लिंगायत क्यों चाहते हैं हिंदुओं से अलग होना

लिंगायत समुदाय लंबे समय से मांग कर रहा था कि उन्हें हिंदू धर्म से अलग घोषित किया जाए। इस मांग को लेकर राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस नागामोहन दास की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इस समिति ने लिंगायत समुदाय के लिए अलग धर्म के साथ अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारिश की थी, जिसे सिद्धारमैया कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है।लिंगायत भारतवर्ष के प्राचीनतम धर्म का एक हिस्सा है इस धर्म के ज्यादातर अनुयायी दक्षिण भारत में हैं। ये भगवान शिव की स्तुति आराधना पर आधारित है.भगवान शिव जो सत्य सुंदर और सनातन हैं जिनसे सृस्टि का उद्गार हुआ। जो आदि अनंत हैं। हिंदु धर्म मे त्रिदेवों का वर्णन है जिसमे सर्वप्रथम भगवान शिव का ही नाम आता है शिव जिनसे सृष्टि की उत्पत्ति हुई. इसके पश्चात भगवान ब्रम्ह की उत्पत्ति जो सम्पूर्ण जगत को जीवन प्रदान करते हैं। भगवान विष्णु जो सम्पूर्ण जगत के पालनहार हैं। तीसरे अंश भगवान महेश (शंकर) की उत्पत्ति जीवन अर्थात अमुक्त आत्माओं को नष्ट करके पुनः जीवन मुक्ति चक्र में स्थापित करना है। लिंगायत सम्प्रदाय भगवान शिव जो कि ब्रम्ह, विष्णु, महेश, चराचर जगत के उत्पत्ति के कारक हैं उनकी स्तुति आराधना करता है। आप अन्य शब्दों में इन्हें शैव संप्रदाय को मानने वाले अनुयायी कह सकते हैं। इस सम्प्रदाय की स्थापना 12 वी शताब्दी मे महात्मा बसवण्णां ने की थी इस मत के उपासक लिंगायत  (कन्नड़: ಲಿಂಗಾಯತರು) कहलाते हैं। यह शब्द कन्नड़ शब्द लिंगवंत से व्युत्पन्न है। ये लोग मुख्यतः महात्मा बसवण्णा की शिक्षाओं के अनुगामी हैं।

लिंगायत समुदाय लंबे समय से मांग कर रहा था कि उन्हें हिंदू धर्म से अलग घोषित किया जाए। इस मांग को लेकर राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस नागामोहन दास की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इस समिति ने लिंगायत समुदाय के लिए अलग धर्म के साथ अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारिश की थी, जिसे सिद्धारमैया कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है।

इस समाज के कुछ रीति-रिवाज हिंदू धर्म से अलग हैं। आइए, जानते हैं कि कौन हैं लिंगायत समाज के लोग, क्या है इनकी परंपरा-मान्यता और मांग।

समाज सुधारक बासवन्ना ने की स्थापना
लिंगायत समाज पहले हिन्दू वैदिक धर्म का ही पालन करता था, लेकिन कुछ कुरीतियों को दूर करने और उनसे बचने के लिए लिंगायत संप्रदाय की स्थापना की गई। बारहवीं सदी में समाज सुधारक बासवन्ना ने लिंगायत समाज की स्थापना की थी। उन्हें भगवान बासवेश्वरा भी कहा जाता है। बासवन्ना का कहना था कि लोगों को उनके जन्म के अनुसार नहीं बल्कि काम के आधार पर वर्गीकृत करना चाहिए। लिंगायत समाज अब अपने धर्म को मान्यता दिए जाने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए वे एक आंदोलन कर रहे हैं।

बारहवीं सदी में समाज सुधारक बासवन्ना ने लिंगायत समाज की स्थापना की थी। बासवन्ना का कहना था कि लोगों को उनके जन्म के अनुसार नहीं बल्कि काम के आधार पर वर्गीकृत करना चाहिए।

लिंगायत परंपरा में दफ़नाते हैं शव
लिंगायत परंपरा में निधन के बाद शव को दफ़नाया जाता है। दो तरह से दफ़नाने की परंपरा है। एक बिठाकर और दूसरा लिटाकर। दोनों में से किस विधि से दफनाना है, इसका चयन परिवार करता है। लिंगायत परंपरा में मृत्यु के बाद शव को नहलाकर बिठा दिया जाता है। शव को कपड़े या लकड़ी के सहारे बांध जाता है। जब किसी बुज़ुर्ग लिंगायत का निधन होता है तो उसे सजा-धजाकर कुर्सी पर बिठाया जाता है और फिर कंधे पर उठाया जाता है। इसे विमान बांधना कहते हैं। कई जगह लिंगायतों के अलग कब्रिस्तान होते हैं।

मूर्ति पूजा का विरोध
लिंगायत के संस्थापक बासवन्ना ने वेदों को ख़ारिज कर दिया। वे मूर्ति पूजा के भी खिलाफ थे। लिंगायत समुदाय भगवान शिव की पूजा नहीं करते, लेकिन अपने शरीर पर ईष्टलिंग धारण करते हैं। ये अंडे के आकार की गेंदनुमा आकृति होती है जिसे वे धागे से अपने शरीर पर बांधते हैं। लिंगायत इस ईष्टलिंग को आंतरिक चेतना का प्रतीक मानते हैं। लिंगायत समाज में अंतरजातीय विवाह को मान्यता नहीं दी गई है।

वीरशैव और लिंगायत में विरोधाभास
मान्यता ये है कि वीरशैव और लिंगायत एक ही लोग होते हैं। लेकिन लिंगायत लोग ऐसा नहीं मानते। उनका मानना है कि वीरशैव लोगों का अस्तित्व समाज सुधारक बासवन्ना से भी पहले से था। वीरशैव भगवान शिव की पूजा करते हैं। इस विरोधाभास की कुछ वजहें भी हैं। बासवन्ना ने अपने प्रवचनों के सहारे जो समाजिक मूल्य दिए, कालांतर में वे बदल गए। हिंदू धर्म की जिस जाति-व्यवस्था का विरोध किया गया, वो लिंगायत समाज में ही आ गया।

लिंगायत समाज का राजनीतिक महत्व
लिंगायत समाज मुख्य रूप से दक्षिण भारत में है। लिंगायत समाज को कर्नाटक की अगड़ी जातियों में गिना जाता है। इस राज्य में आबादी का 18 फीसदी लिंगायत हैं। महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी लिंगायतों की संख्या अच्छी ख़ासी है। राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी लिंगायतों की मांग का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। कर्नाटक में 2018 में चुनाव होने हैं। ऐसे में लिंगायत समुदाय इसमें काफी अहम भूमिका निभा सकता है। बीजेपी वोटरों खास कर लिंगायत समुदाय को ये मैसेज देना चाह रही हैं अगला मुख्यमंत्री भी उत्तर कर्नाटक से होगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि राज्य की कांग्रेस सरकार बीजेपी को झटका देने के लिए लिंगायतों को अलग धर्म की मान्यता देने के लिए केंद्र सरकार से अनुरोध कर सकती है।

उत्तरी कर्नाटक की प्रभावशाली जाति
सामाजिक रूप से लिंगायत उत्तरी कर्नाटक की प्रभावशाली जातियों में गिनी जाती है। राज्य के दक्षिणी हिस्से में भी लिंगायत लोग रहते हैं। सत्तर के दशक तक लिंगायत दूसरी खेतिहर जाति वोक्कालिगा लोगों के साथ सत्ता में बंटवारा करते रहे थे। वोक्कालिगा दक्षिणी कर्नाटक की एक प्रभावशाली जाति है। कर्नाटक के प्रमुख राजनेता देवराज उर्स ने लिंगायत और वोक्कालिगा लोगों के राजनीतिक वर्चस्व को तोड़ दिया था। अन्य पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों और दलितों को एक मंच पर लाकर देवराज 1972 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने।

लिंगायत का समर्थन यानी सत्ता की सीढ़ी
अस्सी के दशक की शुरुआत में रामकृष्ण हेगड़े ने लिंगायत समाज का भरोसा जीता। हेगड़े की मृत्यु के बाद बीएस येदियुरप्पा लिंगायतों के नेता बने. 2013 में बीजेपी ने येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाया तो लिंगायत समाज ने बीजेपी को वोट नहीं दिया। नतीजतन कांग्रेस फिर से सत्ता में लौट आई। अब बीजेपी फिर से लिंगायत समाज में गहरी पैठ रखने वाले येदियुरप्पा को सीएम कैंडिडेट के रूप में आगे रख रही है। वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश भी लिंगायत परंपरा से जुड़ी थीं। इस साल 5 सितंबर को उसकी अज्ञात लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। उन्हें भी लिंगायत परंपरा के तहत दफनाया गया।