राग परिचय

राग यमन (कल्याण)

राग यमन

इस राग को राग कल्याण के नाम से भी जाना जाता है। इस राग की उत्पत्ति कल्याण थाट से होती है अत: इसे आश्रय राग भी कहा जाता है। जब किसी राग की उत्पत्ति उसी नाम के थाट से हो तो उसे कल्याण राग कहा जाता है। इस राग की विशेषता है कि इसमें तीव्र मध्यम और अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। ग वादी और नि सम्वादी माना जाता है। इस राग को रात्रि के प्रथम प्रहर या संध्या समय गाया-बजाया जाता है। इसके आरोह और अवरोह दोनों में सातों स्वर प्रयुक्त होते हैं, इसलिये इसकी जाति सम्पूर्ण है।

संगीत का वैज्ञानिक प्रभाव

संगीत का वैज्ञानिक प्रभाव

संगीत सुनने के कई फायदे हैं। यह बात तो सभी को मालूम है पर कोई आपसे पूछ बैठे कि जरा बताइए कि क्या इन फायदों के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है तो आप सोच में पड़ जाएँगे। दरअसल हर तरह के संगीत को सुनने से आप पर अच्छा प्रभाव पड़े यह भी कतई जरूरी नहीं है। तो आइए रॉक म्यूजिक और शास्त्रीय संगीत सुनने से क्या प्रभाव पड़ता है इसे शोध की नजर से देखते हैं। इंटेल इंटरनेशनल साइंस एंड इंजीनियरिंग फेयर ने यह बात शोध से साबित की है। संस्था ने इस शोध में करीब 1500 बच्चों पर अलग-अलग तरह के संगीत का प्रभाव परखा।

भारतीय संगीत

भारतीय संगीत

भारतीय संगीत से, सम्पूर्ण भारतवर्ष की गायन वादन कला का बोध होता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की 2 प्रणालियाँ हैं। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति अथवा कर्नाटक संगीत प्रणाली और दूसरी हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली, जो कि समुचे उत्तर भारतवर्ष मे प्रचलित है। दक्षिण भारतीय संगीत कलात्मक खूबियों से परिपूर्ण है। और उसमें जनता जनार्दन को आकर्षित करने की और समाज मे संगीत कला की मौलिक विधियों द्वारा कलात्मक संस्कार करने की क्षमता है।

षडजांतर | शास्त्रीय संगीत के जाति लक्षण क्यां है

षडजांतर | शास्त्रीय संगीत के जाति लक्षण क्यां है

भारत में शास्त्रीय संगीत की परंपरा बड़ी प्राचीन है। राग के प्रादुर्भाव के पूर्व जाति गान की परंपरा थी जो वैदिक परंपरा का ही भेद था। जाति गान के बारे में मतंग मुनि कहते हैं –

“श्रुतिग्रहस्वरादिसमूहाज्जायन्त इति जातय:”

अर्थात् – श्रुति और ग्रह- स्वरादि के समूह से जो जन्म पाती है उन्हें ‘जाति’ कहा है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है

भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है। सामवेद में संगीत के बारे में गहराई से चर्चा की गई है। भारतीय शास्त्रीय संगीत गहरे तक आध्यात्मिकता से प्रभावित रहा है, इसलिए इसकी शुरुआत मनुष्य जीवन के अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' की प्राप्ति के साधन के रूप में हुई। संगीत की महत्ता इस बात से भी स्पष्ट है कि भारतीय आचार्यों ने इसे 'पंचम वेद' या 'गंधर्व वेद' की संज्ञा दी है। भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' पहला ऐसा ग्रंथ था, जिसमें नाटक, नृत्य और संगीत के मूल सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया था।

सप्तक क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समूह को कहते हैं।

सप्तक क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समूह को कहते हैं। सातों स्वरों के नाम क्रमश: सा, रे, ग, म, प, ध और नि हैं। इसमें प्रत्येक स्वर की आन्दोलन संख्या अपने पिछले स्वर से अधिक होती है। दूसरे शब्दों में सा से जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते हैं, स्वरों की आन्दोलन संख्या बढ़ती जाती है। रे की आन्दोलन संख्या सा से, ग, की, रे, से, व, म, की, ग, से अधिक होती है। इसी प्रकार प, ध और नी की आन्दोलन संख्या अपने पिछले स्वरों से ज़्यादा होती है। पंचम स्वर की आन्दोलन संख्या सा से डेढ़ गुनी अर्थात् 3/2 गुनी होती है। उदाहरण के लिए अगर सा की आन्दोलन संख्या 240 है तो प की आन्दोलन संख्या 240 की 3/2 गुनी 360 होगी। प्रत्

माइक्रोफोन की हानि :

माइक्रोफोन

माइक्रोफोन की हानि :

- माइक्रोफोन की आवाज की गुणवत्ता उतनी अच्छी नही होती.

- जब भी हम माइक्रोफोन में कुछ बोलते है तो उसके आसपास की हलचल भी माइक्रोफोन की आवाज की गुणवत्ता को कम करती है.

- बिना तार पर काम करने वाले माइक्रोफोन में बैटरी का इस्तेमाल होता है जो सिर्फ एक निर्धारित समय तक ही काम करती है.

- इनकी कीमत इनकी गुणवत्ता पर आधारित होती है. अगर आप अच्छी कीमत का माइक्रोफोन खरीदते हो तभी आपको आवाज़ की अच्छी गुणवत्ता मिलती है.

 

स्वरों का महत्त्व क्या है?

स्वरों का महत्त्व क्या है?

किसी भी राग में दो स्वरों को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इन्हें 'वादी स्वर' व 'संवादी स्वर' कहते हैं। वादी स्वर को "राग का राजा" भी कहा जाता है, क्योंकि राग में इस स्वर का बहुतायत से प्रयोग होता है। दूसरा महत्त्वपूर्ण स्वर है संवादी स्वर, जिसका प्रयोग वादी स्वर से कम मगर अन्य स्वरों से अधिक किया जाता है। इस तरह किन्हीं दो रागों में जिनमें एक समान स्वरों का प्रयोग होता हो, वादी और संवादी स्वरों के अलग होने से राग का स्वरूप बदल जाता है। उदाहरणत: राग भूपाली व देशकार में सभी स्वर समान हैं, किंतु वादी व संवादी स्वर अलग होने के कारण इन रागों में आसानी से अंतर बताया जा सकता है। हर राग में एक विशेष

गुरु की परिभाषा

गुरु की परिभाषा

गुरु की परिभाषा
'गुरु' शब्द में 'गु' का अर्थ है 'अंधका' और 'रु' का अर्थ है 'प्रकाश' अर्थात गुरु का शाब्दिक अर्थ हुआ 'अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक'। सही अर्थों में गुरु वही है जो अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करे और जो उचित हो उस ओर शिष्य को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे। गुरु उसको कहते हैं जो वेद-शास्त्रों का गृणन (उपदेश) करता है अथवा स्तुत होता है। [1] मनुस्मृति [2] में गुरु की परिभाषा निम्नांकित है-

माइक्रोफोन के प्रकार :

माइक्रोफोन के प्रकार :

माइक्रोफोन के भी अनेक प्रकार होते है, लेकिन इनके काम करने के तरीके और इनकी आवाज़ की गुणवत्ता को ध्यान में रख कर इन्हें तीन भागो में बांटा गया है. जो निम्नलिखित है.

1. Shotgun माइक्रोफोन : ये एक बूम पोल ( Boom Pole ) और बूम स्टैंड ( Boom Stand ) का बना होता है. इन माइक्रोफोन का इस्तेमाल बिलकुल सही ऑडियो को निकलने के लिए किया जाता है, इनमे आसपास हो रही हलचल या फिर शोर नही आता बल्कि ये सिर्फ आपके द्वारा इसमें बोली गई आवाज़ को ही एनालॉग डाटा के रूप में लेता है.

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