शून्य मुद्रा

शून्य मुद्रा हमारे शरीर के भीतर आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करती है हमारे हाथों की मध्यमा अँगुली का संबंध आकाश से जुड़ा माना गया है शून्य मुद्रा मुख्य रूप से हमारी श्रवण क्षमता को बढ़ाती है चूँकि सूर्य मुद्रा हमारे भीतर के अग्नि तत्व को संचालित करती है इस अँगुली का संबंध सूर्य और यूरेनस ग्रह से है और सूर्य ऊर्जा स्वास्थ्य का प्रतिनिधित्व करती है | शून्य मुद्रा के करने से कान में किसी भी प्रकार के दर्द में आराम मिलता है साथ ही कान में पस निकलने पर इस मुद्रा के नियमित प्रयोग करने से कान का पस आना बंद होजाता है कान का बहरापन भी इस मुद्रा से ठीक किया जा सकता है-

शून्य मुद्रा और उसके लाभ 
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अंगूठे से दूसरी अंगुली (मध्यमा,सबसे लम्बी वाली अंगुली) को मोड़कर अंगूठे के मूल भाग (जड़ में) स्पर्श करें और अंगूठे को मोड़कर मध्यमा के ऊपर से ऐसे दबायें कि मध्यमा उंगली का निरंतर स्पर्श अंगूठे के मूल भाग से बना रहे..बाकी की तीनो अँगुलियों को अपनी सीध में रखें.इस तरह से जो मुद्रा बनती है उसे शून्य मुद्रा कहते हैं..
लाभ - इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से कान बहना, बहरापन, कान में दर्द इत्यादि कान के विभिन्न रोगों से मुक्ति संभव है.यदि कान में दर्द उठे और इस मुद्रा को प्रयुक्त किया जाय तो पांच सात मिनट के मध्य ही लाभ अनुभूत होने लगता है.इसके निरंतर अभ्यास से कान के पुराने रोग भी पूर्णतः ठीक हो जाते हैं..

इसकी अनुपूरक मुद्रा आकाश मुद्रा है.इस मुद्रा के साथ साथ यदि आकाश मुद्रा का प्रयोग भी किया जाय तो व्यापक लाभ मिलता 

लिंग मुद्रा

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लिंग मुद्रा -

विधि-
सर्वप्रथम वज्रासन / पद्मासन या सुखासन में बैठ जाइए।
अब  अपने दोनो हाथों की उंगलियों को आपस में फँसाकर सीधे हाथ के अंगूठे को बिल्कुल सीधा रखेंगे यही लिंग मुद्रा कहलाती है  ।
आँखे बंद रखते हुए श्वांस सामान्य बनाएँगे।
अपने मन को अपनी श्वांस गति पर व मुद्रा  पर केंद्रित रखिए।

लाभ- 

    -बलगम व खाँसी में लाभप्रद।
    -शरीर में गर्मी उत्पन्न करती है व मोटापे को कम करती है।
    -श्वसन तंत्र को मजबूत करती है। Read More : लिंग मुद्रा about लिंग मुद्रा