लैक्टोमीटर

लैक्टोमीटर

लैक्टोमीटर एक वैज्ञानिक उपकरण है। लैक्टोमीटर दूध की शुद्धता मापने वाला उपकरण है।

कभी कहा जाता था कि हंस जैसा महान पक्षी ही नीर और क्षीर को अलग कर सकता है। हंस पानी मिश्रित दूध में से दूध को पी लेता है और पानी बचा रहा जाता है। लेकिन अब विज्ञान ने भी ऐसी तकनीकें इजाद की हैं जिनकी सहायता से नीर में क्षीर की मिलावट को पहचाना जा सकता है। लैक्टोमीटर एक ऐसा ही यंत्र है। यह दूध की शुद्धता को मापने वाला एक वैज्ञानिक यंत्र है। इस यंत्र का आविष्कार लीवरपूल के डिकास द्वारा किया गया। यह शीशे का बना एक छोटा से यंत्र होता है। इसके जरिए दूध के घनत्व के आधार पर दूध की शुद्धता और अशुद्धता का निर्धारण किया जाता है। इस यंत्र के जरिए दूध में पानी मिलाया गया है या नहीं, इसका पता आसानी से लगाया जा सकता है। दूध की शुद्धता को मापने के लिए दूध का सैंपल लिया जाता है। इसके बाद लैक्टोमीटर को दूध में डुबोया जाता है तथा यंत्र पर रीडिंग ली जाती है। सामान्यतः शुद्ध दूध की रीडिंग 32 होती है।  दूध में पानी की मात्रा 87 प्रतिशत होती है। इसके कारण इसमें और भी अधिक पानी मिलाए जानी की संभावना रहती है। दूध की तरलता का लाभ उठाकर ही कुछ मिलावटखोर ऊपर से पानी मिला देते हैं। इसके कारण ग्राहक ठगा जाता है। अतिरिक्त पानी मिलाए जाने से दूध की स्वाभाविक तरलता बदल जाती है और उसका घनत्व भी बदल जाता है। यदि घनत्व का मापन कर लिया जाए तो इस बात का आसानी से पता लगाया जा सकता है कि दूध में पानी मिलाया गया है अथवा नहीं। लैक्टोमीटर आर्किमिडीज के सिद्धांत के आधार पर काम करता है। इसके कारण दूध के स्वाभाविक घनत्व में होने वाले परिवर्तन का पता चल जाता है और मिलावटी दूध की पहचान हो जाती है। लैक्टोमीटर न केवल शुद्ध दूध की उपलब्धता को सुनिश्चित करता है बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य की रक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे मिलावटी दूध की पहचान हो जाती है। हम इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि  मिलावटी दूध देर-सबेर हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है।

 

 

दूध में डिटर्जेंट की जाँच करने के उपाय

दूध में डिटर्जेंट की जाँच करने के उपाय

आम तौर पर दूध की गुणवत्ता जांचने के लिए लैक्टोमीटर प्रयोग किया जाता है या फिर रसायनों की सहायता से इसे परखा जा सकता है.

लेकिन रसायनों का इस्तेमाल आम लोग नहीं कर सकते और लैक्टोमीटर से सिर्फ़ दूध में पानी की मात्रा का पता चल सकता है, इससे सिंथेटिक दूध को नहीं पकड़ा जा सकता है.