिचय

जैसा कि षड्ज स्वर के संदर्भ में उल्लेख किया जा चुका है, सूर्य की अथवा गुणों की अनुदित/अविकसित स्थिति षड्ज हो सकती है जबकि उदित/विकसित स्थिति ऋषभ हो सकती है। यदि प्राण षड्ज है तो वाक् ऋषभ हो सकती है। यदि मन षड्ज है तो वाक् ऋषभ हो सकती है(छान्दोग्य उपनिषद)। साम की भक्तियों में प्रस्ताव भक्ति ऋषभ के तुल्य कही जा सकती है। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि पशु तो हिंकार स्थिति है जबकि मनुष्य प्रस्ताव, क्योंकि मनुष्य ही परमेश्वर की स्तुति कर सकता है। इस कथन को इस प्रकार समझा जा सकता है कि किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अज्ञानपूर्वक जो संकल्प किया जाता है, वह तो षड्ज है और तत्पश्चात् उस उद्देश्य

स्वर षड्ज का शास्त्रीय परिचय

ऐतरेय ब्राह्मण ४.२९ में पृष्ठ्य षडह नामक सोमयाग के प्रथम दिवस के लक्षणों का उल्लेख है। इन लक्षणों में से एक है – करिष्यत्, अर्थात् जो भविष्य में किया जाने वाला अथवा होने वाला है। जो कुछ भविष्य में होने वाला है, जैसे आज जो गर्भ रूप में है, कल वह जन्म लेगा। गर्भ को बाहर से प्रभावित किया जा सकता है। यह षड्ज स्वर का उद्देश्य हो सकता है। करिष्यत् लक्षण के साथ-साथ अन्य लक्षणों का भी उल्लेख है – जैसे एति और प्रेति, युक्तवत्, रथवत्, आशुमत्, पिबवत्, अभ्युदित, राथन्तर, गायत्र, मन्त्र के प्रथम पद में देवता का उल्लेख आदि। एति से तात्पर्य है कि बाहर से, ब्रह्माण्ड से, सूर्य से ऊर्जा का ग्रहण किया जाता ह

संगीत के स्वर

संगीत के स्वर

श्रीमती विमला मुसलगाँवकर की पुस्तक ‘भारतीय संगीत शास्त्र का दर्शनपरक अनुशीलन’ में पृष्ठ १३९ पर उल्लेख है कि विशुद्धि चक्र की स्थिति कण्ठ में है। यह सोलह दल वाला होता है। यह भारती देवी(सरस्वती) का स्थान है। इसके पूर्वादि दिशाओं वाले दलों पर ध्यान का फल क्रमशः १-प्रणव, २-उद्गीथ, ३-हुंफट्, ४- वषट्, ५-स्वधा(पितरों के हेतु), ६-स्वाहा(देवताओं के हेतु), ७-नमः, ८-अमृत, ९-षड्ज, १०-ऋषभ, ११-गान्धार, १२-मध्यम, १३-पञ्चम, १४- धैवत, १५-निषाद, १६-विष – ये सोलह फल होते हैं—

कण्ठेऽस्ति भारतीस्थानं विशुद्धिः षोडशच्छदम्॥

तत्र प्रणव उद्गीथो हुंफड्वषडथ स्वधा॥

अबुल फजल ने 22 नाड़ियों में सात स्वरों की व्याप्ति बताई जो इस प्रकार

अबुल फजल ने 22 नाड़ियों में सात स्वरों की व्याप्ति बताई जो इस प्रकार

अबुल फजल ने 22 नाड़ियों में सात स्वरों की व्याप्ति बताई जो इस प्रकार है -

1. षड्ञ (सा) मयूर की आवाज से प्रतिस्ठित हुआचतुर्थ नाड़ी से इसका अभ्यूदय।

2. त्रषभ (रे) पपीहा (चातक) की आवाज से सप्तदश से नवम् नाड़ी तक व्याप्ति।

3. गान्धार (ग) बकरे की आवाज से गृहीता नवम् से त्रयोदश नाड़ी तक व्याप्ति।

4. मध्यम (म) सारस की आवाज से गृहीत। त्रयोदश से सप्तदश नाड़ी तक व्याप्ति।

5. पंचम (प) कोयल के सुरीले कंठ से गृहीत सप्तदश नाड़ी से विशं नाड़ी तक व्याप्ति।

6. धैवत (ध) मेढ़क की आवाज से गृहीत। विशं से द्वाविशं नाड़ी तक व्याप्ति।

ठुमरी गायिका गिरिजा देवी हासिल कर चुकी हैं कई पुरस्कार और सम्मान

ठुमरी गायिका गिरिजा देवी हासिल कर चुकी हैं कई पुरस्कार और सम्मान

देश की प्रसिद्ध ठुमरी गायिका गिरिजा देवी का आज कोलकाता में निधन हो गया। वो सेनिया और बनारस घराने से तुल्लुक रखती हैं। गिरिजा देवी शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत का गायन करतीं थीं। ठुमरी गायन को लोकप्रिय बनाने में इनका अहम योगदान रहा। गिरिजा देवी को सन 2016 में पद्म विभूषण एवं 1980 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।  

Pages