राग परिचय

रागों का विभाजन

रागों का विभाजन

किसी भी राग में अधिक से अधिक सात व कम से कम पाँच स्वरों का प्रयोग करना आवश्यक है। इस तरह रागों को मूलत: तीन जातियों में विभाजित किया जा सकता है-

औडव जाति - जहाँ राग विशेष में पाँच स्वरों का प्रयोग होता हो। 
षाडव जाति - जहाँ राग में छ: स्वरों का प्रयोग होता हो।
संपूर्ण जाति - जहाँ राग में सभी सात स्चरों का प्रयोग किया जाता हो। Read More : रागों का विभाजन about रागों का विभाजन

मध्यमग्राम-तान-बोधिनी

मध्यमग्राम-तान-बोधिनी

मध्यमग्राम-तान-बोधिनी

षड्जहीन

तानें

ऋषभहीन

तानें

गान्धारहीन

तानें

ऋषभधैवत-

हीन तानें

निषादगान्धार-

हीन तानें

सावित्री

अग्निचित्

सर्वस्वदक्षिण

त्रैलोक्यमोहन

भैरव

अर्द्धसावित्री

द्वादशाह

दीक्षा

वीर

कामद

Read More : मध्यमग्राम-तान-बोधिनी about मध्यमग्राम-तान-बोधिनी>

षड्जग्राम-तान बोधिनी

षड्जग्राम-तान बोधिनी

षड्जग्राम-तान बोधिनी

षड्जहीन

तानें

ऋषभहीन

तानें

पंचमहीन

तानें

निषादहीन

तानें

षड्जपंचम-

हीन तानें

निषादगांधार-

हीन तानें

पंचमऋषभ-

हीन तानें

अग्निष्टोम

स्विष्टकृत्

अश्वक्रान्त

चातुर्मास्य

इडा

ज्योतिष्टोम

सौभाग्यकृत्

Read More : षड्जग्राम-तान बोधिनी about षड्जग्राम-तान बोधिनी>

संगीत रत्नाकर के अनुसार स्वरों के कुल, जाति

संगीत रत्नाकर के अनुसार स्वरों के कुल, जाति

संगीत रत्नाकर १.३.५२ के अनुसार स्वरों के कुल, जाति आदि(श्रीमती विमला मुसलगाँवकर की पुस्तक से साभार)

 

षड्ज

ऋषभ

गान्धार

मध्यम

पञ्चम

धैवत

निषाद

जाति

ब्राह्मण

क्षत्रिय

वैश्य

ब्राह्मण

ब्राह्मण

क्षत्रिय

वैश्य

कुल

Read More : संगीत रत्नाकर के अनुसार स्वरों के कुल, जाति about संगीत रत्नाकर के अनुसार स्वरों के कुल, जाति>

सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर

सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर

सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर

 

स्वर नाम

संकेत

स्थान

तृप्ति(सामविधान ब्राह्मण १.१.१४)

स्वर नाम

स्थान

तृप्ति(नारद पुराण १.५०)

क्रुष्ट

११

मूर्द्धा

देव

पंचम

 

देव, पितर, ऋषि

Read More : सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर about सामवेद व गान्धर्ववेद में स्वर>

स्वर निषाद का शास्त्रीय परिचय

निषाद स्वर हेतु जगती छन्द का निर्देश है। जगती छन्द पाप नाश हेतु होता है। निषाद स्वर का वार शनिवार कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ४.६.८.१-२ का कथन है – या वै दीक्षा सा निषत्, तत् सत्रम्। शतपथ ब्राह्मण ५.४.४.५ तथा १२.८.३.१० में वाजसनेयि माध्यन्दिन संहिता १०.२७ व २०.२ में प्रकट हुई निम्नलिखित यजु की व्याख्या की गई है-

निषषाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा। साम्राज्याय सुक्रतुः।। Read More : स्वर निषाद का शास्त्रीय परिचय about स्वर निषाद का शास्त्रीय परिचय

स्वर धैवत का शास्त्रीय परिचय

स्वर धैवत का शास्त्रीय परिचय

नारद पुराण में धैवत स्वर द्वारा असुर, निषाद व भूतग्राम के तृप्त होने का उल्लेख है। यहां भूतग्राम से तात्पर्य हमारे पूर्व जन्म के संस्कारों से हो सकता है। यदि धैवत शब्द का वास्तविक रूप दैवत हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ होगा कि धैवत स्वर में पुरुषार्थ का अभाव है, केवल कृपा, दैव शेष है। प्रथम स्थिति में धैवत/दैवत स्वर का रस भयानक या बीभत्स कहा जाएगा और दैवकृपा प्राप्त होने पर यह करुण रस बन जाएगा।

     नारदीय शिक्षा में धैवत स्वर के देवता के रूप में ह्रास-वृद्धि वाले सोम का उल्लेख है। अध्यात्म में, वृद्धि-ह्रास हमारे चेतन-अचेतन मन में हो सकता है। Read More : स्वर धैवत का शास्त्रीय परिचय about स्वर धैवत का शास्त्रीय परिचय

स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय

स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय

पञ्चम स्वर साम की प्रतिहार भक्ति के तुल्य हो सकता है। प्रतिहार के विषय में कहा गया है कि इसमें अन्न का हरण किया जाता है। मध्यम अथवा उद्गीथ भक्ति द्वारा विकसित हुए सर्वोच्च स्थिति के प्राणों को, गुणों को जिस अन्न की आवश्यकता पडती होगी, पञ्चम स्वर उस अन्न को प्रदान करता होगा। नारद का वीणावादन पञ्चम स्वर में होता है। Read More : स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय about स्वर पञ्चम का शास्त्रीय परिचय

स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय

स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय

मध्यम स्वर साम की उद्गीथ भक्ति के तुल्य हो सकता है। इसे सूर्य की सबसे विकसित स्थिति, मध्याह्न काल की स्थिति के रूप में समझा जा सकता है। Read More : स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय about स्वर मध्यम का शास्त्रीय परिचय

Pages